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यह धर्म भी बहुत से पूर्वी दर्शन जैसा है जो मानवता की ओर अर्द्ध उदार धारणा रखता है और विभिन्न धार्मिक विचारधाराओं के तत्व को भी सामिल करता है.
जैसा कि मैंने पहले मेरे अन्य लेखों में कहा है जो हिंदू धर्म, काओ दाई और साई बाबा से संबंधित थे, बहाई आस्था भी धर्मों के प्रस्तावित सत्य की प्रक्रिया या प्रणाली के बिच के फरक को ज्यादा ध्यान ना देते हुए धार्मिक विश्वास के आम तत्व पर बराबर जोड़ देता है. तो इन सभी धर्मों का मिलकर एक हो जाना तुलनात्मक धर्म का ज्यादा सरलीकरण है जो अनावश्यक रूप से दूसरों की धार्मिक पहचान के कमी को इनकार करता है.
विडंबना यह है, बहाई धर्म दुनियाके व्यवस्थित धर्मों में खुद को मानता है और अपने अनोखे धार्मिक इतिहास को बनाए रखता है जो इस आंदोलन को कहने के लिए बहाई बनाए रखता है जो इसके सार्वभौमिक स्थिति के विपरीत है. यहां तक कि नाम ही विशेष रूप से “बहाई आस्था” दिया गया है जिसके द्वारा यह अपने स्वयं के सिद्धांतों, कानूनों, और परंपराओं को बनाए रखता है.
बहाई पहले इस्लामी शिया परंपरा से आया था जिसमें वो अंत समय के मसीही आंकड़ों पर जोर देता है जिसको १२ वें इमाम या महदी कहा जाता है.
यह सब सिय्यिद `अली मुहम्मद या मिर्जा अली मुहम्मद से सुरु हुआ जिनको पैगंबर मोहम्मद का रिश्तेदार माना जाता था और जो अपने रिश्तेदार की तरह गहरे ध्यान के द्वारा आत्मज्ञान पा चुका था जिसके द्वारा उसे ये विश्वास हुआ के उसे मसीहा के आने के लिए मार्ग बनाने के लिए दरवाजा या बाब चुनागया है बिलकुल बाप्टिस्ट यहुन्ना की तरह.
हैरानी की बात ये है की, उनके उत्तराधिकारी मिर्जा हुसेन – `अली नूरी या बहुउल्लाह तो बाब का पसंद भी नहीं था जो इस बात का संकेत होना चाहिए के यहाँ कुछ गलत था बल्कि यह बहाउल्लाह के भाई मिर्ज़ा याह्या नूरी था जिसको चुना गया और इस बात ने इस आंदोलन के सुरुवात से ही दरार बना दिया था जो पहले ही अपनी धार्मिक एजेंडा के विपरीत विभेद या विखंडन के पथ पर चल पड़ा था.
अब इस आंदोलन के सैद्धांतिक विवादों के विषय में बात करें तो ये मानव के नैतिक विकास को ज्यादा मानकर पाप का वास्तविकता और उसके बुरे परिणाम को इनकार करता है और फिर भी पिछली सदी समय की शुरुआत से सबसे खुनी रहा है. बुराई या मुझे कहना चाहिए बुराई के परिणाम तेजी से प्रौद्योगिकी के विकास की प्रक्रिया की वजह से बढ़ चूका है जिसमें सबसे ज्यादा मानवता दुष्ट साम्राज्य के नरसंहार प्रवृत्ति की वजह से विलुप्त होने के नश्वर खतरे में है. हमने जर्मनी के फ़ासिज़्म के अत्याचारों को देखा है और यह सब प्रलेखन के साथ आज भी हमारे बीच लोग हैं जो इस बात को इनकार करते हैं के ये कभी हुआ था और ये उनसे अलग नहीं है जिसको बहाई पाप और दुस्टता को मानव के प्रगति में सिर्फ एक गड़बड़ के रूप में खारिज करके समर्थन करता है.
इस के इलावा बाब ने कहा है के वो पूर्ति के युग में जा रहा था पर वास्तव में पिछली सदी का परिणाम रक्तपात का एक युग था जिसके पीछे आज उत्तर कोरिया और ईरान का बुरा तानाशाही आने वाला था.
बहाउल्लाह के बेटे अब्दुल बहा बहाई के उत्तराधिकारी हुए और १९११ में उन्होंने अपना पहला सार्वजनिक भाषण दिया जिसमें उन्होंने दुनिया के बारे में नवी के तरह ये कहा के वो आत्मज्ञान की स्थिति में है जब युद्ध खतम होजाएगा और शांति राज करेगा जिसके द्वारा मानव जाती अंत में भाइयों के रूप में एकजुट हो जाएगा. इस पिछली सदी में कई अन्य वैश्विक झड़पों और दो विश्व युद्धों के बिच ये अवस्य हुआ होगा.
तो जब बाइबिल परिप्रेक्ष्य से इस भविष्यवाणी के बात की विफलता को देखते हैं तो शास्त्र भविष्यवाणी की सच्चाई के सम्बन्ध में एक साधारण परीक्षण को अंकित करता है के अगर जो नवी कहता है वो हुआ तो वो परमेश्वर से आया है और अगर नहीं हुआ तो वो एक झूठा नवी है और अब्दुल बहा के विषय में तो पिछली बात ही सही लगती है.
व्यवस्था विवरण १८:२२
ये बात मुझे यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के समय के दौरान भविष्यवाणी के आवाज की याद दिलाता है जब झूठे भविष्यद्वक्ता कह रहे थे “शांति, शांति, जब वहाँ शांति नहीं थी. “
वैसे भी यह मुझे मेरे अगले बिंदु के तरफ ले जाता है जिसमें ये आंदोलन बहाउल्लाह की जिंदगी को मसीह के दुसरे आगमन के पूरा होने के रूप में देखता है जो इस निर्वासित नेता और उसके परिणामी आंदोलन ने जो कुछ भी थोडा बहुत किया था उसके लिए एक निराशा है. इसके अलावा मसीह का दूसरा आगमन को अस्थायी या आंतरायिक शासनकाल के रूप में नहीं सोचा गया है और इसके बाबजूद बहाउल्लाह की एक इंसान की तरह १८९२ में मृत्यु हो गया. नाही दुसरे आगमन को जेल के एकान्त कारावास के रूप में वर्णित किया गया है बल्कि उसे एक गौरवशाली शासन के रूपमें प्रदर्शित किया गया है जिसमें की भव्यता मैं वो दुनिया के देशों के बीच शक्ति में विराजमान होंगे.
यहां तक कि अपने समय के दुनिया के नेताओं को पत्र लिखने के उनके प्रयासों का दुनिया के पाठ्यक्रम को पुनर्निर्देशित करने में कोई परिणामी प्रभाव नहीं था.
कुछ अन्य विसंगति यशायाह में यीशु से सम्बंधित भविष्यवाणी के बारे में है जिसको बहाउल्लाह के साथ संबद्ध किया गया है और अभी तक रोचक रूप से बहाउल्लाह के बंश का इसराइल के राष्ट्र के संबंध में कोई वंशावली सम्बन्ध नहीं पाया गया नाही उन्हें राजा दाऊद का एक वंशज माना जाता है. सुसमाचार लेखकों ने इसी वजह से येशु के वंशावली के आंकड़ों पर जोर दिया है ताकि यीशु की प्रत्यायक पर जोर दिया जासके और पुराने करार में येशु के मसीहा के रूपमें जो भविष्यवाणी है वो पूरा होसके.
इसके अलावा बहाउल्लाह की पहचान यशायाह ५३ के पीड़ित नौकर के रूप में करना एक अतिशयोक्ति होगा और उनके जीवन के प्रकाश में एक कट्टरपंथी प्रस्थान होगा. सबसे पहले पीड़ित नौकर का अभिप्राय पापों की क्षमा के लिए एक प्रायश्चित्त होना था जो स्पस्ट रूप से बहाउल्लाह के मानकों और प्रयोजन के बाहर था और इस आंदोलन के एजेंडा के विपरीत बुराई और पाप को महज एक मानवीय कमजोरी के रूप में मानता है. फिर भी यशायाह पाप को भगवान के आगे एक अपराध के रूप में बहुत गंभीरता से लेता है जिसका मतलब है के सिर्फ एक धर्मी दास अपने मौत के बलि के माध्यम से इश्वर के साथ हमें सामंजस्य कर सकता है.
एक और विवाद उसके इस्लामी जड़ों का प्रभाव है जो एक उत्कृष्ट इश्वर का विचार रखता है और जो सब के लिए एक हैं. अब इस तरह के अंतर को अन्य पवित्र पुरुषों के विपरीत में कैसे सुधारा जा सकता है जो इश्वर की आवश्यक प्रकृति के बारे में नास्तिक / बहुदेववादी , जीववादी, सर्वेश्वर्वादी, वेदांत, पनेंथेइस्टिक, देइस्टिक, त्रिदेववादी आदि विचार रखते हैं.
यदि हम इश्वर की बात की चर्चा करते समय जीवशास्त्र के मतभेद को एक प्रारंभिक बिंदु के रूप में सामंजस्य नहीं कर सकते तो ये कैसे कह सकते हैं के सब भविष्यद्वक्ताओं और उनके संदेशों का मूल एक ही है?
एक बाक तो बिलकुल पक्का है अगर हम इश्वर की प्रकृति या अन्य सैद्धांतिक भेद के बारे में बात करें के ये बहुत से विचार एक दुसरे के कट्टर विरोधी रहे हैं और इन्हें सामंजस्य नहीं किया जा सकता है. तो संक्षेप में बहाई विश्वास एक पूरा रहस्योद्घाटन नहीं है बल्कि बहुत से प्रतिस्पर्दी धार्मिक परंपराओं को मिलाने और संस्कारी बनाने के प्रयास में एक विरोधाभास है.
इसके अलावा एक और तत्व है जो इस आंदोलन को अस्पष्टता मैं छोड़ता है और वो बात ये है के वो मृत्यु के बाद के जीवन को परिभाषित नहीं कर पाते हैं सिवाय ये कहने के की बाइबल स्वर्ग और नरक के बारे में जो कहता है वो झूट है और ये अवधारणा केवल प्रतीकात्मक है.
बहाई में केवल कुछ ऐसे विचार हैं के दिवंगत आत्मा प्राणि एक अस्पष्ट वास्तविकता में किसी भी तरह अपने अस्तित्व को जारी रखते हैं. फिर भी बाईबल मृत्यु के बाद जीवन के विषय में एक विशिष्ट विचार देता है और इस घटना को चिकित्सा के अधिकारियों द्वारा प्रलेखित किया गया जिसमें स्वर्ग और नरक के लिखित चित्रण भी मौजूद है.
इसके अलावा बहाई के बीच, सच अनुकूली है और फिर भी सच्चाई समय को अतिक्रमण करता है और ऐसा जरूरी नहीं है वो समकालीन समाज के लिए सापेक्षिक हो जो लोगों के भावनात्मक जरूरतों पर आधारित रहके “क्या काम करता है” उसको फिर से परिभाषित करे. आज के लिए क्या सच है इसे कल की गलती के रूप में या भविष्य के भूल के रूप में मानना सत्यवादिता प्रमाणित नहीं करता है सिवाय इसके के ये कहा जाए के ये बात व्यक्तिगत पसंद की ओर समकालीन नहीं था.
इस आंदोलन के लिए एक और विरोधावास महिलाओं की समानता के विषय में इसका विचार है और फिर भी अभी तक वे यूनिवर्सल हाउस अफ जस्टिस के नौ नेताओं के बीच सेवा करने में सक्षम नहीं हुए हैं और सिर्फ यही नहीं लेकिन और भी सीमाएं हैं जिसमें दुनिया के कम ही मान्यताओं / धर्मों को जगह मिला है जो इसको सार्वभौमिक ना बनाकर संकीर्ण बनाता है.
स्पस्ट रूप से इश्वर एक निजी व्यक्तित्व हैं और इसी लिए उन्होंने हमें सामाजिक प्राणी बनाया है जिससे हम रिश्तों के आधार पर हमारे प्यार और भावनाओं को आदान – प्रदान करते हैं जिसकी वजह से हम केवल मानव को छूने के लिए ही नहीं तरसते बल्कि कभी कभी हम में एक गहरा इच्छा होता है के जीवन और प्रासंगिकता के मुख्य सवालों को समझने के लिए हम किसी वास्तविकता से आत्मिक रूप से जुड जाएँ जो हम से भी परे हों. ये खोज केवल एक मानव आविष्कार नहीं है, लेकिन ये हमारे भीतर ऐसे डाल दिया गया है के हम अनिवार्य रूप से तलाश करेंगे और इश्वर को पाएंगे.
इश्वर ने हमें उनके शानदार रचना के प्रदर्शन के लिए एक सामान्य रहस्योद्घाटन जैसा सिर्फ एक उदात्त उपहार नहीं दिया है बल्कि उन्होंने अपना प्यार प्रकट करने के लिए अपने अकेले पुत्र को , पुत्रों को नहीं , भेजा ताकि जो कोई भी उनमें विश्वास करेगा उसे अनंत जीवन का निश्चित्ता मिल जाएगा. यीशु परमेश्वर के व्यक्तित्व का सटीक प्रतिनिधित्व थे जैसे वो एक प्यार करने वाले इश्वर के व्यतिगत प्रकृति को अपने मानवता में दिखाते थे और जिसके द्वारा उन्होंने नाशवान का चिन्ह भी लिया जिससे उनके निस्वार्थ और वीर प्यार को एक मासूम बलिदान के रूप में देखा जा सके. मानवता में उनकी भागीदारी एक दास के तरह था जिसका ये मतलब नहीं है के उन्होंने ज्ञान के कुछ रहस्योद्घाटन दिए बल्कि उन्होंने हमारे लिए अपना जीवन दिया ताकि एक पवित्र और धर्मी इश्वर के आगे हमारे सभी अपराध को नष्ट करके हमारा औचित्य साबित हो सके. इश्वर इससे ज्यादा कितना व्यक्तिगत हो सकते हैं के उन्होंने सम्बन्ध अनुकूल बनाने के लिए मांस और हड्डी का कपड़ा धारण करने में भी भाग लिया.
मैंने संक्षेप में ये समझाने की कोशिस की है के बुराई एक वास्तविकता है और इसे कम करके भ्रामक नहीं बनाना चाहिए और ये केवल एक मानविय कमजोरी या दोष भी नहीं है बल्कि ये न केवल मानव जाति के खिलाफ लेकिन सृस्टीकर्ता के खिलाफ एक गंभीर उल्लंघन और विद्रोह का अपराध है. कृपया अपने होश को संप्रेषित मत कीजिए क्योंकि यह एक नैतिक कंपास है जिसके द्वारा इश्वर ने भीतरी रूप से उनके कानूनों को हमारे दिल में डाल दिया है जो या तो हमारे कार्यों की निंदा करता है या तो पुष्टि करता है. इश्वर ने इस बात को गंभीरता से लिया है और मैं आपको इसी तरह यीशु के बचाने की शक्ति में विश्वास करने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ.
अंत में धर्म के इस वैश्वीकरण एक अच्छा विचार के जैसा दिख सकता है या फिर युद्धरत गुटों के विविधता के लिए धर्म के माध्यम से एकीकरण पाने के लिए एक जबाब हो सकता है पर क्या ये आंदोलन वास्तविकता पर आधारित है? इस सब के बाद भी क्या हम धर्म और शिक्षा के वाहन का उपयोग करके एक नया और बेहतर दुनिया बनाने के लिए सांसारिक प्राणियों पर निर्भर हो सकते हैं और हमने इन उन्नत समाज को सबसे अच्छे रूप में भी विफल होते हुए देखा है.
दूसरों की मदद करने के आदर्शों को रखना एक सम्मानजनक बात है, पर क्या ये एक ऐसा ही काल्पनिक अस्तित्व बना सकता है जिसमें मनुष्य अपना ही भाग्य बना सकते हैं? धार्मिक समाजवाद का ये रूप मानव स्वभाव की इच्छा में विश्वास करने से आता है और इसमें ना कभी ऐसा गुण था और ना होगा जिसको मसीहा के पुनरागमन के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है जो सैद्धांतिक रूप से इस स्थिति को अनुचित बनाता है.
इस मानवीय दृश्य और बाइबिल दृष्टिकोण के बीच अंतर यह है कि बाईबल इस बात पर जोर देता है के इश्वर वास्तविकता का क्रम ला रहे हैं और उसके विपरीत में इंसान के नैतिक प्रयास हैं जो स्वर्ग तक पहुँचने के लिए दूसरा बाबेल का टावर बनाने की कोशिश में जूटा है.
अन्त में, अगर आंदोलन में खुद ही आंतरिक विसंगतियां हों जैसे के इसके कई विघटन जिसमें स्प्लिन्टर समूह या किसी भी अन्य किरच के प्रावधान के तहत असंतुष्ट लेलैंड जेन्सेन के विदेशी दावें भी इनमें सामिल हैं जिसको उनके मुख्यधारा आंदोलन के आधार पर विधर्म विचार कहा जा सकता है, तो वो ये कैसे यकीन से कह सकते हैं के ये मुख्य फसल शांति और एकता का फसल लाने में असफल नहीं होगा?
इसके अलावा सब का प्रतिनिधित्व करने का ये आंदोलन कैसे दावा कर सकता है जब के दुनिया के अन्य धार्मिक विचारों में इतना बड़ा मतभेद है के बहाई के अनुसार कुछ को तो अपना धार्मिक स्थिति को ही दूर कर देना चाहिए. इन प्रकार के उद्देश्योंको थोपना बहुलवादी ना होकर भेदभावपूर्ण है. इसके अलावा इन विपरीत दृश्य के खिलाफ बहाई का न्याय उस तनाव को दूर नहीं करता नहीं इन मतभेदों का खंडन करता है विशेष रूप से क्योंकि ये आंदोलन सच को सापेक्षिक रूप से देखता है.
सब निष्पक्षता में मानव जाति की भलाई की दिशा में इस संगठन के आदर्श सराहनीय हैं, लेकिन क्या ये प्राप्त हो सकता है? विश्व शांति और समानता के उनके सामाजिक स्थिति वांछनीय है, लेकिन क्या यह प्राप्य हो सकता है ? वे जो सिखाते हैं वो खुद भी मानकर सक्रिय हैं जो उनके धार्मिक विश्वासों को अभ्यास में डाल रहा है फिर भी क्या ये उसके सफलता के परिणाम को सुनिश्चित करता है या फिर ये सिर्फ आकाश का एक फल है?
मानवता में अपना विश्वास रखने से आपको निराशा का सामना करना पड़ेगा विशेस करके उनके लिए जो एकीकृत दुनिया के अपने आदर्शों को पकड़ कर नही रखते और मसीहा के दुसरे आगमन के बिना ये कभी पूरा नहीं हो सकता है. राजनीतिक और धार्मिक रूप से बिगड़े हुए दुनिया में इजराइल की तरह एक सुन्दर बगीचा होने से ये बात तो नहीं पक्का होता के एडन का बगीचा समाज के उद्धार के लिए फिर से बहाल हो जाएगा.
कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ
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jesusandjews.com/wordpress/2011/02/10/bahai-faith/
Excerpts taken “From Handbook of World Religions, published by Barbour Publishing, Inc. Used by permission”
AMG’s World Religions and Cults, AMG Publishers, Chattanooga, Tennessee
“Reprinted by permission. “(Nelson’s Illustrated Guide to Religions), James A. Beverley, 2009,Thomas Nelson Inc. Nashville, Tennessee. All rights reserved.”
Find It Quick Handbook on Cults and New Religions
Copyright © 2005 by Ron Rhodes
Published by Harvest House Publishers
Eugene, Oregon 97402
Used by Permission.
जब पहली बार मैं इस धर्म का शोध कर रहा था तब मैंने देखा कि इसमें कई प्रशंसनीय गुण थे जो अच्छी सोच रखने , सच बोलने , और अच्छे कार्य करने जैसे बात सिखाते हैं. हालांकि, विश्वास का ये संरचना पूरी तरह से अन्य धार्मिक विचारों के लिए अद्वितीय नहीं है जिसका उद्धार के लिए सकारात्मक काम से संबंधित कार्यक्रम है.
इसके अतिरिक्त, ये विशेषताएं सम्माननीय हैं, लेकिन वास्तव में क्या वो प्राप्य हैं और अंतत : कोई उनके आध्यात्मिक प्रगति को कैसे मापन कर सकते हैं? इस सब के बाद इस आंदोलन ने भी स्वयं के मानकों का उल्लंघन करके अपने हिस्से का नैतिक संघर्ष पालिया है जैसे के (१) दो पवित्र युद्ध और इसलिए अगर यह धर्म अपने अतीत से बदनाम होचुका है तो उनका अनुसरण करने वालों के लिए स्वर्ग की निश्चितता ये कैसे दे सकता है?
इसके अलावा एक स्थिति है जिसका मैं कोई आधार नहीं देखता और वो मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में उनके विचार हैं. मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में मैंने पहले ही एक ब्लॉग में लिखा है और ऐसे लोग रहे हैं जिनका वैज्ञानिक अध्ययन किया गया और इस दौरान उनका अस्थायी रूप से नैदानिक मौत भी होगया जिसकी वजह से उन लोगों को मृत्यु के करीब का अनुभव मिला और ऐसे कुछ गवाहिओं में कहा गया है की उनको अस्थायी रूप से नरकीय दायरे में नालेजाकर जैसा पारसी धर्म कहता है , सीधा स्वर्ग में ले जाया गया .
ये स्वर्ग और नरक के अनुभव शास्त्र के मृत्यु और नरक की गवाही से मिलते हैं जिसमें कहा गया है के येशु के पास स्वर्ग और नरक का चाभी था जिसके द्वारा उनके बदले की मौत के माध्यम से उन्हें एक जीत हासिल हुआ है जिसकी वजह से प्रचारक पौल ‘हे मौत कहाँ है तुम्हारा डंक’ कहके चिल्लाए. पॉल ने मौत को इस जीवन के प्रस्थान के लिए एक स्वागत निमंत्रण की तरह और पीड़ा के बजाय आराम की आशा के रूप में देखा, फिलीपी १:२१-२४.
जो मसीह में हैं उन लोगों को बाइबल ये कहता है के वो डर के अधीन में नहीं होंगे क्योंकि इश्वर का सही प्यार सब डर को निकाल देता है क्योंकि डर का न्याय के साथ लेना देना है. यही कारण है कि हम इश्वर के साथ हमारे संबंधों में विश्वास रख सकते हैं क्योंकि मसीह के मेधावी कर्मों के वजह से हम इश्वर के क्रोध से बच चुके हैं जिसमें उन्होंने नए जन्म के उत्थान के माध्यम से न केवल हमारे निजी जीवन में बुराई की शक्ति को दूर किया है बल्कि आने वाले जीवन में भी उसको दूर किया है और सुसमाचार के संदेश का सार भी यही है.
यीशु मसीह की अच्छी खबर दया और अनुग्रह से संबंधीत हैं जो पारसी धर्म के विधि संग्रह के आवश्यकता रहे हैं पर उल्लेखनीय रूप से विडंबना यह है के अभी तक इन आचरण के तत्वों का सर्वोच्च अच्छाई के मानक के सम्बन्ध में बहुत ही सीमित लाभ रहा है जो अहुरा मज़्दा की प्रकृति में भी है.
तो क्षमा को मुख्य रूप से मानवता के लिए एक नैतिक मोती मानना इश्वर के लिए एक कलंकी आरोप है जिन्होंने हमें इस अनिवार्य और नैतिक आवश्यकताके साथ बनाया है. इसलिए क्षमा को निर्माता के साथ नहीं जोड़ना उसके बुरे समकक्ष ‘क्षमा नदेने’ का शिकार बनना है और इसलिए ये एक सवाल पूछता है के ये बात भगवान जैसे सर्वोच्च मानक पर लागू क्यों नहीं होता? अब क्या आशा बाकी रहा है अगर हम दुविधा में हैं के इश्वर पर कैसे विश्वास करें जो अनिवार्य रूप से आपके सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद आप के वापस आने का अनिवार्य रूप से इंतज़ार कर रहे हैं?
वैसे भी यह सिर्फ एक दार्शनिक तर्क की तरह लगता है लेकिन करीब से अवलोकन करने पर यह सच में इस मामले के दिल तक जाता है और वो बात ये है के अनुग्रह, दया और क्षमा जैसे मानव घटक सिर्फ प्यार के इंसानी रूप के बारे में ही नहीं बात करते बल्कि वो पापी इंसानियत के लिए परमेश्वर के लंबे समय के पीड़ा का चिन्ह देता है और यही बात हम मसीह के काम और व्यक्तित्व में सीधे रूप से देखते हैं जो न्याय और प्रेम के बिच के बल के तनाव को हटा देते हैं और ये वो अपना जीवन इंसानी वेदी पर बलि देकर और हमारा सम्बन्ध इश्वर के साथ शांतिपूर्ण करके करते हैं.
इस धर्म के लिए एक और विसंगति ओह्र्मज्द की प्रकृति के विषय में उनका धार्मिक स्थिति के बारे में है जो उनके अपने ही विभिन्न पदों पर स्पस्ट रूप से विरोधी हैं.
मैं भगवान के साथ उनके व्यक्ति के रहस्य में अतिक्रमण की एक निश्चित सीमा तक स्वीकार कर सकता हूँ लेकिन उनके होने के ओंटोलोजीकल श्रेणियों में संघर्ष प्रतीत होता है और वो ये है के पारसी धर्म मोनोथेइस्टिक विश्वास रख्ता है जो अपने सबसे अच्छे रूप में बहुदेववाद और देवपूजा के मकसद के साथ हेनोथेइस्टिक प्रतीत होता है. उनके विशवास के भगवान की परस्पर विरोधी प्रकृति के बारे में काफी विरोध और संघर्स है. तो अगर वे मजबूत आधार नहीं बना सकते जिसमें वो अपने इश्वर के समझ में आगे नहीं बढ़ सकते तो वो कैसे ये मान सकते हैं के वो इश्वर तक पहुँचने के लिए अपने अन्य सैद्धांतिक मान्यताओं को मानकर सही रास्ते पर हैं?
सोच की यह विविधता इस धार्मिक संप्रदाय पर बहुत से पूर्वी धर्मों के प्रभाव की वजह से भी हो सकता है. हालांकि जोरास्टरको, कई अन्य धार्मिक नेताओं की तरह कथित रूप से सच्चा धर्म को परिभाषित करने के लिए अंतर्ज्ञान का एक मनोददृष्टी मिला, इसके बाबजूद भी इस धर्म ने अपनी भारत – ईरान के साथ जुड़े पृष्ठभूमि के आधार पर उधार लिया है.
इसी तरह, पारसी धर्म और जूदेव ईसाई विश्वासों के बिच उल्लेखनीय समानताएं हैं और कई ने तो ये भी कहा है के पारसी धर्म ने इन दोनो विश्व के विचारों को प्रभावित भी किया है पर ये वास्तव में विपरीत हो सकता है क्योंकि पारसी धर्म के वर्तमान दिन के कई सारे लेख इशाई के आगमन तक काफी हद तक मौजूद नहीं था और पारसी धर्म के बारे में बहुत से चीज जो जाना जा सकता था जैसे के अवेस्ता या तो गुम होगया या फिर टूट गया जो इक इंसान को इस सोच में डाल देता है के सुरु का मूल सामग्री क्या था.
ये हमें इस बात को भी सोचने पर मजबूर कर देता है के क्या खुद जरथुस्त्र को पता था के अपने धर्मग्रंथ के बीच उसे किस प्रकार से जिम्मेदार ठहराया जा रहा है.
आपको पता है कि यह समझ से बाहर या अथाह बात है के एक सर्वोच्च रहस्योद्घाटन जैसा महत्वपूर्ण चीज इश्वर के संरक्षण के कुप्रबंधन की वजह से खो जाएगा क्योंकी पारसी के भविष्य की पीढ़ियों के लाभ के लिए इन ग्रंथों को बचाना तो आवश्यक था. केवल यही बात नहीं है लेकिन विश्वास की इस अभिव्यक्ति का ही सालों के बाद परिवर्तन हो चुका है ताकि अपनी अभिव्यक्ति को आधुनिक दिन की पूजक के लिए संशोधित किया जा सके फिर भी इस धर्म के मूल उद्देश्य के लिए ये बात सही कैसे हो सकता है?
इसके अलावा किस अधिकार से आधुनिकतावादी या संशोधनवादी विचार इस विशवास के शुद्धतम अभिव्यक्ति को खत्म करने के दिशा में आगे बढ सकते हैं जबके इसी धर्म के पूर्व विश्वासी के लिए सब कुछ ठीक था जो पशु बलि जैसे संस्कार में भाग लिया करते थे?
वैसे भी एक और विवादास्पद अभ्यास ये है के इस विश्वास के उपासक पेय के रूप में मादक(२) हओमा उपभोग करते थे जो के दवा का फेरबदल करने वाला पदार्थ है और जो जादुई अभ्यासों से सम्बंधित है जिसमें इंसान एक चढ़े हुए स्थिति में चला जाता है जिसमें इंसान खुद को सैतानी शक्तिओं के लिए खोल देता है. पुजारी के सदस्यों के बीच भी जिसको (३) मागी बुलाया जाता है उनका जादू के लिए हमारा आधुनिक शब्द से सीधा सम्बन्ध रहता है जो ये दर्शाता है के इस आंदोलन पर शैतानी प्रभाव या पृष्ठभूमि है.
इसके अलावा मेरा मानना है कि पारसी धर्म के बीच एक परस्पर विरोधी अभ्यास ये भी है कि उनमें से कई व्यक्ति धर्म परिवर्तन को अस्वीकार करते हैं जिसमें एक धर्म में से दुसरे का विवाह को भी वो निषेध करते हैं और शायद यही कारण है के इस आंदोलन की संख्या घटता जा रहा है और व्यवस्थित रूप से विलुप्त होता जा रहा है और फिर भी परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भविष्य की पीढ़ियों तक कैसे पहुंचाया जा सकता है और उनको आगे बढ़ने के लिए कैसे प्रोत्साहित किया जा सकता है अगर ये धर्म ऐसे कम होता जाएगा और खो जाएगा और एक दिन सिर्फ इतिहास में ही बाकी रह जाएगा?
खैर मैं समापन में ये उम्मीद करता हूँ के इस पोस्ट को सिर्फ एक अच्छा माने जाने वाले धर्म को कोसने के रूप में नहीं लिया जाए बल्कि मुझे आशा है कि यह भक्तों के लिए एक चुनौती के रूप में हो जिसको वो एक परम सत्य के आदेश के रूप में देखते हैं. इसके अलावा वो लोग जिसका इस आंदोलन के साथ का रिश्ता सिर्फ एक सांस्कृतिक अनुष्ठान के मामूली भक्ति के लिए है आप के लिए मेरा प्रोत्साहन ये है के झूठ की प्रणाली से मुक्त होने के लिए खुद को तैयार करने के आध्यात्मिक मामलों के बारे में आप और अधिक गंभीरता से सोचने का साहस रखें.
अंत में, उन लोगों के लिए जो अभी भी अपनी खोज में खुले हैं, क्या आप इश्वर से जुड़ने के अपने आत्मा के लालसा को पूरा करने के लिए सक्षम हुए हैं और आपके खोज ने आपको मरे हुए धर्म के खालीपन को गले लगाने के लिए छोड़ दिया है?
शायद आप इस धार्मिक आदेश के परिणाम और संभावनाओं से थक गए हैं औप इसी लिए येशु ने मती ११:२८-३० में कहा “”हैं “अरे ओ थके-मांदे, बोझ से दबे लोगों! मेरे पास आओ , मैं तुम्हे सुख चैन दूँगा. मेरा जुवा लो और उसे अपने ऊपर संभालो. फिर मुझसे सीखो क्योंकि मैं सरल हूँ और मेरा मन कोमल है. तुम्हे भी अपने लिए सुख-चैन मिलेगा. क्योंकि वह जुवा जो मैं तुम्हे देरहा हूँ बहुत सरल है. और वह बोझ जो मैं तुम पर डाल रहा हूँ, हल्का है. ”
धर्मशास्त्र के १ यहुन्ना १:९ में ये भी लिखा है “” यदि हम अपने पापों को स्वीकार कर लेते हैं तो हमारे पापों को क्षमा करने के लिए परमेश्वर विश्वसनीय हैं और न्यायपूर्ण हैं और समुचित हैं. तथा वह सभी पापों से हमें शुद्ध करता है.”
यह सफाई पूरी तरह से प्रभावोत्पादक है सिवाय कर्मकांडों या स्वच्छ धोने के औपचारिकता के. वास्तव में , सफाई भक्ति के बाद नहीं आता है बल्कि यीशु ने कहा के कप के अंदर सफाई होना चाहिए जिससे वो इंसान के दिल के गंदगी को हटाने के बारे में कहना चाहते थे सिवाय मानव के बाहिर के गन्दगी के बारे में कहने के. ये केवल तभी संभव होगा अगर वो आप को एक नया प्रकृति दें जिसके परिणामस्वरूप आप को एक नया दिल और सोच मिलेगा.
कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ
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जब इस धार्मिक विश्वदृष्टि पर विचार करें तो इसमें कई आकर्षक सुविधाएं हैं और परोपकारी काम भी हैं जैसे की अस्पतालों, स्कूलों और पानी परियोजनाओं की स्थापना. और ये दूसरों को प्यार देने का अवधारणा भी रखता है और इस बात को महिलाओं की समानता और जाति व्यवस्था को ना मानकर प्रदर्शन भी किया है. इसके अलावा वे विश्वास करते हैं कि धर्म को तभी मूल्यवान कहा जा सकता है अगर वो केवल दार्शनिक प्रस्ताव का समर्थन करने के बजाय सामाजिक रूप से भी सक्रिय है.
जिस स्थितिमें में मैं चुनौती दे रहा हूँ वो तब है जब वो धार्मिक विश्वास प्रणाली जो एक पवित्र सच्चाई है उसको परिभाषित करके इन सामाजिक सीमाओं की अवलेहना करते हैं.
उदाहरण के लिए परमेश्वर के बारे में विचारों के विषय में संवाद करते समय उनको अलग अलग नाम या शीर्षकों से पुकारे जानेवाले एक ही व्यक्ति के रूप में मानना इस बात पर असंगत है के तुलनात्मक धर्मों के अध्ययन के दौरान ये मालूम पड़ता है के एक ही भगवान सब के लिए सार्वभौमिक नहीं है और बदले में इन कई धर्मों के इश्वर के विषय में विरोधात्मक दृश्य है जो उनके संबद्ध सैद्धांतिक मान्यताओं के साथ अमाननीय है. एक ईश्वर के होने का यह बहुलवादी और मिश्रित आदर्श अच्छा लगता है, लेकिन सभी धर्मों का अनिवार्य हिस्सा को संगठित करने की कोशिश हमें कोई इश्वर ना होनेके विचार के तरफ नितृत्व करता है.
इस आंदोलन के अनुसार अगर प्यार लोगों के धार्मिक विचारों का आधार है तो उन धर्मों का क्या जो हिंसा का समर्थन करते हैं ? इसके अलावा, अगर धर्म समानताएं पर निर्धारित किया जाना चाहिए तो फिर उन धार्मिक दृष्टियों का क्या जिनका विशिष्टता एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसके इलावा इनकी कोई मान्यत नहीं है?
अगर इश्वर की धारणा सिर्फ एक तुलनात्मक धारणा है और वास्तविकता नहीं है तो इन सब का कोई कुछ मान्यता ही नहीं रह जाता है और धर्म सिर्फ एक प्राथमिकता का मामला बन जाता है जैसे के हम कार खरीदते समय या किसी खेल के समय टीम के ब्रांड का चयन करते हैं. मूलतः ज्यादा धर्म इस विकल्प पर विचार ही नहीं करते हैं और बिना भेद धर्म विलुप्त हो जाएगा .
तो अनिवार्य रूप से ये विचार के सब रास्ते इश्वर के तरफ नेतृत्व करते हैं ये इन धार्मिक प्रणालियों का एक अधिक सरलीकरण है और अगर आप इनकी अध्ययन करने लगे तो ये पता चलता है के ज्यादा समय ये एक तरफ ना आकर विपरीत दिशा में जाते हैं. इसके अलावा अपने धर्म में गंभीर होना सत्य के तरफ जाना भी तो नहीं है क्योंकि आप अपने धार्मिक विचारों में ही पूरी तरह से गलत भी तो हो सकते हैं. वैसे भी मैंने इस बारे में एक पोस्ट लिखा है.
सभी रास्ते परमेश्वर तक ले जाते हैं
सत्य साई बाबा के मेरे विषय पर वापस आएं तो वो वास्तव में सिर्फ हिंदू विचारों से पहले ही व्यक्त विचारों का ही फाइदा उठा रहा है और इसके लिए उन्होंने लोगों को सुविधा करने के लिए उन धार्मिक प्रणाली को पुनर्गठन किया है. हालाँकि, अपनी माँ धर्म से अलग सैद्धांतिक दृश्य बनाने से पता चलता है कि उनके समानताओं से भेद महत्वपूर्ण और आवश्यक है. ये एक दिल्जस्प बात है के कैसे साईं बाबा ये अंकित करते हैं के उन्होंने एक विशिष्ट धर्म का स्थापना नहीं किया है और फिर भी उनको अपने आंदोलन को १९७६ में सत्य साई बाबा सोसायटी के रूप में एक धार्मिक रूप देने की आवश्यकता लगी.
साई बाबा से संबंधित कई शिक्षाओं को साई की सच्चाई का नाम दिया गया है जिसका मतलब है कि अगर सच है तो गैर सच भी होना चाहिए क्योंकि एक पोल दुसरे पोल के बिना मौजूद नहीं होसकता और इसलिए ये व्यक्तिगत प्रकृति धार्मिक संस्कृति को निर्धारण करता है.
इसके अतिरिक्त, वेदों में एक ऐसी बात है के उसको अन्य पूरक धार्मिक ग्रंथों से अधिक जोर दिया जाता है और उन पूरक धार्मिक ग्रंथों को व्यापक अध्ययन के लिए अनावश्यक बताया गया है और शायद वो विपरीत विश्वास को दिखाए जो संसार के और विश्वासों से सम्बंधित पर सत्य साईं के युग के विपरीत हों.
इसके अलावा, अगर उनमें कोई अंतर नहीं है तो वे मुख्य रूप से सिर्फ पूर्वी छुट्टियाँ मनाने के बजाय सभी धार्मिक त्योहारों को समान रूप से क्यों नहीं मानते?
साई बाबा के धार्मिक विचारों का एक अन्य विवादास्पद पहलू यह है कि वह स्वयं को भगवान (ओं) मानता है . विडंबना यह है कि कैसे उन्हें अपने भक्तों से ऊपर उठाया जा सकता है जब उनके ही सर्विश्वर्वाद दृश्य से तो वे सभी देवता हैं?
“रॉक स्टार” कहलाना एक बात है, लेकिन एक देवता के रूप में सम्मानित किया जाना बिल्कुल ही दूसरी बात है.
सत्य साई बाबा के अनुसार वह पूर्व गुरु शिर्डी साई बाबा जो भगवान शिव का अवतार माना जाता था उनके अवतार हैं और फिर भी सिरडी का तो सत्य साईं के जन्म के ८ साल पहले ही मृत्यु हो चुका था और इस समय के फरक को क्या माना जा सकता है. इसके अलावा सत्य साईं शिव और शक्ति दोनों के अवतार होने का दावा करते हैं और फिर भी वो द्वैतवादी व्यक्तित्व के समस्याओं के बिना दूसरे देवत्वारोपण लेने में कैसे सक्षम थे?
वह ये भी दावा करते हैं कि उनके मृत्यु के ८ साल बाद वह प्रेमा साई बाबा के रूप में फिर से पैदा होंगे जिसमें वह किसी तरह शक्ति के पक्ष में शिव को खो देंगे और वो पिछले पागलपन के अवस्था से एक ही पहचान में लौट आएँगे.
इसके अलावा, अगर उनको ज्ञान या मोक्ष प्राप्त होचुका है तो उनका अगले साई बाबा के रूप में इस पृथ्वी में पुनर्जन्म की क्यों आवश्यकता है क्योंकि पुनर्जन्म में कर्म होता है जो पूर्णता की कमी का प्रतीक होता है?
साई बाबा की जीवनी देखते समय मुझे यह संदिग्ध लगता है क्योंकि जहां तक एक चमत्कारी गर्भाधान और चिन्ह और चमत्कार का सवाल है यह कुछ हद तक यीशु के जीवन का नक़ल लगता है. इन कथित चमत्कार के कुछ उदाहरण को या तो जादुई या तो प्रवंचना के रूप में वर्णित किया जा सकता है. इन अभिव्यक्तियों में से कई केवल जिज्ञासा की लालच को संतुष्ट करते हैं और इस तरह के कार्यों के नाटकीय रूपांतर के इलावा इनका कोई फाइदा नहीं है.
इसके अलावा इन प्रकार के प्रदर्शनों से देवता को साबित नहीं किया जा सकता क्योंकि ये चीजें अन्य आध्यात्मिक नेताओं के बीच भी हुआ है.
इसके अतिरिक्त, एक अलौकिक घटना किसी के प्रकृति को साबित नहीं कर सकता जो अच्छा या बुरा हो सकता है. सिर्फ चमत्कार या चिन्ह देवता को निर्धारित करने के आधार नहीं हो सकते पर वो सिर्फ सच्चाई बताते हैं उन चीजों के बारे में जो सच्चाई से परे या फिर अभौतिक होसकते हैं या सिर्फ ये हो सकता है के आँख से हाथ तेज हो.
इसके अलावा, अगर वो चमत्कारी क्षमताओं के साथ एक दिव्य स्थिति मैं हैं तो उन्हें उन पहियों वाले कुर्सी में बंधे रहने और टूटी हुई कूल्हे के साथ जीने के लिए किस चीज ने बनाए रखा है जबतक वो किसी और के जितना ही नश्वर हैं?
जब साई बाबा को उनकी चमत्कारी शक्तियों के लिए अध्ययन का सामना करने को कहा गया तो उन्होंने मना कर दिया और फिर कहा के दृश्य अभिव्यक्ति भ्रामक हो सकते हैं और ये बात कह कर वो अपने ही कार्यों के आलोचक बनगए हैं.
इस के अलावा मुझे यह अविश्वसनीय लगता है के वो अपने विषय में बयान देते हैं कि वह सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ हैं . इसका मतलब है कि वह सब कुछ जानते हैं और अंततः सब कुछ नियंत्रण कर सकते हैं और अगर ये मामला है तो वह पूरी तरह से उन सभी तत्व को हटा क्यों नहीं देते हैं जो मानवीय पीड़ा का कारण है और जो उन्होंने करने की कोशिश भी की है, लेकिन सीमित सफलता के साथ. जहाँ तक सभी ज्ञान अच्छी तरह से होने की बात है ठीक यही तरीका है जिससे पंथ के नेता दूसरों के दिमाग धोते हैं जिसके द्वारा वे उनके आध्यात्मिक मार्गदर्शक के अधिकार पर सोच और प्रश्न नहीं कर सकते. बेशक सर्वव्यापिता को हासिल नहीं किया जा सकता है क्योंकि वह अभी भी एक नाशवान शारीर में रहते हैं और अगर उन्होंने अनेकदेशियता प्राप्त कर भी लिया हो जैसे के एक समय में दो जगहों पे रहना फिर भी वो सर्वव्यापिता तो नहीं क्योंकि वो अभी भी एक समय पर सभी जगह पर तो नहीं हैं जो के सर्वव्यापी होने का मतलब है.
उन्होंने यह भी विनम्र वयान दिया है के वो चेलों या अनुयायियों का होना नहीं चाहते हैं लेकिन बदले में लोगों को उन्हें पूजा करने के लिए बुलाते हैं.
वह एक तरफ कहते हैं कि वह प्रसिद्धि या प्रचार नहीं चाहते हैं और फिर भी अपनी महिमा के लिए संकेत करते हैं.
इसके अलावा अगर वह कोई अनुयायी नहीं चाहते तो उनका विभिन्न मंदिरों के साथ साथ १२०० धार्मिक संस्थाओं या केन्द्रों का होना क्यों आवश्यक है ? इसके अलावा, अगर वह एक स्थापित पंथ या सिद्धांत रखने की इच्छा नहीं करते तो उनको साईं सच के रूप में जाने वाले चीजों को सिखाने की क्या जरूरत है ?जो वे कहते हैं वो जो चल रहा है उसके खिलाफ है और ये बात इस धार्मिक आंदोलन को मानने वालों के लिए चेतावनी होना चाहिए.
जहाँ तक उनके अपने ज्ञान की घटना की बात है ये वर्षों के भक्ति और अच्छे कर्मों के माध्यम से उन्हें प्राप्त नहीं हुआ बल्कि उनके कम उम्र में बिच्छू से काटे जाने के बुरा कर्म के अंतर्गत हुआ जीसने उनके आध्यात्मिक अभिरुचि को जागृत कर दिया. एक बिच्छू का आत्मज्ञान प्राप्त करने में क्या महत्व हो सकता है? मुझे लगता है कि उनके पिता सही थे जब उन्होंने सोचा था के उनका बेटा शैतानी शक्तियों के प्रभाव में है.
भारतीय संस्कृति के भीतर के सामाजिक भेदभाव हटाने के उनके अपील का सामना करते वक्त भी सैद्धांतिक विरोधाभास है. विरोधाभास ये है कि अगर वह कर्म के प्रतिकारात्मक प्रकृति को मानते हैं, तो जाति व्यवस्था एक आवश्यक साधन बन जाता है जो सामाज से बहिस्कृत लोगों को दंडित करने का एक तरीका है और इस प्रणाली को इनकार करना उनके अपने द्वारा ही दिए गए कार्मिक बलों का खंडन करना है. मैंने इस बारे में और अधिक निचे के ब्लॉग में लिखा है.
jesusandjews.com/wordpress/2012/02/13/हिंदू-धर्म-और-पुनर्जन्म/
असंभव चीजों का एक और विरोधाभास अहिंसा के नुक्सान ना करने के नियम को पालन करना है जिसको जैन उनके ज़ोरदार और कड़े प्रयासों के माध्यम से भी पूरी तरह से नहीं मान सके हैं क्योंकि हरेक दिन के जीवन में सूक्ष्मजीवों को पीने या प्राणियों को कुचलने से खुद को बचाना बहुत मुश्किल है.
अंत में मैं इतना दूर तक नहीं जाना चाहता के मैं उनके पूर्व सदस्यों के दावे का समर्थन करूँ जिन्होंने साईं बाबा के खिलाफ दुरुपयोग का आरोप लगाया और जहां तक मेरा सवाल है जब तक उन्हें औपचारिक रूप से चार्ज नहीं किया जाता वो निर्दोष हैं.
हालांकि, मैं जो विश्वास करता हूँ वो ये है कि वो खुद को एक देवता कहने में दोषी हैं और ये दावा एक धोखाधड़ी है और उनके पास खुद को देवता साबित करने के लिए कोई विश्वसनीय सबूत भी नहीं.
इस मामले पर मेरी स्थिति किसी को अनावश्यक बदनाम करना नहीं है लेकिन अवलोकन करना है और आप के लिए एक चुनौती है के आप इस आदमी की स्थिति के बारे में पुनर्विचार करें.
मदर टेरेसा की तरह वह मानवता के लिए एक महान योगदान तो देसकते हैं पर ये बात उनको दिव्य अवतार के लिए योग्य नहीं बना सकता.
इसके अलावा, उन्होंने जीवन में महान चीजें पूरा किया है, लेकिन उन्हें मसीह के अनन्त काम के आगे विश्व के उद्धारकर्ता की श्रेणी में रखना अहेतुक है.
अंत में साई बाबा के पिता एक अभिनेता थे और यह कहा जाता है कि सत्य साईं इसी तरह ललित कला के क्षेत्र में प्रवीण थे और मैं बस ये सोच रहा हूँ के क्या ये सब एक नाटक ही हो सकता है जिसके द्वारा वह अपने पिता के नक्शेकदम पर चल रहे हैं और खुद को धार्मिक पृष्ठभूमि के मंच पर प्रस्तुत कर रहे हैं ?
कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ
अन्य संबंधित लिंक
jesusandjews.com/wordpress/2011/01/13/sai-baba/
Excerpts taken “From Handbook of World Religions, published by Barbour Publishing, Inc. Used by permission”
जैन धर्म एक असाधारण धर्म है जिसका नैतिक मानक काफी ऊपर है जो नैतिकता की दृष्टि से सराहनीय है लेकिन उसमें एक परोपकारी मकसद का अभाव है क्योंकि यह व्यक्तिगत आत्मज्ञान प्राप्त करने के द्वारा व्यक्तिवाद स्वार्थ की पूर्ति करना चाहता है .
इसके अलावा इस धर्म में मौलिकता का अभाव है क्योंकी ये दृढ़ता से हिंदू सोच पर आधारित है और यद्यपि इन दो दुनिया के विचार में विश्वास के अंतर हैं फिर भी ये साफ़ जाहिर(१) है की जैन धर्म अपनी माँ धर्म का संतान है.
इसके मूल के बारे में, जैन वर्धमान या महावीरको अपना समकालीन संस्थापक मानते हैं जो कहा जाता है के ४२ साल की उम्र में आत्मज्ञान की ऊँचाई पर पहुंच गए और परिणामस्वरूप दूसरों को इस तथाकथित वास्तविकताको पाने में निर्देश करने लगे.
हालांकि, इस विचार के लिए चुनौती यह है कि इस तथाकथित अवस्था को पा लिया ये जानने का कोई दृढ तरीका नहीं है और ये तरीका विशुद्ध रूप से व्यक्तिपरक है और कोई भी व्यक्ति इस अवस्था को पाने का दावा कर सकते हैं जबकि सच में ये उन्ही झूठे दावों में से एक और होसकता है जो दुसरे आध्यात्मिक और धर्मनिरपेक्ष नेताओं ने किया है.
इस के इलावा आत्मज्ञान, कर्म, और आत्मा की स्थानांतरगमन के विचार हिंदू अवधारणा रहे हैं और भले ही इन दोनों धर्मों के बिच विश्वास की बारीकियां हैं फिर भी इन सब में औसत दर्जे का अनुकूलता और समानता है.
अब मैं इस विस्तृत विश्वास प्रणाली की बारीकियों के बारे में सोच रहा हूँ के कैसे कोई अंतत उस ‘परम सत्य’को जान सकेगा क्योंकी निर्वाण से वापस कोई भी अपनी कहानी सुनाने के लिए नहीं आया. यह एक वास्तविक अनुभव है या जैन धर्म गुरुवों, स्वामिओं, देवों और नाथ पर उन्हें इस अवधारणा के विषय में ज्ञान अनुदान करने के लिए निर्भर हैं? वैसे भी मैंने मृत्यु के बादके जीवन पर और मौत के निकट के अनुभव के बारे में एक ब्लॉग लिखा था जो आपको उपयोगी लग सकता है.
इसके अलावा जैन धर्म कुछ असंगत दावा करते हैं के महावीर ऊपर से उतर आए जब के वास्तव में उनके सांसारिक माता पिता थे. इसके अलावा वो ये दावा भी करते हैं कि वह पाप (३) के बिनाका एक सर्वज्ञ थे और इसी लिए उनके लिए आत्मज्ञान प्राप्त करना संभव हो सका क्योंकि वो स्वर्गसे प्रबुद्ध होके उत्पन्न हुए थे? तो अगर वह पहले से ही पूरी तरह से बेगुनाह थे तो उनके लिए पहले एक समय में राजकुमार होना कैसे संभव था क्योंकि ये बात बाद में तो सम्पत्ति के बारे में उनके तपस्वी विचार से नहीं मिलता.
यदि महावीर एक सिद्ध प्राणी था तो उसने क्यों भिक्षुओं को पांच प्रतिज्ञा के तहत सभी महिलएं जिनके बारे में कहा जाता था के बुराई के साथ जुडी हैं उनसे बचने की हिदायत(४) क्यों दी जब की उसकी अपनि ही पत्नी थी? व्यावहारिक रूप से कहें तो जैन कैसे निःसंतान विलुप्ती से अपने विश्वास और समुदाय को बढाते और क्या शादी और बच्चे पैदा करने से परहेज़ द्वारा जन्म के संतुलन को प्राकृतिक बाधा नहीं होता?
विडंबना यह है कि अगर यह महिलाओं के विषय में मामला है तो क्यों कुछ जैन ने मल्ली नाथ नामक महिला को १९ वीं तीर्थंकर के रूप में मान्यता दी.
अब कुछ अन्य विश्वास जो इस धर्म को बनाने के विषय में है वहाँ विभिन्न विरोधाभासी स्थिति है जो उनके अनुयायियों के बीच सिखाया जाता है.
इन विश्वासों में से एक ये है कि पारंपरिक जैन धर्म जो महावीर को जिम्मेदार ठहराता है, वो इश्वर(इश्वारों) यस फिर एक सर्वोच्च शक्ति में विशवास नहीं करता जो बौद्ध धर्म के अपने भाई धर्म के जैसा लगता है फिर भी विडंबना यह है कि आज महावीर (६)को एक देवता के रूप में पूजा जाता है और ये बात विभिन्न धर्मों के विश्वासियों के बीच एक आम बात है जो समय के बीतते ही अपने संस्थापक को उठा कर देवत्व प्रदान करते हैं.
जैन धर्म ये भी संदिग्ध दावा करता है कि वे किसी व्यक्तित्व की पूजा ना करके केवल अवधारणा या विचार की पूजा करते हैं जो उनके आध्यात्मिक नेताओं ने अतीत में सिखाया था. फिर भी अन्य धार्मिक दुनिया का अध्ययन करने पर इन गतिविधियों के ही प्रकार के विचार और व्यवहार पाए जाते हैं जो उनके देवताओं की पूजा का वर्णन करते हैं.
जैसे भी नीचे झुककर प्रार्थना की पेशकश और तीर्थंकरों के आगे साष्टांग दंडवत करना और इन व्यक्तियों के प्रति पवित्र मंत्र का पाठ करना इन लोगों के धार्मिक पृष्ठभूमि के बारे में बताता है जो मेरे हिसाब से व्यक्ति के लिए एक मूर्तिपूजक रिश्ता दिखाता है.इसके अलावा इन व्यक्तियों के तस्बिरों को प्रस्तुत करना और इन व्यक्तियों के स्मरणोत्सव के रूप में छुट्टियों की स्थापना करना और मंदिरों और तीर्थस्थल बनाना इतने बड़े सम्मान की बात है के ये मानव मात्र के मान्यता और प्रेरणा से परे हैं. इसके अलावा इन लोगों के तस्वीरों को चढ़ाया जाने वाला प्रसाद को बहुत ज्यादा मान्यता दिया जाता है जितना के जैन स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं.
अमेरिका में उनको हमारे देश के नायकों में माना जाता है जो मुख्य रूप से सैन्य सेवा में इस देश की सेवा किए होते हैं और कम से कम साल में दो बार उनको उनके कृत्य के लिए सम्मानित किया जाता है क्योंकी सेवा के लिए उन लोगों ने निस्वार्थ भावना से अपने प्राण देदीए. इतना कुछ करने के बाद भी उनको उस चरम स्तरके सम्मान के नजदीक भी नहीं दिया जाता जो उनके श्रद्धेय लोगों को जैन धर्म में दिया जाता है.
तो हालांकि जैन धर्म एक परम व्यक्तित्व के बारे में बात नहीं करना चाहता पर पहचान निर्दिष्ट करके ये समान शब्द का उपयोग करते हैं जैसे के कार्मिक बलों, सार्वभौमिक चेतना या आत्मा ‘परम’.
लगता है के ये सब एक बुद्धिमान जीव को इंगित करता है लेकिन ये इस वास्तविकता को किसी प्रकार का अव्यक्तिगत बल बताकर भाषा से भागने की एक कोशिश है और फिर भी इन बलों का उस व्यक्तित्व के साथ संरचना की प्रकृति के आधार पर समानता है. मैं पहले ही कुछ ब्लॉगों में कोई परम जीव या फिर इश्वर के बारे में ब्रह्माण्डिक और धार्मिक विचारें लिखी है हो सायद आपके काम आ जाए.
Atheist and Agnostic
तो अगर जैन धर्म सर्वोच्च इश्वर के अवधारणा को खारिज करता है तो वो कैसे कार्मिक प्रतिशोध जैसे जटिल और व्यापक विषय के बारे में बता सकता है जो उनके दार्शनिक मान्यताओं के अनुसार नियंत्रण और संतुलन की एक अच्छे से प्रबंधित प्रणाली के रूप में प्रतीत होता है? इन बातों को और अधिक समझ बनाने के लिए अगर एक परमेश्वर होता जो सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी होता और अनन्त न्याय के इस समझ से बाहर की बात की देखरेख सकता?
विचार करने के लिए उनके विश्वासों से संबंधित कुछ अन्य बातों में अहिंसा के विचार या “कोई बुराई नहीं” नीति है जो चीजों को मारने या नोकसान पहुंचाने के हिंसा से अलग रहने (७)की प्रतिबद्धता है और फिर भी आप इस तपस्वी का भाग्यवादी अभ्यास के बारे में क्या कहेंगे जो सलेखाना के अधिनियम को पूरा करने के लिए खुद को भूख से मार देता है? क्या यह व्यक्तिगत चोट और खुद को नष्ट करना नहीं है? इसके अलावा, विश्वास की इस कठोरता पर जीना तो नामुमकिन ही है क्योंकि पानी में रह रहे हैं लाखों सूक्ष्मजीवों को पानी पीते समाय बचाना असंभव होगा. इस के अलावा गलती से कीड़े, सब्जियों, और लकड़ी को चोट पहुंचाने से कैसे बच सकते हैं जब विशेष रूप से अंधेरे में हर रोज चलते वक्त लोग अपने परिवेश से अनजान रहते हैं और इसलिए अनजाने में पैर के नीचे इन चीजों को रौंद देते हैं जिसके बारे में जैनियों का मानना है के ये मुक्ति के लिए बाधा लाएगा क्योंकि आपने इस अभ्यास का उल्लंघन किया है और मोक्ष को प्राप्त करना आपके लिए असंभव होगया है?
इसके अलावा एक व्यक्ति वास्तविक जीवन में जब एक हमलावर के आगे आजाए चाहे वह एक आदमी या जानवर हो तो उसका प्रतिक्रिया क्या होना चाहिए? उस व्यक्ति को खुद का बचाव करना चाहिए या फिर हमलावर को किसी लड़ाई के बिना खुद को मारने देना चाहिए?
कभी कभी लोगों को नुकसान देना पड़ता है जैसे कानून के दंड संहिता के साथ, जो व्यक्तियों को नियंत्रित करके अन्य प्राणियों के रक्षा के लिए आवश्यक होता है.
कई बार जीवन में ऐसे भी समय आते हैं जब किसीकी जिंदगी बचाने के किए किसी का जान भी लेना पड़ता है जैसे की एक माँ जो अपने बच्चे को जन्म देने के दौरान महत्वपूर्ण जटिलताओं का सामना कर रही है. जीवन की जटिलताओं के कारण कभी कभी दोनों दलों को अहिंसा के बारे में बराबर बनाना संभव नहीं होता.
इसके अलावा इस सैद्धांतिक बात को बनाए रखने और कायम रख्ते वक्त ये बुरा कर्म जो ब्रह्मांड में प्रतिशोध और न्याय के काम कर रहा है, उसके प्रभाव के विषय में समस्या पैदा कर सकता है. तो व्यक्तियों के सकारात्मक ढंग से बातचीत करके ये जीवन का संतुलन परेशान कर सकता है.
विश्वास के इस दर्शन के लिए एक और आपत्ति इसकी उपयोगिता और रोजमर्रा की जिंदगी की वास्तविकता में अपना जीवन बनाना है. एक तरफ तो जैन जीवनको नष्ट करने से मना करते हैं और फिर भी कई ऐसे हैं जो पूँजीवादी सांसारिक समाज की उद्यमशील जाल के तरफ चले गए हैं जो अक्सर लाभ की अवधारणा से जुड़े हुए रहते हैं और जिसके हमबिस्तर लालच और धन हैं. जैनियाँ अक्सर राजनीति(९) वाणिज्य, बैंकिंग और वित्त में भाग लेते हैं और भले ही वो व्यक्तिगत जीवन में किसी तरह अपनी स्थिति का औचित्य सिद्ध कर लें पर वो अनिवार्य रूप से कैसे सुनिश्चित करेंगे के वे उनके राजनीतिक उपस्थिति दूसरों के द्वारा दुरुपयोग करने के लिए अनुमति ना देकर धार्मिक अपराधों के लिए एक सहायक के रूप में शामिल नहीं होंगे.
जैनियों के सांसारिक संलग्नता के कुछ और पहलु उनके भारतीय दर्शन, कला और स्थापत्य कला में उनके प्रभाव और योगदान है. सांसारिक प्रभाव से इतना अलग हो जाना असंभव है के सांसारिक प्रभाव का ऐसा कोई रूप ही नहीं हो जो हमको और औरों को प्रभावित करता हो.
जैन धर्म के बारे में बात करते वक्त एक अन्य विवादास्पद बात उनके पवित्र ग्रंथों की मान्यता है जो दिगम्बरों और स्वेताम्बरों के संप्रदायों में विवादित है जिनका अपना लिपि भी नहीं है. (१०) ये दस्तावेज जो मौखिक परंपरा पर भारी निर्भर हैं वो महावीर के मृत्यु के १००० साल बाद तक भी अपने अंतिम और स्थायी रूप तक नहीं पहुंची थी. इस समय के दौरान इन दस्तावेजों में मूल संदेश से काफी बदलाव किया गया हो सकता है जो कहा जाता है के पुरवास नमक सबसे पुराना और सबसे विश्वसनीय पाठ से प्राप्त किया गया है और जो खो गया है.
हम जानते हैं कि मौखिक परंपरा की कमजोरियां होती हैं और बच्चों के रूप में हमारा व्यक्तिगत अनुभव टेलीफोन के खेल खेलते समय ये रहा है के क्या मूल संदेस है और कहा गया था इसमें भारी अंतर हो सकता है. तो अगर एक संदेश सिर्फ कुछ समय और स्थान के बिच कुछ ही मुंह और कान से गुजरता है तो अगर वो इतने विकृत हो सकते हैं तो अगर इन चलों को बढा दिया जाए तो ऐसा होने के संभावना कितने बढ जाते हैं.
और इस तरह से अगर ज्यादा समय गुजर जाए तो इसके सामग्री और ज्यादा मिथक और सुशोभित होजाते हैं और इनके सच्चाई के दावों को प्रमाणित करने के लिए और मुश्किल हो जाता है.
तो इस मापदंड के आधार पर क्या आप अपना विश्वास इस में रखना या अपने जीवन को दांव पर रखना चाहेंगे?
एक और विषय जो मेरे ख़याल से जैन के बीच एक गलत धारणा है के वो ब्रह्मांड के अनंत होने पर विशवास करते हैं.
अनुभववाद के आधुनिक विज्ञान करणीय या कारण और प्रभाव के नियम की समर्थन करते हैं के हरेक प्रभाव का एक मूल या ज्ञात ब्रह्मांड सहित मूल कारण होना चाहिए. आइंस्टीन की सापेक्षता के अपने सिद्धांत के माध्यम से धारणा ये थी के ब्रह्मांड की एक शुरुआत है और यह बाद में गणितज्ञों और हबल दूरबीन से भी पुष्टि किया गया जिसने ब्रह्मांड के विस्तार के संबंध में प्रकाश की परिवर्तन के बारे में बताया और ये प्रमाणित किया के ब्रह्मांड का एक प्रारंभिक बिंदु था जिसको सैद्धांतिक रूप से बड़ा धमाका का नाम दिया गया है. ये घटना कैसे हुआ इसके विवरण के बावजूद इस अवलोकन के बारे में कम से कम ऐसा एक संकेत है जो प्रासंगिक है और वो ये है के ये ब्रह्मांड जैसे हम जानते हैं इसका एक प्रारंभिक बिंदु था और यह अभी भी बढ़ रहा है.
एक और जैन शिक्षा जो विज्ञान के साथ संघर्ष करता है वो है उनका विश्वास के जो पहले तीर्थंकर थे रिषभ या रसाभा वो अरबों साल पहले रहते थे और अभी तक हम जीवाश्म सबूत से ये जान पाए हैं के मनुष्य उस समय में मौजूद नहीं था.
इसके अलावा जैन धर्म के विवादों में आनंद या फिर आनंद के खोज से दूर रहने की बातें हैं और फिर भी उनके प्रमुख विशवास ही निर्वाण को पाकर पुनर्जन्म से बचने की बातें हैं.
तो अगर खुशी और आनन्द से बचना ही है तो फिर पुण्य क्यों करें जो आपको सुखद अनुभूतियां देने की क्षमता रखता है?
यह खुशी की अवधारणा इन भाग लेने वाले जैनियों के द्वारा औरों पे भी असर डाल सकता है जो प्रसाद और सेवाएं भिक्षुओं को देकर उन भिक्षुओं के लिए समर्पित हैं और उन्हें सांसारिक संलग्नता (११) पर निर्भर करा रहे हैं.
जैन धर्म के खिलाफ एक और तर्क ये है के वो आध्यात्मिक विकास के विभिन्न स्तरों की अनुमति देते हैं जो सबसे निचे आम आदमी तक जाता है और फिर भी ये लगता है के इस आंदोलन के निचले सोपानक में शुरू करते ही वो लड़ाई हार रहे हैं क्योंकि वो किसी भी इंसान को कार्मिक बल के बढ़ने के वजह से फ़ायदा लेने का मौका नहीं देंगे और इसकी वजह से निर्जरा प्राप्त करना और मुश्किल हो जाएगा क्योंली कार्मिक चीजें बेअसर होजएंगी और थक जाएंगी.
अन्त में जैन धर्म अन्य धर्मों के लिए सहिष्णुता का दावा करती है ये कहके के कोई भी एकमात्र विश्वास सच नहीं होसकता तो क्या ये मामला इनके ही आंदोलन पे लागू होता है? यदी ये बात है तो ईसाई जैसे दुनिया के अन्य धार्मिक धारणों को अपनाने का ये रास्ता खोल देती है.
और ये कहना के कोई परम सत्य नहीं है खुद के लिए एक विरोधाभासी बयान है क्योंकि अगर वहाँ कोई निरपेक्षता नहीं है तो इसमें जैन धर्म के वो निरपेक्ष बयान भी सामिल होंगे जो कहते हैं के कोई परम सत्य नहीं होता.
वास्तव में जैन धर्म का अन्य धर्मों के साथ एक धार्मिक सहिष्णुता हो सकता है मैं ये नहीं मानता के जैन ये मानते हैं के और धर्मों में महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सत्य हो सकता है जो उनके पहचान से अन्यथा हैं क्योंकि अगर ये होता तो खुद को हिंदू, बौद्ध या ईसाई कहते उनको कोई दिक्कत नहीं होती. हकीकत में वे खुद को विशेष रूप से पहचान देते हैं अन्यथा वे इसे एक एकल धार्मिक श्रेणी के तहत उनके धार्मिक विश्वासों की प्रणाली को परिभाषित नहीं करते पर एक और भी मिश्रित या बहुलवादी रूप अपनाते जैसे के हम बही विशवास या न्यू एज आंदोलन में देखते हैं. इसके अलावा उनके विश्वास प्रणाली और अन्य धार्मिक दुनिया के दृश्य के बीच के फरक को वो कैसे लेते? क्या वे वास्तव में पुनर्विचार करके अन्य संभावनाओं को स्थान देने के लिए तैयार हैं जो उनके अपने विश्वासों के विपरीत हैं?
यदि ऐसा है तो मैं ईसाई सुसमाचार की सच्चाई या अच्छी खबर आप के साथ बांटने का मौका लेना चाहूँगा जो जैन धर्म के जैसे कोई व्यक्ति के जीवन को सुन्यबाद के घिनोने स्थिति में लेजाकर निराशा और उत्पीड़न के अवस्था में नहीं छोड़ता जहां जीवन के अवसर और लक्ष्य भुखमरी के एक आत्मघाती अधिनियम के माध्यम से पूर्वानुमानित किया जाता है.
कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ?
निष्कर्ष में जैन धर्म ने एक आंदोलन के रूप में पाप की स्वार्थी प्रकृति और पाप और न्याय की अवधारणा को इनाम और निर्णय के माध्यम से सकारात्मक रूप से पहचाना है.
अभी तक सच्चाई के इस सामान्य रहस्योद्घाटन जो इश्वर ने हमारे भीतर डाल दिया है वो उद्धारकर्ता या भगवान का हमारे लिए जरूरत को दिखाने के लिए केवल एक प्रारंभिक बिंदु है और वो हमें नैतिक चेतना या दिशा देने के लिए सिर्फ एक सुरुवाती विन्दु है. तो धार्मिक प्रथाओं का एक व्यापक प्रणाली विकसित करने के बजाय इश्वार का इरादा ये था के हमें निर्भरता का एक रिश्ता में वो लेजाए जहां इश्वर हमारे दिल और जिंदगी में काम कर सके.
वैसे भी आप इश्वर की जगह में एक नकली धर्म प्रतिस्थापन करके अपने आत्मा के शून्य को कभी भी नहीं भर पाएंगे क्योंकि वो इश्वर ही हैं जो अपने प्रेम और क्षमा के जरिए आपके दिल को भरने में सक्षम हैं और आपको नरक के खतरों से अलग करके अनन्त जीवन की सुरक्षा देंगे. रोमियों २:१४-१६
(सो जब गैर यहूदी लोग जिनके पास व्यवस्था नहीं हैं स्वभाव से ही व्यवस्था की बातों पर चलते हैं तो चाहे उनके पास नहीं है तो भी वे अपनी व्यवस्था आप हैं. वे अपने मन पर लिखे हुए, व्यवस्था के कर्मों को दिखाते हैं. उनका विवेक भी इसकी ही साक्षी देता है और उनका मानसिक संघर्ष उनहे अपराधी बताता है या निर्दोष कहता है.) ये बातें उस दिन होंगी हब परमेश्वर मनुष्य की छुपी बातों का, जिसका मैं उपदिश देता हूँ उस सुसमाचार के अनुसार यीशु मसीह के द्वारा न्याय करेगा.
आपको महसूस हो सकता है कि जैन धर्म ने आप पर एक ऐसा भार रखा है जो सहन करने में आप असमर्थ हैं जैसे के अज्ञात अवधारणा और बेहिसाब कार्मिक बलों के आधार पर इंसान को अपने पापों पर काबू पाने में असमर्थ बना कर छोड़ता है. आप असुरक्षा और डर की भावना के तहत संघर्ष कर रहे हो सकते हैं क्योंकि आपको मालूम नहीं है के आप चक्र के कौनसे हिस्से में हैं और क्या आप अपने मुक्ति कमाने और इस जीवन के दुःख और दर्द से बचने के लिए पर्याप्त किया है. शायद आप नीचे दबा हुआ महसूस करते हैं और अपने धर्म की आवश्यकताओं के बोज से दबा हुआ महसूस कर सकते हैं और आप को ये भी लगता होगा के आपके इस आध्यात्मिक यात्रा में आप के कंधे को मदत करने और आपके बोज को उठा कर आपकी मदत करने कोई नहीं आया पर मैं आपको एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताना चाहूँगा जिन्होने इस समय के धार्मिक नेताओं के खिलाफ बात की थी जो करने और ना कारने के धार्मिक चीजों से भरी दबाब लोगों के कन्धों पर रख रहे थे और लोग इस धार्मिक जुवा के बोझ के तहत दबते जा रहे थे.
मती ११:२८-३० में यीशु ने कहा ““अरे ओ थके-मांदे, बोझ से दबे लोगों! मेरे पास आओ , मैं तुम्हे सुख चैन दूँगा. मेरा जुवा लो और उसे अपने ऊपर संभालो. फिर मुझसे सीखो क्योंकि मैं सरल हूँ और मेरा मन कोमल है. तुम्हे भी अपने लिए सुख-चैन मिलेगा. क्योंकि वह जुवा जो मैं तुम्हे देरहा हूँ बहुत सरल है. और वह बोझ जो मैं तुम पर डाल रहा हूँ, हल्का है. ””
मेरे दोस्त यीशु आप को मुक्त करने और आप को आजाद कराने के लिए आए थे जैसे के उन्होंने रोमियों ८:१-२ में कहा.
“ इस प्रकार अब उनके लिए जो यीशु मसीह में स्थित हैं, कोई दंड नहीं है. क्योंकि वे शारीर के अनुसार नहीं बल्कि आत्मा के अनुसार चलते हैं. क्योंकि आत्मा की व्यवस्था ने जो यीशु मसीह में जीवन देती है, तुझे पाप की व्ययास्था से जो मृत्यु के ओर ले जाती है, स्वतन्त्र कर दिया है.”
अंत में मैं आपको मेरे व्यक्तिगत गवाही के साथ छोडना चाहूँगा जो ये कहता है के कैसे यीशु ने मेरे जीवन में एक अंतर बना दिया और मैं प्रार्थना करता हूँ के वो आप के जिंदगी में भे कुछ फरक लाएंगे.
यीशु के साथ मेरी व्यक्तिगत गवाही
अन्य संबंधित लिंक
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AMG’s World Religions and Cults, AMG Publishers, Chattanooga, Tennessee
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