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बहाई आस्था

Sunday, December 25th, 2011

यह धर्म भी बहुत से पूर्वी दर्शन जैसा है जो मानवता की ओर अर्द्ध उदार धारणा रखता है और विभिन्न धार्मिक विचारधाराओं के तत्व को भी सामिल करता है.

जैसा कि मैंने पहले मेरे अन्य लेखों में कहा है जो हिंदू धर्म, काओ दाई और साई बाबा से संबंधित थे, बहाई आस्था भी धर्मों के प्रस्तावित सत्य की प्रक्रिया या प्रणाली के बिच के फरक को ज्यादा ध्यान ना देते हुए धार्मिक विश्वास के आम तत्व पर बराबर जोड़ देता है. तो इन सभी धर्मों का मिलकर एक हो जाना तुलनात्मक धर्म का ज्यादा सरलीकरण है जो अनावश्यक रूप से दूसरों की धार्मिक पहचान के कमी को इनकार करता है.

विडंबना यह है, बहाई धर्म दुनियाके व्यवस्थित धर्मों में खुद को मानता है और अपने अनोखे धार्मिक इतिहास को बनाए रखता है जो इस आंदोलन को कहने के लिए बहाई बनाए रखता है जो इसके सार्वभौमिक स्थिति के विपरीत है. यहां तक कि नाम ही विशेष रूप से “बहाई आस्था” दिया गया है जिसके द्वारा यह अपने स्वयं के सिद्धांतों, कानूनों, और परंपराओं को बनाए रखता है.

बहाई पहले इस्लामी शिया परंपरा से आया था जिसमें वो अंत समय के मसीही आंकड़ों पर जोर देता है जिसको १२ वें इमाम या महदी कहा जाता है.

यह सब सिय्यिद `अली मुहम्मद या मिर्जा अली मुहम्मद से सुरु हुआ जिनको पैगंबर मोहम्मद का रिश्तेदार माना जाता था और जो अपने रिश्तेदार की तरह गहरे ध्यान के द्वारा आत्मज्ञान पा चुका था जिसके द्वारा उसे ये विश्वास हुआ के उसे मसीहा के आने के लिए मार्ग बनाने के लिए दरवाजा या बाब चुनागया है बिलकुल बाप्टिस्ट यहुन्ना की तरह.

हैरानी की बात ये है की, उनके उत्तराधिकारी मिर्जा हुसेन – `अली नूरी या बहुउल्लाह तो बाब का पसंद भी नहीं था जो इस बात का संकेत होना चाहिए के यहाँ कुछ गलत था बल्कि यह बहाउल्लाह के भाई मिर्ज़ा याह्या नूरी था जिसको चुना गया और इस बात ने इस आंदोलन के सुरुवात से ही दरार बना दिया था जो पहले ही अपनी धार्मिक एजेंडा के विपरीत विभेद या विखंडन के पथ पर चल पड़ा था.

अब इस आंदोलन के सैद्धांतिक विवादों के विषय में बात करें तो ये मानव के नैतिक विकास को ज्यादा मानकर पाप का वास्तविकता और उसके बुरे परिणाम को इनकार करता है और फिर भी पिछली सदी समय की शुरुआत से सबसे खुनी रहा है. बुराई या मुझे कहना चाहिए बुराई के परिणाम तेजी से प्रौद्योगिकी के विकास की प्रक्रिया की वजह से बढ़ चूका है जिसमें सबसे ज्यादा मानवता दुष्ट साम्राज्य के नरसंहार प्रवृत्ति की वजह से विलुप्त होने के नश्वर खतरे में है. हमने जर्मनी के फ़ासिज़्म के अत्याचारों को देखा है और यह सब प्रलेखन के साथ आज भी हमारे बीच लोग हैं जो इस बात को इनकार करते हैं के ये कभी हुआ था और ये उनसे अलग नहीं है जिसको बहाई पाप और दुस्टता को मानव के प्रगति में सिर्फ एक गड़बड़ के रूप में खारिज करके समर्थन करता है.

इस के इलावा बाब ने कहा है के वो पूर्ति के युग में जा रहा था पर वास्तव में पिछली सदी का परिणाम रक्तपात का एक युग था जिसके पीछे आज उत्तर कोरिया और ईरान का बुरा तानाशाही आने वाला था.

बहाउल्लाह के बेटे अब्दुल बहा बहाई के उत्तराधिकारी हुए और १९११ में उन्होंने अपना पहला सार्वजनिक भाषण दिया जिसमें उन्होंने दुनिया के बारे में नवी के तरह ये कहा के वो आत्मज्ञान की स्थिति में है जब युद्ध खतम होजाएगा और शांति राज करेगा जिसके द्वारा मानव जाती अंत में भाइयों के रूप में एकजुट हो जाएगा. इस पिछली सदी में  कई अन्य वैश्विक झड़पों और दो विश्व युद्धों के बिच ये अवस्य हुआ होगा.

तो जब बाइबिल परिप्रेक्ष्य से इस भविष्यवाणी के बात की विफलता को देखते हैं तो शास्त्र भविष्यवाणी की सच्चाई के सम्बन्ध में एक साधारण परीक्षण को अंकित करता है के अगर जो नवी कहता है वो हुआ तो वो परमेश्वर से आया है और अगर नहीं हुआ तो वो एक झूठा नवी है और अब्दुल बहा के विषय में तो पिछली बात ही सही लगती है.

व्यवस्था विवरण १८:२२

ये बात मुझे यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के समय के दौरान भविष्यवाणी के आवाज की याद दिलाता है जब झूठे भविष्यद्वक्ता कह रहे थे “शांति, शांति, जब वहाँ शांति नहीं थी. “

वैसे भी यह मुझे मेरे अगले बिंदु के तरफ ले जाता है जिसमें ये आंदोलन बहाउल्लाह की जिंदगी को मसीह के दुसरे आगमन के पूरा होने के रूप में देखता है जो इस निर्वासित नेता और उसके परिणामी आंदोलन ने जो कुछ भी थोडा बहुत किया था उसके लिए एक निराशा है. इसके अलावा मसीह का दूसरा आगमन को अस्थायी या आंतरायिक शासनकाल के रूप में नहीं सोचा गया है और इसके बाबजूद बहाउल्लाह की एक इंसान की तरह १८९२ में मृत्यु हो गया. नाही दुसरे आगमन को जेल के एकान्त कारावास के रूप में वर्णित किया गया है बल्कि उसे एक गौरवशाली शासन के रूपमें प्रदर्शित किया गया है जिसमें की भव्यता मैं वो दुनिया के देशों के बीच शक्ति में विराजमान होंगे.

यहां तक कि अपने समय के दुनिया के नेताओं को पत्र लिखने के उनके प्रयासों का दुनिया के पाठ्यक्रम को पुनर्निर्देशित करने में कोई परिणामी प्रभाव नहीं था.

कुछ अन्य विसंगति यशायाह में यीशु से सम्बंधित भविष्यवाणी के बारे में है जिसको बहाउल्लाह के साथ संबद्ध किया गया है और अभी तक रोचक रूप से बहाउल्लाह के बंश का इसराइल के राष्ट्र के संबंध में कोई वंशावली सम्बन्ध नहीं पाया गया नाही उन्हें राजा दाऊद का एक वंशज माना जाता है. सुसमाचार लेखकों ने इसी वजह से येशु के वंशावली के आंकड़ों पर जोर दिया है ताकि यीशु की प्रत्यायक पर जोर दिया जासके और पुराने करार में येशु के मसीहा के रूपमें जो भविष्यवाणी है वो पूरा होसके.

इसके अलावा बहाउल्लाह की पहचान यशायाह ५३ के पीड़ित नौकर के रूप में करना एक अतिशयोक्ति होगा और उनके जीवन के प्रकाश में एक कट्टरपंथी प्रस्थान होगा. सबसे पहले पीड़ित नौकर का अभिप्राय पापों की क्षमा के लिए एक प्रायश्चित्त होना था जो स्पस्ट रूप से बहाउल्लाह के मानकों और प्रयोजन के बाहर था और इस आंदोलन के एजेंडा के विपरीत बुराई और पाप को महज एक मानवीय कमजोरी के रूप में मानता है. फिर भी यशायाह पाप को भगवान के आगे एक अपराध के रूप में बहुत गंभीरता से लेता है जिसका मतलब है के सिर्फ एक धर्मी दास अपने मौत के बलि के माध्यम से इश्वर के साथ हमें सामंजस्य कर सकता है.

एक और विवाद उसके इस्लामी जड़ों का प्रभाव है जो एक उत्कृष्ट इश्वर का विचार रखता है और जो सब के लिए एक हैं. अब इस तरह के अंतर को अन्य पवित्र पुरुषों के विपरीत में कैसे सुधारा जा सकता है जो इश्वर की आवश्यक प्रकृति के बारे में नास्तिक / बहुदेववादी , जीववादी, सर्वेश्वर्वादी, वेदांत, पनेंथेइस्टिक, देइस्टिक, त्रिदेववादी आदि विचार रखते हैं.

यदि हम इश्वर की बात की चर्चा करते समय जीवशास्त्र के मतभेद को एक प्रारंभिक बिंदु के रूप में सामंजस्य नहीं कर सकते तो ये कैसे कह सकते हैं के सब भविष्यद्वक्ताओं और उनके संदेशों का मूल एक ही है?

एक बाक तो बिलकुल पक्का है अगर हम इश्वर की प्रकृति या अन्य सैद्धांतिक भेद के बारे में बात करें के ये बहुत से विचार एक दुसरे के कट्टर विरोधी रहे हैं और इन्हें सामंजस्य नहीं किया जा सकता है. तो संक्षेप में बहाई विश्वास एक पूरा रहस्योद्घाटन नहीं है बल्कि बहुत से प्रतिस्पर्दी धार्मिक परंपराओं को मिलाने और संस्कारी बनाने के प्रयास में एक विरोधाभास है.

इसके अलावा एक और तत्व है जो इस आंदोलन को अस्पष्टता मैं छोड़ता है और वो बात ये है के वो मृत्यु के बाद के जीवन को परिभाषित नहीं कर पाते हैं सिवाय ये कहने के की बाइबल स्वर्ग और नरक के बारे में जो कहता है वो झूट है और ये अवधारणा केवल प्रतीकात्मक है.

बहाई में केवल कुछ ऐसे विचार हैं के दिवंगत आत्मा प्राणि एक अस्पष्ट वास्तविकता में किसी भी तरह अपने अस्तित्व को जारी रखते हैं. फिर भी बाईबल मृत्यु के बाद जीवन के विषय में एक विशिष्ट विचार देता है और इस घटना को चिकित्सा के अधिकारियों द्वारा प्रलेखित किया गया जिसमें स्वर्ग और नरक के लिखित चित्रण भी मौजूद है.

क्या नर्क वास्तव में है?

इसके अलावा बहाई के बीच, सच अनुकूली है और फिर भी सच्चाई समय को अतिक्रमण करता है और ऐसा जरूरी नहीं है वो समकालीन समाज के लिए सापेक्षिक हो जो लोगों के भावनात्मक जरूरतों पर आधारित रहके “क्या काम करता है” उसको फिर से परिभाषित करे. आज के लिए क्या सच है इसे कल की गलती के रूप में या भविष्य के भूल के रूप में मानना सत्यवादिता प्रमाणित नहीं करता है सिवाय इसके के ये कहा जाए के ये बात व्यक्तिगत पसंद की ओर समकालीन नहीं था.

इस आंदोलन के लिए एक और विरोधावास महिलाओं की समानता के विषय में इसका विचार है और फिर भी अभी तक वे यूनिवर्सल हाउस अफ जस्टिस के नौ नेताओं के बीच सेवा करने में सक्षम नहीं हुए हैं और सिर्फ यही नहीं लेकिन और भी सीमाएं हैं जिसमें दुनिया के कम ही मान्यताओं / धर्मों को जगह मिला है जो इसको सार्वभौमिक ना बनाकर संकीर्ण बनाता है.

स्पस्ट रूप से इश्वर एक निजी व्यक्तित्व हैं और इसी लिए उन्होंने हमें सामाजिक प्राणी बनाया है जिससे हम रिश्तों के आधार पर हमारे प्यार और भावनाओं को आदान – प्रदान करते हैं जिसकी वजह से हम केवल मानव को छूने के लिए ही नहीं तरसते बल्कि कभी कभी हम में एक गहरा इच्छा होता है के जीवन और प्रासंगिकता के मुख्य सवालों को समझने के लिए  हम किसी वास्तविकता से आत्मिक रूप से जुड जाएँ जो हम से भी परे हों. ये खोज केवल एक मानव आविष्कार नहीं है, लेकिन ये हमारे भीतर ऐसे डाल दिया गया है के हम अनिवार्य रूप से तलाश करेंगे और इश्वर को पाएंगे.

इश्वर ने हमें उनके शानदार रचना के प्रदर्शन के लिए एक सामान्य रहस्योद्घाटन जैसा सिर्फ एक उदात्त उपहार नहीं दिया है बल्कि उन्होंने अपना प्यार प्रकट करने के लिए अपने अकेले पुत्र को , पुत्रों को नहीं , भेजा ताकि जो कोई भी उनमें विश्वास करेगा उसे अनंत जीवन का निश्चित्ता मिल जाएगा. यीशु परमेश्वर के व्यक्तित्व का सटीक प्रतिनिधित्व थे जैसे वो एक प्यार करने वाले इश्वर के व्यतिगत प्रकृति को अपने मानवता में दिखाते थे और जिसके द्वारा उन्होंने नाशवान का चिन्ह भी लिया जिससे उनके निस्वार्थ और वीर प्यार को एक  मासूम बलिदान के रूप में देखा जा सके. मानवता में उनकी भागीदारी एक दास के तरह था जिसका ये मतलब नहीं है के उन्होंने ज्ञान के कुछ रहस्योद्घाटन दिए बल्कि उन्होंने हमारे लिए अपना जीवन दिया ताकि एक पवित्र और धर्मी इश्वर के आगे हमारे सभी अपराध को नष्ट करके हमारा औचित्य साबित हो सके. इश्वर इससे ज्यादा कितना व्यक्तिगत हो सकते हैं के उन्होंने सम्बन्ध अनुकूल बनाने के लिए मांस और हड्डी का कपड़ा धारण करने में भी भाग लिया.

मैंने संक्षेप में ये समझाने की कोशिस की है के बुराई एक वास्तविकता है और इसे कम करके भ्रामक नहीं बनाना चाहिए और ये केवल एक मानविय कमजोरी या दोष भी नहीं है बल्कि ये न केवल मानव जाति के खिलाफ लेकिन सृस्टीकर्ता के खिलाफ  एक गंभीर उल्लंघन और विद्रोह का अपराध है. कृपया अपने होश को संप्रेषित मत कीजिए क्योंकि यह एक नैतिक कंपास है जिसके द्वारा इश्वर ने भीतरी रूप से उनके कानूनों को हमारे दिल में डाल दिया है जो या तो हमारे कार्यों की निंदा करता है या तो पुष्टि करता है. इश्वर ने  इस बात को गंभीरता से लिया है और मैं आपको इसी तरह यीशु के बचाने की शक्ति में विश्वास करने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ.

अंत में धर्म के इस वैश्वीकरण एक अच्छा विचार के जैसा दिख सकता है या फिर युद्धरत गुटों के विविधता के लिए धर्म के माध्यम से एकीकरण पाने के लिए एक जबाब हो सकता है पर क्या ये आंदोलन वास्तविकता पर आधारित है? इस सब के बाद भी क्या हम धर्म और शिक्षा के वाहन का उपयोग करके एक नया और बेहतर दुनिया बनाने के लिए सांसारिक प्राणियों पर निर्भर हो सकते हैं और हमने इन उन्नत समाज को सबसे अच्छे रूप में भी विफल होते हुए देखा है.

दूसरों की मदद करने के आदर्शों को रखना एक सम्मानजनक बात है, पर क्या ये एक ऐसा ही काल्पनिक अस्तित्व बना सकता है जिसमें मनुष्य अपना ही भाग्य बना सकते हैं? धार्मिक समाजवाद का ये रूप मानव स्वभाव की इच्छा में विश्वास करने से आता है और इसमें ना कभी ऐसा गुण था और ना होगा जिसको मसीहा के पुनरागमन के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है जो सैद्धांतिक रूप से इस स्थिति को अनुचित बनाता है.

इस मानवीय दृश्य और बाइबिल दृष्टिकोण के बीच अंतर यह है कि बाईबल इस बात पर जोर देता है के इश्वर वास्तविकता का क्रम ला रहे हैं और उसके विपरीत में इंसान के नैतिक प्रयास हैं जो स्वर्ग तक पहुँचने के लिए दूसरा बाबेल का टावर बनाने की कोशिश में जूटा है.

अन्त में, अगर आंदोलन में खुद ही आंतरिक विसंगतियां हों जैसे के इसके कई विघटन जिसमें स्प्लिन्टर समूह या किसी भी अन्य किरच के प्रावधान के तहत असंतुष्ट लेलैंड जेन्सेन के विदेशी दावें भी इनमें सामिल हैं जिसको उनके मुख्यधारा आंदोलन के आधार पर  विधर्म विचार कहा जा सकता है, तो वो ये कैसे यकीन से कह सकते हैं के ये मुख्य फसल शांति और एकता का फसल लाने में असफल नहीं होगा?

इसके अलावा सब का प्रतिनिधित्व करने का ये आंदोलन कैसे दावा कर सकता है जब के दुनिया के अन्य धार्मिक विचारों में इतना बड़ा मतभेद है के बहाई के अनुसार कुछ को तो अपना धार्मिक स्थिति को ही दूर कर देना चाहिए. इन प्रकार के उद्देश्योंको थोपना बहुलवादी ना होकर भेदभावपूर्ण है. इसके अलावा इन विपरीत दृश्य के खिलाफ बहाई का न्याय उस तनाव को दूर नहीं करता नहीं इन मतभेदों का खंडन करता है विशेष रूप से क्योंकि ये आंदोलन सच को सापेक्षिक रूप से देखता है.

सब निष्पक्षता में मानव जाति की भलाई की दिशा में इस संगठन के आदर्श सराहनीय हैं, लेकिन क्या ये प्राप्त हो सकता है? विश्व शांति और समानता के उनके सामाजिक स्थिति वांछनीय है, लेकिन क्या यह प्राप्य हो सकता है ? वे जो सिखाते हैं वो खुद भी मानकर सक्रिय हैं जो उनके धार्मिक विश्वासों को अभ्यास में डाल रहा है फिर भी क्या ये उसके सफलता के परिणाम को सुनिश्चित करता है या फिर ये सिर्फ आकाश का एक फल है?

मानवता में अपना विश्वास रखने से आपको निराशा का सामना करना पड़ेगा विशेस करके उनके लिए जो एकीकृत दुनिया के अपने आदर्शों को पकड़ कर नही रखते और मसीहा के दुसरे आगमन के बिना ये कभी पूरा नहीं हो सकता है. राजनीतिक और धार्मिक रूप से बिगड़े हुए दुनिया में इजराइल की तरह एक सुन्दर बगीचा होने से ये बात तो नहीं पक्का होता के एडन का बगीचा समाज के उद्धार के लिए फिर से  बहाल हो जाएगा.

 

कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ

कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ?

 

अन्य संबंधित लिंक

बहाई विश्वास के संसाधन

हिंदी-Hindi Articles on Bahai

jesusandjews.com/wordpress/2011/02/10/bahai-faith/

 

 

Excerpts taken “From Handbook of World Religions, published by Barbour Publishing, Inc. Used by permission”

AMG’s World Religions and Cults, AMG Publishers, Chattanooga, Tennessee

“Reprinted by permission.  “(Nelson’s Illustrated Guide to Religions), James A. Beverley, 2009,Thomas Nelson Inc. Nashville, Tennessee.  All rights reserved.”

Find It Quick Handbook on Cults and New Religions

Copyright © 2005 by Ron Rhodes

Published by Harvest House Publishers

Eugene, Oregon 97402

Used by Permission.

ज़ोरोअस्त्रिअनिस्म (पारसी धर्म)

Sunday, December 25th, 2011

जब पहली बार मैं इस धर्म का शोध कर रहा था तब मैंने देखा कि इसमें कई प्रशंसनीय गुण थे जो अच्छी सोच रखने , सच बोलने , और अच्छे कार्य करने जैसे बात सिखाते हैं. हालांकि, विश्वास का ये संरचना पूरी तरह से अन्य धार्मिक विचारों के लिए अद्वितीय नहीं  है जिसका उद्धार के लिए सकारात्मक काम से संबंधित कार्यक्रम है.

इसके अतिरिक्त, ये विशेषताएं सम्माननीय हैं, लेकिन वास्तव में क्या वो प्राप्य हैं और अंतत : कोई उनके आध्यात्मिक प्रगति को कैसे मापन कर सकते हैं? इस सब के बाद इस आंदोलन ने भी स्वयं के मानकों का उल्लंघन करके अपने हिस्से का नैतिक संघर्ष पालिया है जैसे के (१) दो पवित्र युद्ध और इसलिए अगर यह धर्म अपने अतीत से बदनाम होचुका है तो उनका अनुसरण करने वालों के लिए स्वर्ग की निश्चितता ये कैसे दे सकता है?

इसके अलावा एक स्थिति है जिसका मैं कोई आधार नहीं देखता और वो मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में उनके विचार हैं. मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में मैंने पहले ही एक ब्लॉग में लिखा है और ऐसे लोग रहे हैं जिनका वैज्ञानिक अध्ययन किया गया और इस दौरान उनका अस्थायी रूप से नैदानिक मौत भी होगया जिसकी वजह से उन लोगों को मृत्यु के करीब का अनुभव मिला और ऐसे कुछ गवाहिओं में कहा गया है की उनको अस्थायी रूप से नरकीय दायरे में नालेजाकर जैसा पारसी धर्म कहता है , सीधा स्वर्ग में ले जाया गया .

क्या नर्क वास्तव में है?

ये स्वर्ग और नरक के अनुभव शास्त्र के मृत्यु और नरक की गवाही से मिलते हैं जिसमें कहा गया है के येशु के पास स्वर्ग और नरक का चाभी था जिसके द्वारा उनके बदले की मौत के माध्यम से उन्हें एक जीत हासिल हुआ है जिसकी वजह से प्रचारक पौल ‘हे मौत कहाँ है तुम्हारा डंक’ कहके चिल्लाए. पॉल ने मौत को इस जीवन के प्रस्थान के लिए एक स्वागत निमंत्रण की तरह और पीड़ा के बजाय आराम की आशा के रूप में देखा, फिलीपी १:२१-२४.

जो मसीह में हैं उन लोगों को बाइबल ये कहता है के वो डर के अधीन में नहीं होंगे क्योंकि इश्वर का सही प्यार सब डर को निकाल देता है क्योंकि डर का न्याय के साथ लेना देना है. यही कारण है कि हम इश्वर के साथ हमारे संबंधों में विश्वास रख सकते हैं क्योंकि मसीह के मेधावी कर्मों के वजह से हम इश्वर के क्रोध से बच चुके हैं जिसमें उन्होंने नए जन्म के उत्थान के माध्यम से न केवल हमारे निजी जीवन में बुराई की शक्ति को दूर किया है बल्कि आने वाले जीवन में भी उसको दूर किया है और सुसमाचार के संदेश का सार भी यही है.

यीशु मसीह की अच्छी खबर दया और अनुग्रह से संबंधीत हैं जो पारसी धर्म के विधि संग्रह के आवश्यकता रहे हैं पर उल्लेखनीय रूप से विडंबना यह है के अभी तक इन आचरण के तत्वों का सर्वोच्च अच्छाई के मानक के सम्बन्ध में बहुत ही सीमित लाभ रहा है जो अहुरा मज़्दा की प्रकृति में भी है.

तो क्षमा को मुख्य रूप से मानवता के लिए एक नैतिक मोती मानना इश्वर के लिए एक कलंकी आरोप है जिन्होंने हमें इस अनिवार्य और नैतिक आवश्यकताके साथ बनाया है. इसलिए क्षमा को निर्माता के साथ नहीं जोड़ना उसके बुरे समकक्ष ‘क्षमा नदेने’ का शिकार बनना है और इसलिए ये एक सवाल पूछता है के ये बात भगवान जैसे सर्वोच्च मानक पर लागू क्यों नहीं होता? अब क्या आशा बाकी रहा है अगर हम दुविधा में हैं के इश्वर पर कैसे विश्वास करें जो अनिवार्य रूप से आपके सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद आप के वापस आने का अनिवार्य रूप से इंतज़ार कर रहे हैं?

वैसे भी यह सिर्फ एक दार्शनिक तर्क की तरह लगता है लेकिन करीब से अवलोकन करने पर यह सच में इस मामले के दिल तक जाता है और वो बात ये है के अनुग्रह, दया और क्षमा जैसे मानव घटक सिर्फ प्यार के इंसानी रूप के बारे में ही नहीं बात करते बल्कि वो पापी इंसानियत के लिए परमेश्वर के लंबे समय के पीड़ा का चिन्ह देता है और यही बात हम मसीह के काम और व्यक्तित्व में सीधे रूप से देखते हैं जो न्याय और प्रेम के बिच के बल के तनाव को हटा देते हैं और ये वो अपना जीवन इंसानी वेदी पर बलि देकर और हमारा सम्बन्ध इश्वर के साथ शांतिपूर्ण करके करते हैं.

इस धर्म के लिए एक और विसंगति ओह्र्मज्द की प्रकृति के विषय में उनका धार्मिक स्थिति के बारे में है जो उनके अपने ही विभिन्न पदों पर स्पस्ट रूप से विरोधी हैं.

मैं भगवान के साथ उनके व्यक्ति के रहस्य में अतिक्रमण की एक निश्चित सीमा तक स्वीकार कर सकता हूँ लेकिन उनके होने के ओंटोलोजीकल श्रेणियों में संघर्ष प्रतीत होता है  और वो ये है के पारसी धर्म मोनोथेइस्टिक विश्वास रख्ता है जो अपने सबसे अच्छे रूप में बहुदेववाद और देवपूजा के मकसद के साथ हेनोथेइस्टिक प्रतीत होता है. उनके विशवास के भगवान की परस्पर विरोधी प्रकृति के बारे में काफी विरोध और संघर्स है. तो अगर वे मजबूत आधार नहीं बना सकते जिसमें वो अपने इश्वर के समझ में आगे नहीं बढ़ सकते तो वो कैसे ये मान सकते हैं के वो इश्वर तक पहुँचने के लिए अपने अन्य सैद्धांतिक मान्यताओं को मानकर सही रास्ते पर हैं?

सोच की यह विविधता इस धार्मिक संप्रदाय पर बहुत से पूर्वी धर्मों के प्रभाव की वजह से भी हो सकता है. हालांकि जोरास्टरको, कई अन्य धार्मिक नेताओं की तरह कथित रूप से सच्चा धर्म को परिभाषित करने के लिए अंतर्ज्ञान का एक मनोददृष्टी मिला, इसके बाबजूद भी इस धर्म ने अपनी भारत – ईरान के साथ जुड़े पृष्ठभूमि के आधार पर उधार लिया है.

इसी तरह, पारसी धर्म और जूदेव ईसाई विश्वासों के बिच उल्लेखनीय समानताएं हैं और कई ने तो ये भी कहा है के पारसी धर्म ने इन दोनो विश्व के विचारों को प्रभावित भी किया है पर ये वास्तव में विपरीत हो सकता है क्योंकि पारसी धर्म के वर्तमान दिन के कई सारे लेख इशाई के आगमन तक काफी हद तक मौजूद नहीं था और पारसी धर्म के बारे में बहुत से चीज जो जाना जा सकता था जैसे के अवेस्ता या तो गुम होगया या फिर टूट गया जो इक इंसान को इस सोच में डाल देता है के सुरु का मूल सामग्री क्या था.

ये हमें इस बात को भी सोचने पर मजबूर कर देता है के क्या खुद जरथुस्त्र को पता था के अपने धर्मग्रंथ के बीच उसे किस प्रकार से जिम्मेदार ठहराया जा रहा है.

आपको पता है कि यह समझ से बाहर या अथाह बात है के एक सर्वोच्च रहस्योद्घाटन जैसा महत्वपूर्ण चीज इश्वर के संरक्षण के कुप्रबंधन की वजह से खो जाएगा क्योंकी पारसी के भविष्य की पीढ़ियों के लाभ के लिए इन ग्रंथों को बचाना तो आवश्यक था. केवल यही बात नहीं है लेकिन विश्वास की इस अभिव्यक्ति का ही सालों के बाद परिवर्तन हो चुका है ताकि अपनी अभिव्यक्ति को आधुनिक दिन की पूजक के लिए संशोधित किया जा सके फिर भी इस धर्म के मूल उद्देश्य के लिए ये बात सही कैसे हो सकता है?

इसके अलावा किस अधिकार से आधुनिकतावादी या संशोधनवादी विचार इस विशवास के शुद्धतम अभिव्यक्ति को खत्म करने के दिशा में आगे बढ सकते हैं जबके इसी धर्म के पूर्व विश्वासी के लिए सब कुछ ठीक था जो पशु बलि जैसे संस्कार में भाग लिया करते थे?

वैसे भी एक और विवादास्पद अभ्यास ये है के इस विश्वास के उपासक पेय के रूप में मादक(२) हओमा उपभोग करते थे जो के दवा का फेरबदल करने वाला पदार्थ है और जो जादुई अभ्यासों से सम्बंधित है जिसमें इंसान एक चढ़े हुए स्थिति में चला जाता है जिसमें इंसान खुद को सैतानी शक्तिओं के लिए खोल देता है. पुजारी के सदस्यों के बीच भी जिसको (३) मागी बुलाया जाता है उनका जादू के लिए हमारा आधुनिक शब्द से सीधा सम्बन्ध रहता है जो ये दर्शाता है के इस आंदोलन पर शैतानी प्रभाव या पृष्ठभूमि है.

इसके अलावा मेरा मानना है कि पारसी धर्म के बीच एक परस्पर विरोधी अभ्यास ये भी है कि उनमें से कई व्यक्ति धर्म परिवर्तन को अस्वीकार करते हैं जिसमें एक धर्म में से दुसरे का विवाह को भी वो निषेध करते हैं और शायद यही कारण है के इस आंदोलन की संख्या घटता जा रहा है और व्यवस्थित रूप से विलुप्त होता जा रहा है और फिर भी परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भविष्य की पीढ़ियों तक कैसे पहुंचाया जा सकता है और उनको आगे बढ़ने के लिए कैसे प्रोत्साहित किया जा सकता है अगर ये धर्म ऐसे कम होता जाएगा और खो जाएगा और एक दिन सिर्फ इतिहास में ही बाकी रह जाएगा?

खैर मैं समापन में ये उम्मीद करता हूँ के इस पोस्ट को सिर्फ एक अच्छा माने जाने वाले धर्म को कोसने के रूप में नहीं लिया जाए बल्कि मुझे आशा है कि यह भक्तों के लिए एक चुनौती के रूप में हो जिसको वो एक परम सत्य के आदेश के रूप में देखते हैं. इसके अलावा वो लोग जिसका इस आंदोलन के साथ का रिश्ता सिर्फ एक सांस्कृतिक अनुष्ठान के मामूली भक्ति के लिए है आप के लिए मेरा प्रोत्साहन ये है के झूठ की प्रणाली से मुक्त होने के लिए खुद को तैयार करने के आध्यात्मिक मामलों के बारे में आप और अधिक गंभीरता से सोचने का साहस रखें.

अंत में, उन लोगों के लिए जो अभी भी अपनी खोज में खुले हैं, क्या आप इश्वर से जुड़ने के अपने आत्मा के लालसा को पूरा करने के लिए सक्षम हुए हैं और आपके खोज ने आपको मरे हुए धर्म के खालीपन को गले लगाने के लिए छोड़ दिया है?

शायद आप इस धार्मिक आदेश के परिणाम और संभावनाओं से थक गए हैं औप इसी लिए येशु ने मती ११:२८-३० में कहा “”हैं “अरे ओ थके-मांदे, बोझ से दबे लोगों! मेरे पास आओ , मैं तुम्हे सुख चैन दूँगा. मेरा जुवा लो और उसे अपने ऊपर संभालो. फिर मुझसे सीखो क्योंकि मैं सरल हूँ और मेरा मन कोमल है. तुम्हे भी अपने लिए सुख-चैन मिलेगा. क्योंकि वह जुवा जो मैं तुम्हे देरहा हूँ बहुत सरल है. और वह बोझ जो मैं तुम पर डाल रहा हूँ, हल्का है. ”

धर्मशास्त्र के १ यहुन्ना १:९ में ये भी लिखा है “” यदि हम अपने पापों को स्वीकार कर लेते हैं तो हमारे पापों को क्षमा करने के लिए परमेश्वर विश्वसनीय हैं और न्यायपूर्ण हैं और समुचित हैं. तथा वह सभी पापों से हमें शुद्ध करता है.”

यह सफाई पूरी तरह से प्रभावोत्पादक है सिवाय कर्मकांडों या स्वच्छ धोने के औपचारिकता के. वास्तव में , सफाई भक्ति के बाद नहीं आता है बल्कि यीशु ने कहा के कप के अंदर सफाई होना चाहिए जिससे वो इंसान के दिल के गंदगी को हटाने के बारे में कहना चाहते थे सिवाय मानव के बाहिर के गन्दगी के बारे में कहने के. ये केवल तभी संभव होगा अगर वो आप को एक नया प्रकृति दें जिसके परिणामस्वरूप आप को एक नया दिल और सोच मिलेगा.

 

 

कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ

पारसी धर्म के संसाधन

Zoroastrianism

 

 

Excerpts taken “From Handbook of World Religions, published by Barbour Publishing, Inc. Used by permission”

AMG’s World Religions and Cults, AMG Publishers, Chattanooga, Tennessee

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साई बाबा

Sunday, December 25th, 2011

जब इस धार्मिक विश्वदृष्टि पर विचार करें तो इसमें कई आकर्षक सुविधाएं हैं और परोपकारी काम भी हैं जैसे की अस्पतालों, स्कूलों और पानी परियोजनाओं की स्थापना. और ये दूसरों को प्यार देने का अवधारणा भी रखता है और इस बात को महिलाओं की समानता और जाति व्यवस्था को ना मानकर प्रदर्शन भी किया है. इसके अलावा वे विश्वास करते हैं कि धर्म को तभी मूल्यवान कहा जा सकता है अगर वो केवल दार्शनिक प्रस्ताव का समर्थन करने के बजाय सामाजिक रूप से भी सक्रिय है.

जिस स्थितिमें में मैं चुनौती दे रहा हूँ वो तब है जब वो धार्मिक विश्वास प्रणाली जो एक पवित्र सच्चाई है उसको परिभाषित करके इन सामाजिक सीमाओं की अवलेहना करते हैं.

उदाहरण के लिए परमेश्वर के बारे में विचारों के विषय में संवाद करते समय उनको अलग अलग नाम या शीर्षकों से पुकारे जानेवाले एक ही व्यक्ति के रूप में मानना इस बात पर असंगत है के तुलनात्मक धर्मों के अध्ययन के दौरान ये मालूम पड़ता है के एक ही भगवान सब के लिए सार्वभौमिक नहीं है और बदले में इन कई धर्मों के इश्वर के विषय में  विरोधात्मक दृश्य है जो उनके संबद्ध सैद्धांतिक मान्यताओं के साथ अमाननीय है. एक ईश्वर के होने का यह बहुलवादी और मिश्रित आदर्श अच्छा लगता है, लेकिन सभी धर्मों का अनिवार्य हिस्सा को संगठित करने की कोशिश हमें कोई इश्वर ना होनेके विचार के तरफ नितृत्व करता है.

इस आंदोलन के अनुसार अगर प्यार लोगों के धार्मिक विचारों का आधार है तो उन धर्मों का क्या जो हिंसा का समर्थन करते हैं ?  इसके अलावा, अगर धर्म समानताएं पर निर्धारित किया जाना चाहिए तो फिर उन धार्मिक दृष्टियों का क्या जिनका विशिष्टता एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसके इलावा इनकी कोई मान्यत नहीं है?

अगर इश्वर की धारणा सिर्फ एक तुलनात्मक धारणा है और वास्तविकता नहीं है तो इन सब का कोई कुछ मान्यता ही नहीं रह जाता है और धर्म सिर्फ एक प्राथमिकता का मामला बन जाता है जैसे के हम कार खरीदते समय या किसी खेल के समय टीम के ब्रांड का चयन करते हैं. मूलतः ज्यादा धर्म इस विकल्प पर विचार ही नहीं करते हैं और बिना भेद धर्म विलुप्त हो जाएगा .

तो अनिवार्य रूप से ये विचार के सब रास्ते इश्वर के तरफ  नेतृत्व करते हैं ये इन धार्मिक प्रणालियों का एक अधिक सरलीकरण है और अगर आप इनकी अध्ययन करने लगे तो ये पता चलता है के ज्यादा समय ये एक तरफ ना आकर विपरीत दिशा में जाते हैं. इसके अलावा अपने धर्म में गंभीर होना सत्य के तरफ जाना भी तो नहीं है क्योंकि आप अपने धार्मिक विचारों में ही पूरी तरह से गलत भी तो हो सकते हैं. वैसे भी मैंने इस बारे में एक पोस्ट लिखा है.

सभी रास्ते परमेश्वर तक ले जाते हैं

सत्य साई बाबा के मेरे विषय पर वापस आएं तो वो वास्तव में सिर्फ हिंदू विचारों से पहले ही व्यक्त विचारों का ही फाइदा उठा रहा है और इसके लिए उन्होंने लोगों को सुविधा करने के लिए उन धार्मिक प्रणाली को पुनर्गठन किया है. हालाँकि, अपनी माँ धर्म से अलग सैद्धांतिक दृश्य बनाने से पता चलता है कि उनके समानताओं से भेद महत्वपूर्ण और आवश्यक है. ये एक दिल्जस्प बात है के कैसे साईं बाबा ये अंकित करते हैं के उन्होंने एक विशिष्ट धर्म का स्थापना नहीं किया है और फिर भी उनको अपने आंदोलन को १९७६ में सत्य साई बाबा सोसायटी के रूप में एक धार्मिक रूप देने की आवश्यकता लगी.

साई बाबा से संबंधित कई शिक्षाओं को साई की सच्चाई का नाम दिया गया है जिसका मतलब है कि अगर सच है तो गैर सच भी होना चाहिए क्योंकि एक पोल दुसरे पोल के बिना मौजूद नहीं होसकता और इसलिए ये व्यक्तिगत प्रकृति धार्मिक संस्कृति को निर्धारण करता है.

इसके अतिरिक्त, वेदों में एक ऐसी बात है के उसको अन्य पूरक धार्मिक ग्रंथों से अधिक जोर दिया जाता है और उन पूरक धार्मिक ग्रंथों को व्यापक अध्ययन के लिए अनावश्यक बताया गया है और शायद वो विपरीत विश्वास को दिखाए जो संसार के और विश्वासों से सम्बंधित पर सत्य साईं के युग के विपरीत हों.

इसके अलावा, अगर उनमें कोई अंतर नहीं है तो वे मुख्य रूप से सिर्फ पूर्वी छुट्टियाँ  मनाने के बजाय सभी धार्मिक त्योहारों को समान रूप से क्यों नहीं मानते?

साई बाबा के धार्मिक विचारों का एक अन्य विवादास्पद पहलू यह है कि वह स्वयं को भगवान (ओं) मानता है . विडंबना यह है कि कैसे उन्हें अपने भक्तों से ऊपर उठाया जा सकता है जब उनके ही सर्विश्वर्वाद दृश्य से तो वे सभी देवता हैं?

“रॉक स्टार” कहलाना एक बात है, लेकिन एक देवता के रूप में सम्मानित किया जाना बिल्कुल ही दूसरी बात है.

सत्य साई बाबा के अनुसार वह पूर्व गुरु शिर्डी साई बाबा जो भगवान शिव का अवतार माना जाता था उनके अवतार हैं और फिर भी सिरडी का तो सत्य साईं के जन्म के ८ साल पहले ही मृत्यु हो चुका था और इस समय के फरक को क्या माना जा सकता है. इसके अलावा सत्य साईं शिव और शक्ति दोनों के अवतार होने का दावा करते हैं और फिर भी वो द्वैतवादी व्यक्तित्व के समस्याओं के बिना दूसरे देवत्वारोपण लेने में कैसे सक्षम थे?

वह ये भी दावा करते हैं कि उनके मृत्यु के ८ साल बाद वह प्रेमा साई बाबा के रूप में फिर से पैदा होंगे जिसमें वह किसी तरह शक्ति के पक्ष में शिव को खो देंगे और वो पिछले पागलपन के अवस्था से एक ही पहचान में लौट आएँगे.

इसके अलावा, अगर उनको ज्ञान या मोक्ष प्राप्त होचुका है तो उनका अगले साई बाबा के रूप में इस पृथ्वी में पुनर्जन्म की क्यों आवश्यकता है क्योंकि पुनर्जन्म में कर्म होता है जो पूर्णता की कमी का प्रतीक होता है?

साई बाबा की जीवनी देखते समय मुझे यह संदिग्ध लगता है क्योंकि जहां तक एक चमत्कारी गर्भाधान  और चिन्ह और चमत्कार का सवाल है यह कुछ हद तक यीशु के जीवन का नक़ल लगता है. इन कथित चमत्कार के कुछ उदाहरण को या तो जादुई या तो प्रवंचना के रूप में वर्णित किया जा सकता  है. इन अभिव्यक्तियों में से कई केवल जिज्ञासा की लालच को संतुष्ट करते हैं और इस तरह के कार्यों के नाटकीय रूपांतर के इलावा इनका कोई फाइदा नहीं है.

इसके अलावा इन प्रकार के प्रदर्शनों से देवता को साबित नहीं किया जा सकता क्योंकि ये चीजें अन्य आध्यात्मिक नेताओं के बीच भी हुआ है.

इसके अतिरिक्त, एक अलौकिक घटना किसी के प्रकृति को साबित नहीं कर सकता जो अच्छा या बुरा हो सकता है. सिर्फ चमत्कार या चिन्ह देवता को निर्धारित करने के आधार नहीं हो सकते पर वो सिर्फ सच्चाई बताते हैं उन चीजों के बारे में जो सच्चाई से परे या फिर अभौतिक होसकते हैं या सिर्फ ये हो सकता है के आँख से हाथ तेज हो.

इसके अलावा, अगर वो चमत्कारी क्षमताओं के साथ एक दिव्य स्थिति मैं हैं तो उन्हें उन पहियों वाले कुर्सी में बंधे रहने और टूटी हुई कूल्हे के साथ जीने के लिए किस चीज ने बनाए रखा है जबतक वो किसी और के जितना ही नश्वर हैं?

जब साई बाबा को उनकी चमत्कारी शक्तियों के लिए अध्ययन का सामना करने को कहा गया तो उन्होंने मना कर दिया और फिर कहा के दृश्य अभिव्यक्ति भ्रामक हो सकते हैं और ये बात कह कर वो अपने ही कार्यों के आलोचक बनगए हैं.

इस के अलावा मुझे यह अविश्वसनीय लगता है के वो अपने विषय में बयान देते हैं कि वह सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ हैं . इसका मतलब है कि वह सब कुछ जानते हैं और अंततः सब कुछ नियंत्रण कर सकते हैं और अगर ये मामला है तो वह पूरी तरह से उन सभी तत्व को हटा क्यों नहीं देते हैं जो मानवीय पीड़ा का कारण है और जो उन्होंने करने की कोशिश भी की है, लेकिन सीमित सफलता के साथ. जहाँ तक सभी ज्ञान अच्छी तरह से होने की बात है ठीक यही तरीका है जिससे पंथ के नेता दूसरों के दिमाग धोते हैं जिसके द्वारा वे उनके आध्यात्मिक मार्गदर्शक के अधिकार पर सोच और प्रश्न नहीं कर सकते. बेशक सर्वव्यापिता को हासिल नहीं किया जा सकता है क्योंकि वह अभी भी एक नाशवान शारीर में रहते हैं और अगर उन्होंने अनेकदेशियता प्राप्त कर भी लिया हो जैसे के एक समय में दो जगहों पे रहना फिर भी वो सर्वव्यापिता तो नहीं क्योंकि वो अभी भी एक समय पर सभी जगह पर तो नहीं हैं जो के सर्वव्यापी होने का मतलब है.

उन्होंने यह भी विनम्र वयान दिया है के वो चेलों या अनुयायियों का होना नहीं चाहते हैं लेकिन बदले में लोगों को उन्हें पूजा करने के लिए बुलाते हैं.

वह एक तरफ कहते हैं कि वह प्रसिद्धि या प्रचार नहीं चाहते हैं और फिर भी अपनी महिमा के लिए संकेत करते हैं.

इसके अलावा अगर वह कोई अनुयायी नहीं चाहते तो उनका विभिन्न मंदिरों के साथ साथ १२०० धार्मिक संस्थाओं या केन्द्रों का होना क्यों आवश्यक है ? इसके अलावा, अगर वह एक स्थापित पंथ या सिद्धांत रखने की इच्छा नहीं करते तो उनको साईं सच के रूप में जाने वाले चीजों को सिखाने की क्या जरूरत है ?जो वे कहते हैं वो जो चल रहा है उसके खिलाफ है और ये बात इस धार्मिक आंदोलन को मानने वालों के लिए चेतावनी होना चाहिए.

जहाँ तक उनके अपने ज्ञान की घटना की बात है ये वर्षों के भक्ति और अच्छे कर्मों के माध्यम से उन्हें प्राप्त नहीं हुआ बल्कि उनके कम उम्र में बिच्छू से काटे जाने के बुरा कर्म के अंतर्गत हुआ जीसने उनके आध्यात्मिक अभिरुचि को जागृत कर दिया. एक बिच्छू का आत्मज्ञान प्राप्त करने में क्या महत्व हो सकता है? मुझे लगता है कि उनके पिता सही थे जब उन्होंने सोचा था के उनका बेटा शैतानी शक्तियों के प्रभाव में है.

भारतीय संस्कृति के भीतर के सामाजिक भेदभाव हटाने के उनके अपील का सामना करते वक्त भी सैद्धांतिक विरोधाभास है. विरोधाभास ये है कि अगर वह कर्म के प्रतिकारात्मक प्रकृति को मानते हैं, तो जाति व्यवस्था एक आवश्यक साधन बन जाता है जो सामाज से बहिस्कृत लोगों को दंडित करने का एक तरीका है और इस प्रणाली को इनकार करना उनके अपने द्वारा ही दिए गए कार्मिक बलों का खंडन करना है. मैंने इस बारे में और अधिक निचे के ब्लॉग में लिखा है.

jesusandjews.com/wordpress/2012/02/13/हिंदू-धर्म-और-पुनर्जन्म/

असंभव चीजों का एक और विरोधाभास अहिंसा के नुक्सान ना करने के नियम को पालन करना है जिसको जैन उनके ज़ोरदार और कड़े प्रयासों के माध्यम से भी पूरी तरह से नहीं मान सके हैं क्योंकि हरेक दिन के जीवन में सूक्ष्मजीवों को पीने या प्राणियों को कुचलने से खुद को बचाना बहुत मुश्किल है.

अंत में मैं इतना दूर तक नहीं जाना चाहता के मैं उनके पूर्व सदस्यों के दावे का समर्थन करूँ जिन्होंने साईं बाबा के खिलाफ दुरुपयोग का आरोप लगाया और जहां तक मेरा सवाल है जब तक उन्हें औपचारिक रूप से चार्ज नहीं किया जाता वो निर्दोष हैं.

हालांकि, मैं जो विश्वास करता हूँ वो ये है कि वो खुद को एक देवता कहने में दोषी हैं और ये दावा एक धोखाधड़ी है और उनके पास खुद को देवता साबित करने के लिए कोई विश्वसनीय सबूत भी नहीं.

इस मामले पर मेरी स्थिति किसी को अनावश्यक बदनाम करना नहीं है लेकिन अवलोकन करना है और आप के लिए एक चुनौती है के आप इस आदमी की स्थिति के बारे में पुनर्विचार करें.

मदर टेरेसा की तरह वह मानवता के लिए एक महान योगदान तो देसकते हैं पर ये बात उनको दिव्य अवतार के लिए योग्य नहीं बना सकता.

इसके अलावा, उन्होंने जीवन में महान चीजें पूरा किया है, लेकिन उन्हें मसीह के अनन्त काम के आगे विश्व के उद्धारकर्ता की श्रेणी में रखना अहेतुक है.

अंत में साई बाबा के पिता एक अभिनेता थे और यह कहा जाता है कि सत्य साईं इसी तरह ललित कला के क्षेत्र में प्रवीण थे और मैं बस ये सोच रहा हूँ के क्या ये सब एक नाटक ही हो सकता है जिसके द्वारा वह अपने पिता के नक्शेकदम पर चल रहे हैं और खुद को धार्मिक पृष्ठभूमि के मंच पर प्रस्तुत कर रहे हैं ?

 

 

कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ

कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ?

 

अन्य संबंधित लिंक

साई बाबा के संसाधन

jesusandjews.com/wordpress/2011/01/13/sai-baba/

 

 

Excerpts taken “From Handbook of World Religions, published by Barbour Publishing, Inc. Used by permission”

जैन धर्म

Sunday, December 25th, 2011

जैन धर्म एक असाधारण धर्म है जिसका नैतिक मानक काफी ऊपर है जो नैतिकता की दृष्टि से सराहनीय है लेकिन उसमें एक परोपकारी मकसद का अभाव है क्योंकि यह व्यक्तिगत आत्मज्ञान प्राप्त करने के द्वारा व्यक्तिवाद स्वार्थ की पूर्ति करना चाहता है .

इसके अलावा इस धर्म में मौलिकता का अभाव है क्योंकी ये दृढ़ता से हिंदू  सोच पर आधारित है और यद्यपि इन दो दुनिया के विचार में विश्वास के अंतर हैं फिर भी ये साफ़ जाहिर(१) है की जैन धर्म अपनी माँ धर्म का संतान है.

इसके मूल के बारे में, जैन वर्धमान या महावीरको अपना समकालीन संस्थापक मानते हैं जो कहा जाता है के ४२ साल की उम्र में आत्मज्ञान की ऊँचाई पर पहुंच गए और परिणामस्वरूप दूसरों को इस तथाकथित वास्तविकताको पाने में निर्देश करने लगे.

हालांकि, इस विचार के लिए चुनौती यह है कि इस तथाकथित अवस्था को पा लिया ये जानने का कोई दृढ तरीका नहीं है और ये तरीका विशुद्ध रूप से व्यक्तिपरक है और कोई भी व्यक्ति इस अवस्था को पाने का दावा कर सकते हैं जबकि सच में ये उन्ही झूठे दावों में से एक और होसकता है जो दुसरे आध्यात्मिक और धर्मनिरपेक्ष नेताओं ने किया है.

इस के इलावा आत्मज्ञान, कर्म, और आत्मा की स्थानांतरगमन के विचार हिंदू अवधारणा रहे हैं और भले ही इन दोनों धर्मों के बिच विश्वास की बारीकियां हैं फिर भी इन सब में औसत दर्जे का अनुकूलता और समानता है.

अब मैं इस विस्तृत विश्वास प्रणाली की बारीकियों के बारे में सोच रहा हूँ के कैसे कोई अंतत उस ‘परम सत्य’को जान सकेगा क्योंकी निर्वाण से वापस कोई भी अपनी कहानी सुनाने के लिए नहीं आया. यह एक वास्तविक अनुभव है या जैन धर्म गुरुवों, स्वामिओं, देवों और नाथ पर उन्हें इस अवधारणा के विषय में ज्ञान अनुदान करने के लिए निर्भर हैं? वैसे भी मैंने मृत्यु के बादके जीवन पर और मौत के निकट के अनुभव के बारे में एक ब्लॉग लिखा था जो आपको उपयोगी लग सकता है.

क्या नर्क वास्तव में है?

इसके अलावा जैन धर्म कुछ असंगत दावा करते हैं के महावीर ऊपर से उतर आए जब के वास्तव में उनके सांसारिक माता पिता थे. इसके अलावा वो ये दावा भी करते हैं कि वह पाप (३) के बिनाका एक सर्वज्ञ थे और इसी लिए उनके लिए आत्मज्ञान प्राप्त करना संभव हो सका क्योंकि वो स्वर्गसे प्रबुद्ध होके उत्पन्न हुए थे? तो अगर वह पहले से ही पूरी तरह से बेगुनाह थे तो उनके लिए पहले एक समय में राजकुमार होना कैसे संभव था क्योंकि ये बात बाद में तो सम्पत्ति के बारे में उनके तपस्वी विचार से नहीं मिलता.

यदि महावीर एक सिद्ध प्राणी था तो उसने क्यों भिक्षुओं को पांच प्रतिज्ञा के तहत सभी महिलएं जिनके बारे में कहा जाता था के बुराई के साथ जुडी हैं उनसे बचने की हिदायत(४) क्यों दी जब की उसकी अपनि ही पत्नी थी? व्यावहारिक रूप से कहें तो जैन कैसे निःसंतान विलुप्ती से अपने विश्वास और समुदाय को बढाते और क्या शादी और बच्चे पैदा करने से परहेज़ द्वारा जन्म के संतुलन को प्राकृतिक बाधा नहीं होता?

विडंबना यह है कि अगर यह महिलाओं के विषय में मामला है तो क्यों कुछ जैन ने मल्ली नाथ नामक महिला को १९ वीं तीर्थंकर के रूप में मान्यता दी.

अब कुछ अन्य विश्वास जो इस धर्म को बनाने के विषय में है वहाँ विभिन्न विरोधाभासी स्थिति है जो उनके अनुयायियों के बीच सिखाया जाता है.

इन विश्वासों में से एक ये है कि पारंपरिक जैन धर्म जो महावीर को जिम्मेदार ठहराता है, वो इश्वर(इश्वारों) यस फिर एक सर्वोच्च शक्ति में विशवास नहीं करता जो बौद्ध धर्म के अपने भाई धर्म के जैसा लगता है फिर भी विडंबना यह है कि आज महावीर (६)को एक देवता के रूप में पूजा जाता है और ये बात विभिन्न धर्मों के विश्वासियों के बीच एक आम बात है जो समय के बीतते ही अपने संस्थापक को उठा कर देवत्व प्रदान करते हैं.

जैन धर्म ये भी संदिग्ध दावा करता है कि वे किसी व्यक्तित्व की पूजा ना करके केवल अवधारणा या विचार की पूजा करते हैं जो उनके आध्यात्मिक नेताओं ने अतीत में सिखाया था. फिर भी अन्य धार्मिक दुनिया का अध्ययन करने पर इन गतिविधियों के ही प्रकार के विचार और व्यवहार पाए जाते हैं जो उनके देवताओं की पूजा का वर्णन करते हैं.

जैसे भी नीचे झुककर प्रार्थना की पेशकश और तीर्थंकरों के आगे साष्टांग दंडवत करना और इन व्यक्तियों के प्रति पवित्र मंत्र का पाठ करना इन लोगों के धार्मिक पृष्ठभूमि के बारे में बताता है जो मेरे हिसाब से व्यक्ति के लिए एक मूर्तिपूजक रिश्ता दिखाता है.इसके अलावा इन व्यक्तियों के तस्बिरों को प्रस्तुत करना और इन व्यक्तियों के स्मरणोत्सव के रूप में छुट्टियों की स्थापना करना और मंदिरों और तीर्थस्थल बनाना इतने बड़े सम्मान की बात है के ये मानव मात्र के मान्यता और प्रेरणा से परे हैं. इसके अलावा इन लोगों के तस्वीरों को चढ़ाया जाने वाला प्रसाद को बहुत ज्यादा मान्यता दिया जाता है जितना के जैन स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं.

अमेरिका में उनको हमारे देश के नायकों में माना जाता है जो मुख्य रूप से सैन्य सेवा में इस देश की सेवा किए होते हैं और कम से कम साल में दो बार उनको उनके कृत्य के लिए सम्मानित किया जाता है क्योंकी सेवा के लिए उन लोगों ने निस्वार्थ भावना से अपने प्राण देदीए. इतना कुछ करने के बाद भी उनको उस चरम स्तरके सम्मान के नजदीक भी नहीं दिया जाता जो उनके श्रद्धेय लोगों को जैन धर्म में दिया जाता है.

तो हालांकि जैन धर्म एक परम व्यक्तित्व के बारे में बात नहीं करना चाहता पर पहचान निर्दिष्ट करके ये समान शब्द का उपयोग करते हैं जैसे के कार्मिक बलों, सार्वभौमिक चेतना या आत्मा ‘परम’.

लगता है के ये सब एक बुद्धिमान जीव को इंगित करता है लेकिन ये इस वास्तविकता को किसी प्रकार का अव्यक्तिगत बल बताकर भाषा से भागने की एक कोशिश है और फिर भी इन बलों का उस व्यक्तित्व के साथ संरचना की प्रकृति के आधार पर समानता है. मैं पहले ही कुछ ब्लॉगों में कोई परम जीव या फिर इश्वर के बारे में ब्रह्माण्डिक और धार्मिक विचारें लिखी है हो सायद आपके काम आ जाए.
Atheist and Agnostic

तो अगर जैन धर्म सर्वोच्च इश्वर के अवधारणा को खारिज करता है तो वो कैसे कार्मिक प्रतिशोध जैसे जटिल और व्यापक विषय के बारे में बता सकता है जो उनके दार्शनिक मान्यताओं के अनुसार नियंत्रण और संतुलन की एक अच्छे से प्रबंधित प्रणाली के रूप में  प्रतीत होता है? इन बातों को और अधिक समझ बनाने के लिए अगर एक परमेश्वर होता जो सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी होता और अनन्त न्याय के इस समझ से बाहर की बात की देखरेख सकता?

विचार करने के लिए उनके विश्वासों से संबंधित कुछ अन्य बातों में अहिंसा के विचार या “कोई बुराई नहीं” नीति है जो चीजों को मारने या नोकसान पहुंचाने के हिंसा से अलग रहने (७)की प्रतिबद्धता है और फिर भी आप इस तपस्वी का भाग्यवादी अभ्यास के बारे में क्या कहेंगे जो सलेखाना के अधिनियम को पूरा करने के लिए खुद को भूख से मार देता है? क्या यह व्यक्तिगत चोट और खुद को नष्ट करना नहीं है?  इसके अलावा, विश्वास की इस कठोरता पर जीना तो नामुमकिन ही है क्योंकि पानी में रह रहे हैं लाखों सूक्ष्मजीवों को पानी पीते समाय बचाना असंभव होगा. इस के अलावा गलती से कीड़े, सब्जियों, और लकड़ी को चोट पहुंचाने से कैसे बच सकते हैं जब विशेष रूप से अंधेरे में हर रोज चलते वक्त लोग अपने परिवेश से अनजान रहते हैं और इसलिए अनजाने में पैर के नीचे इन चीजों को रौंद देते हैं जिसके बारे में जैनियों का मानना है के ये मुक्ति के लिए  बाधा लाएगा क्योंकि आपने इस अभ्यास का उल्लंघन किया है और मोक्ष को प्राप्त करना आपके लिए असंभव होगया है?

इसके अलावा एक व्यक्ति वास्तविक जीवन में जब एक हमलावर के आगे आजाए चाहे वह एक आदमी या जानवर हो तो उसका प्रतिक्रिया क्या होना चाहिए? उस व्यक्ति को खुद का बचाव करना चाहिए या फिर हमलावर को किसी लड़ाई के बिना खुद को मारने देना चाहिए?

कभी कभी लोगों को नुकसान देना पड़ता है जैसे कानून के दंड संहिता के साथ, जो व्यक्तियों को नियंत्रित करके अन्य प्राणियों के रक्षा के लिए आवश्यक होता है.

कई बार जीवन में ऐसे भी समय आते हैं जब किसीकी जिंदगी बचाने के किए किसी का जान भी लेना पड़ता है जैसे की एक माँ जो अपने बच्चे को जन्म देने के दौरान महत्वपूर्ण जटिलताओं का सामना कर रही है. जीवन की जटिलताओं के कारण कभी कभी दोनों दलों को अहिंसा के बारे में बराबर बनाना संभव नहीं होता.

इसके अलावा इस सैद्धांतिक बात को बनाए रखने और कायम रख्ते वक्त ये बुरा कर्म जो ब्रह्मांड में प्रतिशोध और न्याय के काम कर रहा है, उसके प्रभाव के विषय में समस्या पैदा कर सकता है. तो व्यक्तियों के सकारात्मक ढंग से बातचीत करके ये जीवन का संतुलन परेशान कर सकता है.

विश्वास के इस दर्शन के लिए एक और आपत्ति इसकी उपयोगिता और रोजमर्रा की जिंदगी की वास्तविकता में अपना जीवन बनाना है. एक तरफ तो जैन जीवनको नष्ट करने से मना करते हैं और फिर भी कई ऐसे हैं जो पूँजीवादी सांसारिक समाज की उद्यमशील जाल के तरफ चले गए हैं जो अक्सर लाभ की अवधारणा से जुड़े हुए रहते हैं और जिसके हमबिस्तर लालच और धन हैं. जैनियाँ अक्सर राजनीति(९) वाणिज्य, बैंकिंग और वित्त में भाग लेते हैं और भले ही वो व्यक्तिगत जीवन में किसी तरह अपनी स्थिति का औचित्य सिद्ध कर लें पर वो अनिवार्य रूप से कैसे सुनिश्चित करेंगे के वे उनके राजनीतिक उपस्थिति दूसरों के द्वारा दुरुपयोग करने के लिए अनुमति ना देकर धार्मिक अपराधों के लिए एक सहायक के रूप में शामिल नहीं होंगे.

जैनियों के सांसारिक संलग्नता के कुछ और पहलु उनके भारतीय दर्शन, कला और स्थापत्य कला में उनके प्रभाव और योगदान है. सांसारिक प्रभाव से इतना अलग हो जाना असंभव है के सांसारिक प्रभाव का ऐसा कोई रूप ही नहीं हो जो हमको और औरों को प्रभावित करता हो.

जैन धर्म के बारे में बात करते वक्त एक अन्य विवादास्पद बात उनके पवित्र ग्रंथों की मान्यता है जो दिगम्बरों और स्वेताम्बरों के संप्रदायों में विवादित है जिनका अपना लिपि भी नहीं है. (१०) ये दस्तावेज जो मौखिक परंपरा पर भारी निर्भर हैं वो महावीर के मृत्यु के १००० साल बाद तक भी अपने अंतिम और स्थायी रूप तक नहीं पहुंची थी. इस समय के दौरान इन दस्तावेजों में मूल संदेश से काफी बदलाव किया गया हो सकता है जो कहा जाता है के पुरवास नमक सबसे पुराना और सबसे विश्वसनीय पाठ से प्राप्त किया गया है और जो खो गया है.

हम जानते हैं कि मौखिक परंपरा की कमजोरियां होती हैं और बच्चों के रूप में हमारा व्यक्तिगत अनुभव टेलीफोन के खेल खेलते समय ये रहा है के क्या मूल संदेस है और कहा गया था इसमें भारी अंतर हो सकता है. तो अगर एक संदेश सिर्फ कुछ समय और स्थान के बिच कुछ ही मुंह और कान से गुजरता है तो अगर वो इतने विकृत हो सकते हैं तो अगर इन चलों को बढा दिया जाए तो ऐसा होने के संभावना कितने बढ जाते हैं.

और इस तरह से अगर ज्यादा समय गुजर जाए तो इसके सामग्री और ज्यादा मिथक और सुशोभित होजाते हैं और इनके सच्चाई के दावों को प्रमाणित करने के लिए और मुश्किल हो जाता है.

तो इस मापदंड के आधार पर क्या आप अपना विश्वास इस में रखना या अपने जीवन को दांव पर रखना चाहेंगे?

एक और विषय जो मेरे ख़याल से जैन के बीच एक गलत धारणा है के वो ब्रह्मांड के अनंत होने पर विशवास करते हैं.

अनुभववाद के आधुनिक विज्ञान करणीय या कारण और प्रभाव के नियम की समर्थन करते हैं के हरेक प्रभाव का एक मूल या ज्ञात ब्रह्मांड सहित मूल कारण होना चाहिए.  आइंस्टीन की सापेक्षता के अपने सिद्धांत के माध्यम से धारणा ये थी के ब्रह्मांड की एक शुरुआत है और यह बाद में गणितज्ञों और हबल दूरबीन से भी पुष्टि किया गया जिसने ब्रह्मांड के विस्तार के संबंध में प्रकाश की परिवर्तन के बारे में बताया और ये प्रमाणित किया के ब्रह्मांड का एक प्रारंभिक बिंदु था जिसको  सैद्धांतिक रूप से बड़ा धमाका का नाम दिया गया है. ये घटना कैसे हुआ इसके  विवरण के बावजूद इस अवलोकन के बारे में कम से कम ऐसा एक संकेत है जो प्रासंगिक है और वो ये है के ये ब्रह्मांड जैसे हम जानते हैं इसका एक प्रारंभिक बिंदु था और यह अभी भी बढ़ रहा है.

एक और जैन शिक्षा जो विज्ञान के साथ संघर्ष करता है वो है उनका विश्वास के जो पहले तीर्थंकर थे रिषभ या रसाभा वो अरबों साल पहले रहते थे और अभी तक हम जीवाश्म सबूत से ये जान पाए हैं के मनुष्य उस समय में मौजूद नहीं था.

इसके अलावा जैन धर्म  के विवादों में आनंद या फिर आनंद के खोज से दूर रहने की बातें हैं और फिर भी उनके प्रमुख विशवास ही निर्वाण को पाकर पुनर्जन्म से बचने की बातें हैं.

तो अगर खुशी और आनन्द से बचना ही है तो फिर पुण्य क्यों करें जो आपको सुखद अनुभूतियां देने की क्षमता रखता है?

यह खुशी की अवधारणा इन भाग लेने वाले जैनियों के द्वारा औरों पे भी असर डाल सकता है जो प्रसाद और सेवाएं भिक्षुओं को देकर उन भिक्षुओं के लिए समर्पित हैं और उन्हें सांसारिक संलग्नता (११) पर निर्भर करा रहे हैं.

जैन धर्म के खिलाफ एक और तर्क ये है के वो आध्यात्मिक विकास के विभिन्न स्तरों की अनुमति देते हैं जो सबसे निचे आम आदमी तक जाता है और फिर भी ये लगता है के इस आंदोलन के निचले सोपानक में शुरू करते ही वो लड़ाई हार रहे हैं क्योंकि वो किसी भी इंसान को कार्मिक बल के बढ़ने के वजह से फ़ायदा लेने का मौका नहीं देंगे और इसकी वजह से निर्जरा प्राप्त करना और मुश्किल हो जाएगा क्योंली कार्मिक चीजें बेअसर होजएंगी और थक जाएंगी.

अन्त में जैन धर्म अन्य धर्मों के लिए सहिष्णुता का दावा करती है ये कहके के कोई भी एकमात्र विश्वास सच नहीं होसकता तो क्या ये मामला इनके ही आंदोलन पे लागू होता है? यदी ये बात है तो ईसाई जैसे दुनिया के अन्य धार्मिक धारणों को अपनाने का ये रास्ता खोल देती है.

और ये कहना के कोई परम सत्य नहीं है खुद के लिए एक विरोधाभासी बयान है क्योंकि अगर वहाँ कोई निरपेक्षता नहीं है तो इसमें जैन धर्म के वो निरपेक्ष बयान भी सामिल होंगे जो कहते हैं के कोई परम सत्य नहीं होता.

वास्तव में जैन धर्म का अन्य धर्मों के साथ एक धार्मिक सहिष्णुता हो सकता है मैं ये नहीं मानता के जैन ये मानते हैं के और धर्मों में  महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सत्य हो सकता है जो उनके पहचान से अन्यथा हैं क्योंकि अगर ये होता तो खुद को हिंदू, बौद्ध या ईसाई कहते उनको कोई दिक्कत नहीं होती. हकीकत में वे खुद को विशेष रूप से पहचान देते हैं अन्यथा वे इसे एक एकल धार्मिक श्रेणी के तहत उनके धार्मिक विश्वासों की प्रणाली को परिभाषित नहीं करते पर एक और भी मिश्रित या बहुलवादी रूप अपनाते जैसे के हम बही विशवास या न्यू एज आंदोलन में देखते हैं. इसके अलावा उनके विश्वास प्रणाली और अन्य धार्मिक दुनिया के दृश्य के बीच के फरक को वो कैसे लेते? क्या वे वास्तव में पुनर्विचार करके अन्य संभावनाओं को स्थान देने के लिए तैयार हैं जो उनके अपने विश्वासों के विपरीत हैं?

यदि ऐसा है तो मैं ईसाई सुसमाचार की सच्चाई या अच्छी खबर आप के साथ बांटने का मौका लेना चाहूँगा जो जैन धर्म के जैसे कोई व्यक्ति के जीवन को सुन्यबाद के घिनोने स्थिति में लेजाकर निराशा और उत्पीड़न के अवस्था में नहीं छोड़ता जहां जीवन के अवसर और लक्ष्य भुखमरी के एक आत्मघाती अधिनियम के माध्यम से पूर्वानुमानित किया जाता है.

कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ?

निष्कर्ष में जैन धर्म ने एक आंदोलन के रूप में पाप की स्वार्थी प्रकृति और पाप और न्याय की अवधारणा को इनाम और निर्णय के माध्यम से सकारात्मक रूप से पहचाना है.

अभी तक सच्चाई के इस सामान्य रहस्योद्घाटन जो इश्वर ने हमारे भीतर डाल दिया है वो उद्धारकर्ता या भगवान का हमारे लिए जरूरत को दिखाने के लिए केवल एक प्रारंभिक बिंदु है और वो हमें नैतिक चेतना या दिशा देने के लिए सिर्फ एक सुरुवाती विन्दु है. तो धार्मिक प्रथाओं का एक व्यापक प्रणाली विकसित करने के बजाय इश्वार का इरादा ये था के हमें निर्भरता का एक रिश्ता में वो लेजाए जहां इश्वर हमारे दिल और जिंदगी में काम कर सके.

वैसे भी आप इश्वर की जगह में एक नकली धर्म प्रतिस्थापन करके अपने आत्मा के शून्य को कभी भी नहीं भर पाएंगे क्योंकि वो इश्वर ही हैं जो अपने प्रेम और क्षमा के जरिए आपके दिल को भरने में सक्षम हैं और आपको नरक के खतरों से अलग करके अनन्त जीवन की सुरक्षा देंगे. रोमियों २:१४-१६

(सो जब गैर यहूदी लोग जिनके पास व्यवस्था नहीं हैं स्वभाव से ही व्यवस्था की बातों पर चलते हैं तो चाहे उनके पास नहीं है तो भी वे अपनी व्यवस्था आप हैं. वे अपने मन पर लिखे हुए, व्यवस्था के कर्मों को दिखाते हैं. उनका विवेक भी इसकी ही साक्षी देता है और उनका मानसिक संघर्ष उनहे अपराधी बताता है या निर्दोष कहता है.) ये बातें उस दिन होंगी हब परमेश्वर मनुष्य की छुपी बातों का, जिसका मैं उपदिश देता हूँ उस सुसमाचार के अनुसार यीशु मसीह के द्वारा न्याय करेगा.

आपको महसूस हो सकता है कि जैन धर्म ने आप पर एक ऐसा भार रखा है जो सहन करने में आप असमर्थ हैं जैसे के अज्ञात अवधारणा और बेहिसाब कार्मिक बलों के आधार पर इंसान को अपने पापों पर काबू पाने में असमर्थ बना कर छोड़ता है. आप असुरक्षा और डर की भावना के तहत संघर्ष कर रहे हो सकते हैं क्योंकि आपको मालूम नहीं है के आप चक्र के कौनसे हिस्से में हैं और क्या आप अपने मुक्ति कमाने और इस जीवन के दुःख और दर्द से बचने के लिए पर्याप्त किया है. शायद आप नीचे दबा हुआ महसूस करते हैं और अपने धर्म की आवश्यकताओं के बोज से दबा हुआ महसूस कर सकते हैं और आप को ये भी लगता होगा के आपके इस आध्यात्मिक यात्रा में आप के कंधे को मदत करने और आपके बोज को उठा कर आपकी मदत करने कोई नहीं आया पर मैं आपको एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताना चाहूँगा जिन्होने इस समय के धार्मिक नेताओं के खिलाफ बात की थी जो करने और ना कारने के धार्मिक चीजों से भरी दबाब लोगों के कन्धों पर रख रहे थे और लोग इस धार्मिक जुवा के बोझ के तहत दबते जा रहे थे.

मती ११:२८-३० में यीशु ने कहा ““अरे ओ थके-मांदे, बोझ से दबे लोगों! मेरे पास आओ , मैं तुम्हे सुख चैन दूँगा. मेरा जुवा लो और उसे अपने ऊपर संभालो. फिर मुझसे सीखो क्योंकि मैं सरल हूँ और मेरा मन कोमल है. तुम्हे भी अपने लिए सुख-चैन मिलेगा. क्योंकि वह जुवा जो मैं तुम्हे देरहा हूँ बहुत सरल है. और वह बोझ जो मैं तुम पर डाल रहा हूँ, हल्का है. ””

मेरे दोस्त यीशु आप को मुक्त करने और आप को आजाद कराने के लिए आए थे जैसे के उन्होंने रोमियों ८:१-२ में कहा.

“ इस प्रकार अब उनके लिए जो यीशु मसीह में स्थित हैं, कोई दंड नहीं है. क्योंकि वे शारीर के अनुसार नहीं बल्कि आत्मा के अनुसार चलते हैं. क्योंकि आत्मा की व्यवस्था ने जो यीशु मसीह में जीवन देती है, तुझे पाप की व्ययास्था से जो मृत्यु के ओर ले जाती है, स्वतन्त्र कर दिया है.”

अंत में मैं आपको मेरे व्यक्तिगत गवाही के साथ छोडना चाहूँगा जो ये कहता है के कैसे यीशु ने मेरे जीवन में एक अंतर बना दिया और मैं प्रार्थना करता हूँ के वो आप के जिंदगी में भे कुछ फरक लाएंगे.

यीशु के साथ मेरी व्यक्तिगत गवाही

 

 

अन्य संबंधित लिंक

जैन धर्म संसाधन

jesusandjews.com/wordpress/2010/07/21/the-religion-of-jainism/

 

 

AMG’s World Religions and Cults, AMG Publishers, Chattanooga, Tennessee

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हरे कृष्ण

Sunday, December 25th, 2011

हरे कृष्ण या ‘कृष्ण चेतना के लिए अंतरास्ट्रीय समाज’ कहा जाने वाला धर्म या संप्रदाय एक आंदोलन है जो हिंदू सोच पर आधारित है. यह अपने विचारों के सभी पहलु में मौलिक नहीं है क्योंकि यह अपनि प्रभाव अपनी माँ धर्म से उधार लेती है. बेशक, अगर विशवास की बात करें तो दोनो में फरक है पर हरे कृष्ण का चेहरा स्पष्ट रूप से वैष्णव के संतान के रूप में पहचाना जा सकता है. इस उपासना का जन्म ईश्वरके अवधारणाको निजीकृत और लोकप्रिय बनाने के लिए हुआ जो इसके हिंदू समकक्ष से फरक है जहां देवी – देवताओं को अलग – थलग किया जाता है.

जब मैं डलास टेक्सास में रहता था तो हम सेहर के उस हिस्से में जाते थे जिसको डीप एल्लुम बुलाते थे और इस्कॉन के साथ ये मेरा पहला अनुभव था. मैं ग्रामीण कान्सास से होने के कारण इन गंजे, रंगीन और खुलेआम भावप्रदर्शक लोग जो ड्रम बजाकर जप और नृत्य कर रहे थे ये देख कर मुझे झटका लगा. उस समय मैं नहीं समझा था के इस सब का मतलब क्या है पर अब मुझे पता है कि यह उनके धार्मिक विचारधाराओं के लिए बहुत जरूरी है.

पूजा की यह लयबद्ध शैलीको धार्मिक गान के मंत्र जप की वजह से एक मुक्ति के रूपमें समझना चाहिए क्योंकी ये भगवान के नामको जादुई चीज से जोड़ती है और किसी तरह रहस्यमय और बुद्धिहीन तरीके से परमेश्वर के छुपे हुए ज्ञान देती है. इसका मतलब अकेले शब्दों में उस व्यक्ति की अज्ञानता को बदलने का जादू है जो उसे बोल रहे हैं. बेशक इस समीकरण में और अधिक चीजें हैं, लेकिन फिर भी यह एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है और उनके धार्मिक प्रथाओं के लिए एक आवश्यक घटक ये है के आदर्श के लिए इस मंत्र का जाप दिन में १०८ बार करते हैं और पूरा ध्यान केंद्रित करके अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए एक साधन के रूप में माला जप (माला) का प्रयोग करते हैं. यहां तक कि सड़क पर एक अजनबी कृष्ण के किसी भी ज्ञान के बिना इस मंत्र में शामिल होकर समझ से बाहरके शब्दों के जीवन को बदलने की शक्ति से लाभ ले सकता है.

यह सब लेकिन बहुत ही जादुई प्रकृतिका लगता है जिसके द्वारा एक व्यक्ति धार्मिक अभिव्यक्ति को संतुष्ट करने के लिए शब्द को नियंत्रण और प्रयोग करता है जैसे की बोल, शब्दों और वाक्यांशों को जोड़ना. ऐसा प्रतीत होता है कि अनंत बार दोहोराने के माध्यम से यह लगभग एक लय बन जाता है जैसे के एक कृत्रिम निद्रावस्था और कुछ समय बाद मुंह की बोली पूजा करने वाले की दिल की ईमानदारी के साथ संयुक्त नहीं रहती. हालांकि यह दावा किया जाता है कि इस प्रतिक्रिया को मन पर कृत्रिम रूप से लादा नहीं जाता पर मैं उलझन में हूँ क्योंकी जो मैं देखता हूँ वो सिर्फ एक थकाऊ और अंतहीन सम्बोधन प्रक्रिया है. तो उन व्यक्ति का क्या जिसके पास उनके सभी मानसिक या शारीरिक संकाय नहीं है और कृष्ण के इस भक्ति अनुष्ठान में शामिल नहीं होसकते और उनके बारे में क्या जो विकलांग हैं और ताली और नृत्य के द्वारा अपने पापों को दूर करने में सक्षम नहीं हैं? क्या इन असक्षम व्यक्तियों को उनके ही बुरा कर्म के उत्पाद के रूप में लिया जाता है और ये माना जाता है के उनको अपने ही भाग्य पर छोड़ देना चाहिए और अपने अगले सांसारिक कर्म या पुनर्जन्म के साथ उनको विशवास के इन धार्मिक अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण भागोंमें हिस्सा लेने का मौका मिलेगा?

यह मुझे एक और विवादास्पद स्थिति की तरफ लाता है की पूर्वी धर्मों के बीच सबसे आम कौनसा है और समसारा या पुनर्जन्म के विश्वास में कौन केंद्रीय सिद्धांत है जब की इसकी पुष्टि करने के लिए कोई वास्तविक सबूत नहीं है सिवाए व्यक्तिगत धोखा के या फिर ऐसे विचार रखने वालों के दिमाग पर राक्षसी प्रेरणा का प्रभाव भी हो सकता है.

विज्ञान ने दूसरों की गवाही के माध्यम से मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में अनुसंधान की शुरुआत की है उन अनुभवों को साबित करने के लिए और मृत्यु की वातावरण को नियंत्रण करना जो किसी अंतिम अवस्था के बीमार इंसान के क्षमता से बाहर की चीज है. मैंने मृत्यु के बाद के जीवन पर  ब्लॉग में लिखा है जो मौतके नजदिक और नैदानिक मौत के अनुभव पर आधारित है और कुछ लोगों ने वापस आकर उनकी कहानियां सुनाई और इसको दुनिया भर में से रिपोर्ट किया गया जो बाइबलके मृत्युके बाद के जीवनके अवधारणा से मिलती है नाकि वापस घूमने के लिए दूसरे शरीर में पुनर्जन्म से.

क्या नर्क वास्तव में है?

मुझे लगता है कि इस स्थिति के खिलाफ प्रमुख दार्शनिक तर्क ये है की कैसे एक व्यक्ति को  परिवर्तन किया जा सकता है जब के पिछले जीवन के पापों से वो अनभिज्ञ है? इसके अलावा आपको कैसे पता चलेगा के आपने उस चक्र से निकलने के लिए पर्याप्त कर लिया है और क्योंकि आप के पास इस बात का आत्मविश्वास नहीं होगा के इस आध्यात्मिक विमान पर आप कहाँ से आए और कहाँ जा रहे हैं ये बस आपको जीवन में डर और धोखा या फिर जीने के नाश्वाद सोच के पास लेजाएगा.

इसके अलावा अगर आत्मा के अनन्तता में विशवास की बात करें जो कारण के अनुभवजन्य साक्ष्य विचार के साथ संघर्ष करता है, इस प्रक्रिया को कैसे शुरू किया जा सकता है क्योंकी इसे समय की सुरुवात की आवश्यकता होगी बनाम कालातीत समारोह की और उसे सुरुवात कैसे करेंगे क्योंकि ब्रह्मांड के मूल के लौकिक अस्तित्व तो है जैसेकी दूरबीनों और हिसाब के यंत्रों  के माध्यम से देखा गया है?

वैसे भी आगे बढ़ने पर मैं उनके ईश्वरके विषय में विरोधाभासी धारणा पर चर्चा करना चाहूँगा जो एकतरफ एकेश्वरवाद होने का दावा करते हैं और दूसरी और अद्वैतवाद के विचारों को बनाए रखते हैं. संक्षेप में वो खुदको या फिर मुक्ति पाने वाले को अपने मुख्य देवता से अलग एक अलग इकाई के रूपमें नहीं देखते और एक बार कोई व्यक्ति अगर इस आध्यात्मिक स्थिति में पहुँच जाए तो वो फिर से देवत्व की एकता में वापस अवशोषित हो जाते या मिलजाते हैं. फिर भी मैं इस बात का यकीन नहीं लगा पा रहा हूँ कि शुरूमें कैसे इश्वरको सबसे पहले विभाज्य किया गया?

विडंबना यह है के पवित्र अनुग्रही भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद का कहना है कि अगर कोई भगवान होने का दावा करता है तो वो व्यक्ति एक कुत्ता है और अनिवार्य रूप से इस बात की पुष्टि यही सिद्धांत करता है. यदि यह मामला है तो देवता के उन अवतारों का क्या जो श्री चैतन्य महाप्रभु के व्यक्ति में प्रतिनिधित्व करते हैं?

इस आंदोलन के लिए एक और संघर्ष की बात उनके नैतिक विशेषताएँ हैं जो उनके और खुद के सराहनीय घटक हैं फिर भी उनके अपने नेताओं और लगावकर्ताओं में कमी है और ये उनके बचावके संदेश के आवश्यक प्रकृति के विपरीत है.

ये आंदोलन विवाद में डूबा हुआ है और ६० और ७० की उमंग का समय के विपरीत वहाँ कम दृश्यता है जो किसी समय अपनी प्रसिद्धि के लिए दावा कर रहा था. इन अपवित्र खुलासों में से कुछ तो तब हुआ जब उनके प्रतिष्ठित गुरु प्रभुपाद की मृत्यु हुई. बिलकुल इसी समय पर नेतृत्व के घोटालों की बात बाहर आई क्योंकि वहाँ आंतरिक शक्तिके लिए कई नेताओं के इस्तीफे की वजह से बहुत से नेताओं पर कर की चोरी, अफीम का व्यापार और हत्या जैसे अभियोग लगाए गए. विडंबना यह है कि इन लोगों को सांसारिक संलग्नक ना बनके पवित्रता की अग्रणी जीवन जिनी थी पर ये मुख्य फसल ही सडे हुए सेब से भरे हुए निकले.

इसके अलावा इस पूरे दौर के लिए सबसे अधिक आश्चर्य की बात और परेशान पहलू यह है कि उनके मुख्य देवता कृष्ण नशा और व्यभिचार जैसे पाप का आनंद में भाग ले सकते हैं पर उनके भक्तों को इन सब में सामिल होने से बचना है जो उनके भविष्य के विपरीत बात है. में जैसा कहूँ वैसा करो पर मैं जैसा करूं वैसा मत करो ऐसा कहना तो बिलकुल गलत बात हुआ. भक्तों को इन चीजों से (भक्ति) के माध्यम से अलग रहना है और एक बार मुक्ति प्राप्त होने के बाद ये सब करना जरूरी नहीं है क्योंकि आप ईश्वरत्व की तरफ लौट गए फिर भी ये सब  कुछ अजीब मोड़ की तरह लगता है जो तर्क बेतुका है जो सबसे अच्छे रूप में विरोधाभासी और बेतुके लगते हैं और सब से बुरे रूप में यह एक झूठ है जो कई कीमती लोगों की आत्माओं को नाश कर चुका है जो लोग अपने नाम और परिवारको समेत त्याग कर धोखे के जाल में पद गए.

अंत में हरे कृष्ण आंदोलन अन्य विभिन्न भारतीय धार्मिक समूहों की तरह धार्मिक अभिव्यक्ति के लिए एकल भावनाको निर्वासित करते हैं . फिर भी व्यावहारिक बात करें तो उन्होंने विभिन्न धार्मिक विचारों के समूह की तुलना में अपने विश्वासों में एक अद्वितीय अभिव्यक्ति के रूप में विशिष्टता बनाए रखा है. फिर भी ईश्वरको अल्लाह, जेहोवा, बुद्ध आदि के रूप में चित्रण करना उनके लिए विरोधात्मक प्रकृति है और अगर आप दुनिया के अन्य विविध धर्मों का अध्ययन करेंगे तो आप को पता चलेगा के उनके धर्मशास्त्रके अपने  ही सिद्धांत एक दूसरे से असंगत हैं.

अन्त में हरे कृष्ण आंदोलन के भक्तों द्वारा यीशुको कृष्ण के बेटे के रूप में माना जाता है और मैं आप के साथ यीशु के कहे शब्दोंको उनके चेलों से जैसे लिया गया वैसे ही कहता हूँ.

शुरू करने के लिए यीशुने कभी नहीं देखा कि मानव जाति इश्वर के हस्तक्षेप बिना केवल खुद के लिए नैतिक पूर्णताको प्राप्त करने में सक्षम और आत्मनिर्भर था. हम मैथ्यू १९ में अमीर जवान आदमी की बाइबलिय गवाह में इसका एक उदहारण देखते हैं जो सारांश में अपने व्यवहार में किसी औसत पवित्र आदमी से ज्यादा नैतिक था जिसने यीशु को भी भावुक कर दिया फिर भी अपने धन की वजह से वो परीक्षण में विफल रहा जिसके वजह से उनके चेलों ने ये सवाल किया के कैसे किसी को बचाया जाना संभव है और यीशु का उत्तर था के इंसान के लिए ये असंभव है पर परमेश्वर के लिए तो सब कुछ संभव है.

वो अमीर जवान आदमी शायद आत्मविश्वास की भावना के साथ यीशुके निकट गया होगा बिलकुल उसी तरह जैसे हम दूसरों के साथ हमारे कार्यों की तुलना करने पर महसूस करते हैं और शायद हम यीशु के दिन की धार्मिक कट्टरपंथियों की तरह बन जाते हैं जो इश्वर के सामने प्रार्थना में अपने धर्म के कामों के सभी पूर्वाभ्यास करते थे पर कभी अपनी नाकामी और पापों का एहसास नहीं करते थे और फिर भी एक तुच्छ और समाजसे निर्वासित कर उठानेवाला जो अपनी विनम्रता में दया के लिए रोया और इश्वर से उसे बचाने के लिए चिल्लाया और उस दिन वही था जिसे उचित ठहराया गया,लुका १८.

यीशु हमें आजाद कराने और हमें हमारे पापों की क्षमा देने और इश्वर के साथ हमारा एक उचित रिश्ता बनाने के लिए आए (मती ०१:२१) और उन्होंने हमें फिर से पैदा किया है जो पुनर्जन्म के साथ भ्रमित होनेकी वजह नहीं है पर ये हमारी आंतरिक प्रकृतिको बदलने की बात करता है नाकि शारीरिक एवं बाहरी आणविक संरचना के पुनर्गठन जो पुनर्जन्म से सम्बंधित है. एक दिल का बदलाव है और दूसरा केवल शरीर के भागों को बदलने के लिए है, ३ जॉन.

वो प्रार्थना जो यीशुने मैथ्यू ६:५-८ में कहते हैं 5 “जब तुम प्रार्थना करो तो कपटियों की तरह मत करो. क्योंकि वो यहूदी प्रार्थना-सभाओं और गली के नुक्कडों पर खड़े होकर प्रार्थना करना चाहते हैं ताकि लोग उन्हें देख सकें. मैं तुमसे सत्य कहता हूँ के उन्हें तो उसका फल पहले ही मिल चूका है. किन्तु जब तू प्रार्थना करे, अपनी कोठरी में चला जा और द्वार बंद करके गुप्त रूप से अपने परम-पिता से प्रार्थना कर. फिर तेरा परम-पिता जो तेरे छिपकर किए गए कर्मों को देखता है, तुझे उनका प्रतिफल देगा. जब तुम प्रार्थना करते हो वो तो विधर्मियों की तरह यूँ ही निरार्थक बातों को बार – बार मत दुहराते रहो. वे तो यह सोचते हैं की उनके बहुत बोलने से उनकी सुनले जाएगी. इसलिए उनके जैसे मत बनो क्योंकि तुम्हारा परम पिता तुम्हारे मांगने से पहले ही जानता है के तुम्हारी आवश्यकता क्या है.”

मैथ्यू ११:२८-३० में यीशु कहते हैं “अरे ओ थके-मांदे, बोझ से दबे लोगों! मेरे पास आओ , मैं तुम्हे सुख चैन दूँगा. मेरा जुवा लो और उसे अपने ऊपर संभालो. फिर मुझसे सीखो क्योंकि मैं सरल हूँ और मेरा मन कोमल है. तुम्हे भी अपने लिए सुख-चैन मिलेगा. क्योंकि वह जुवा जो मैं तुम्हे देरहा हूँ बहुत सरल है. और वह बोझ जो मैं तुम पर डाल रहा हूँ, हल्का है. ”

उन्होंने यूहन्ना ८:३६ में यह भी बताया है “जो इसने कहा है उसका अर्थ क्या है? की तुम मुझे ढूंढोगे पर मुझे पाओगे नहीं. और जहां मैं होऊंगा वहाँ तुम नहीं आ सकते. ”

मुझे पता है कि मैंने अपनी लेख में कई चुनौतीपूर्ण और कठोर बातें कहा है और मेरी इच्छा किसी को जानबूझकर अपमान करने का नहीं है. फिर भी मेरी प्राथमिक विवाद संस्था के साथ है हालांकि मैं जानता हूँ कि संस्था व्यक्तिगत है और यह लोगों द्वारा प्रबंधित किया जाता है. मुझे लगता है इस नजरिए से कह सकते हैं कि मेरी बातों को अवैयक्तिक शून्य के रूप में लिया नहीं जा सकता है और ये बस प्रबंधकीय स्थिति से ही नहीं बल्की हरेक उन अभ्यासकर्ताओं जो इन सब को पवित्र मानते हैं उनके नजर से महत्वपूर्ण और शत्रुतापूर्ण लगता है. मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ के मेरा इरादा परोपकारी है और मैं सिर्फ ये पूछ रहा हूँ के आप शायद अपनी स्थिति का समीक्षा या पुनर्विचार करें वो भी व्यक्तिपरक अनुभव बनाम एक उद्देश्य दृष्टि से. अपने धार्मिक संस्कृति से परे होकर देखें और सच का पीछा करें और वो आपको जहां लेजाए वहाँ जाइए. यदि आप खुले विचार के हैं तो मैं मेरी धार्मिक नजरिया आपके साथ बांटना चाहूँगा और मैंने अपने विचार को आपके सामने पहुंचाने के लिए ब्लॉग में अन्य संबंधित लिंक भी शामिल किया है. इश्वर आपको आपके इस प्रयास में आशीर्वाद दें.

 

 

कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ?

कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ?

 

अन्य संबंधित लिंक

हरे कृष्ण संसाधन

jesusandjews.com/wordpress/2010/08/08/hare-krishna/

 

 

“From the Handbook of World Religions,published by  Barbour Publishing, Inc. Used by permission.”

दर्द और पीड़ा

Sunday, December 25th, 2011

क्यों दुनिया में दर्द और पीड़ा है और विशेष करके हमारे व्यक्तिगत जीवन में ऐसा क्यों है इस जटिल सवाल का जवाब देना और वो भी इस छोटी ब्लॉग में यह मुश्किल है. इस विषय पर कई किताबें लिखी गई हैं और ये प्रश्न जबाब के लिए भीख माँग रहा है. इस ब्लॉग के द्वारा मेरा उद्देश्य यह है कि लोग अक्सर अपने दर्द और पीड़ाके अस्तित्वको भगवान के साथ जोड़कर उनके प्रति एक गलत धारणा रखते हैं.

जब दर्द दुख, और बुराई की समस्या से निपटने की बात आती है, वहाँ कई चुनौतियां होती हैं जो इस बार पर निर्भर करती हैं के हम इसको इश्वरकी उपस्थिति और उनका हमारे साथके सम्बन्धको कैसे देखते हैं. यह उनकी संप्रभुता और अच्छाई के साथ साथ उनकी वास्तविकता पर ही सवाल खड़ा करती है. एक और विचार जिसको हमें ध्यान देना चाहिए वो ये है की अगर भगवान मौजूद हैं और वो इस पीड़ाको अनुमति क्यों देते हैं, तो क्या अच्छाईको अनुमति देने के लिए भी क्या वही जिम्मेबार हैं?

बाइबलके परिप्रेक्ष्य से जो मेरी इस समस्या को हल करनेका तरीका है वो ये है के बुराई एक मौजूदा सच्चाई है जिसकी सुरुवात समय की शुरुआत के साथ ही हुआ था. बुराई के साथ साथ दर्द और पीड़ा भी रहते हैं. यदि आप सृष्टिके खाते का अध्ययन करेंगे तो आप देखेंगे की इश्वरने जो सुरुवात में बनाया था वो बहुत अच्छा था और उन्होंने जब मानवको बनाया तो उसे विकल्पों में से चुननेकी क्षमता देदी और आप जानते हैं के जिस किसीके पास भी विकल्प हो वो अपनी संस्कृति पर प्रभाव डालसकता है. बेशक इस प्रभावके परिणामस्वरूप अंततः मानावने भगवान की अच्छाईको ठुकराते हुए अपनेआप और सृष्टि के सभी पर अभिशाप लाया. इस अभिशाप के एक परिणामके स्वरुप मानावने खुद को भगवान से विमुख करने का प्राकृतिक क्षमता पालिया. बुराई की साजिश के लिए मानव जाति की योगदान के साथ साथ एक दूसरा दुश्मन अर्थात शैतान भी है. वह एक विरोधी है जो परमेश्वर और उसकी रचना की भलाई के विरोध में काम करता है. वह अपने राक्षसी साथियों के साथ भगवान के लिए एक आध्यात्मिक समकक्ष के रूप में देखा जाता है और भले ही वे नग्न या प्राकृतिक आंखसे नदिखे पर वे वर्तमान और हमारी दुनियाके एक सक्रिय वास्तविकता हैं और मानव जाति और प्रकृति पर कहर लारहे हैं. जब राक्षसी और मानव तत्व परमेश्वर के दुश्मन के रूप में एक दूसरेके साथ खुशी खुशी शामिल होजाए तो एक जुड़ाहुआ प्रभाव बनता है जिसके परिणाम स्वरुप मानव की सबसे बड़ी भ्रष्टता और दुष्टता है.

इन सबके साथ यह स्पष्ट है कि इश्वर अपनी संप्रभुता में कम से कम एक मौसम के लिए ही स्वतंत्र इच्छाका मौका देते हैं. भगवान के बारे में एक दिलचस्प विशेषता या पहलू यह है कि वह अनन्तके न्यायाधीश हैं जो बिलकुल निस्पछ हैं. समाज की बुराई कर्ताको इश्वरके भविष्य के न्याय में अपने कृत्यों के विषय में जवाबदेही होना पड़ेगा और हमें भी अपने कर्मोंका खाता देना होगा. तो वैसे भी ये कहना चाहिए की इश्वर मानवजातीको उसके अपने फैसलों पर और उसने ईश्वरके अधिनको स्वीकार करके अपना जीवन बिताया या फिर उनके विद्रोह में इसपर आधारित रहकर न्याय करेंगे. तो फैसले में भगवान की संप्रभुता पूरी तरह से प्रयोग किया जाएगा यदि इस जीवन में नहीं तो आने वाले जीवन में.

एक बात जो हमें बुराई और दर्दको ईश्वरकी संप्रभुता और अच्छाईसे जोड़कर देखते वक्त विचार करना चाहिए वो खुद के विषयसे शुरू होता है. इस सवाल को अगर हम हमारे ही जीवन में व्यक्तिगत रूप से एक निष्पक्ष मूल्यांकन करेंगे तो हमें खुद से पूछना पड़ेगा के हमने हमारे अपने जीवन में कोई बुराई तो नहीं बनाई? की हमने किसी भी हद तक और किसी भी समय पर भगवान का उल्लंघन किया है?  क्या हम निर्दोष हैं? क्या हम किसी के सीकार हैं या फिर हम भी पाप अपराधों के अपराधि हैं? हमने हमारी दुनिया में पीड़ा को खत्म करने में क्या मदद किया है ? बाईबल भगवान की दस आज्ञाओंको संदर्भित करता है और इस स्तर पर सभी लोगों ने इंसान और परमेश्वर के विरुद्ध कुछ हद तक पाप किया है. इसलिए हम हमारी दुनिया में इन सब अभिशाप या  दु:ख के लिए जिम्मेदार हैं.

हमें अन्त में यह देखना चाहिए कि खुद परमेश्वर ने यीशु के व्यक्ति के माध्यम से खुदको यातना के एक मानव साधन अर्थात् क्रूस पर मानवता की पीड़ा में दर्द महसूस करने की अनुमति दी. यशायाह नबी का कहना है कि यीशु दु: ख से भरे एक आदमी थे और दु: ख से परिचित भी थे . काफी दिलचस्प बात तो ये है के इश्वर ने खुद को जान – बूझकर दर्द और पीड़ा के मानवीय तत्व के अधिन में रखा और ये कहा के उन्होंने हमारे साथ सब कुछ का सामना किया. उनका दर्द हमारे लाभ के लिए अंततः साबित हुआ क्योंकी उन्होंने अपना ही जीवन हमारे पापी जीवन जिसके लिए पवित्र और सर्वोच्च न्यायाधीश के आगे हमें दोषी ठहराया जाता उसके बदले में एक फिरौती के रूप में देकर परमेश्वर के धर्मी और सही न्याय को पूरा किया. हालांकि हम दुश्मन थे फिर भी वो परमेश्वर और एक दूसरे के साथ हमारे मिलन के लिए मर गए और ये बस अयोग्य प्राणियों के प्रति उनकी दया और अनुग्रह की वजह से संभव हुआ. इस से एक व्यक्तिको ये अनुमान लगाना चाहिए के इश्वर बुराई के आगे भी अच्छे और संप्रभु रेहते हैं और इस बात में कोई विवाद नहीं है.

जो कुछ भी इस मामले पर  हमारा दृष्टिकोण हो ,ये अच्छे परमेश्वर हमें एक नया आकाश और नई पृथ्वी देंगे और किसी दिन सब दर्द, पीड़ा और दुख को हटाकर परम शांति देंगे. बेशक यह स्पष्ट है कि ये सब अभी तक नहीं हुआ है लेकिन फिर भी यह हमारी आशा है और यह आगामी क्षितिज पर है . एक बात हम आज और अभी सुरक्षित कर सकते हैं कि अगर हम येशुको अपने प्रभु और मुक्तिदाता के रूप में स्वीकार करके उनकी इच्छा पूरा करते हैं तो वो हमारे पापी दिलको बदल देंगे. जब वह हमारे दिलको परिवर्तन करेंगे तो हमारे अपने व्यक्तिगत जीवन में जो अभिशाप है वो उलट जाएगा और इश्वर हमारे भीतर अपने अच्छाईका उत्पादन करेंगे और वो भी इस हद तक के हम हमारे दुश्मन से प्यार कर सकते हैं.

मैं एक ‘शहीद की आवाज’ नामक समूहका समर्थन करता हूँ और उनके आंकड़ों के आधार पर कहा जा सकता है की ऐसे ३००००० ईसाइ हैं जो अपने विश्वास के लिए हरेक वर्ष पीड़ित किए जाते हैं. अब एक शहीद सिर्फ ऐसा कोई नहीं है जो विश्वास के लिए मरते है बल्कि यह वो सब हैं जो अपने विश्वास के लिए अमानवीय व्यबहारका सामना करते हैं. इसमें नौकरी, परिवार, घर,आदि का खोना या फिर शारीरिक और भावनात्मक यातना आदि हो सकता है. उनकी बस इतनी दोष है की वो ईसाई हैं और वो एक ऐसे शत्रुतापूर्ण संसार में रेहते हैं जो उके विशवास के प्रति असहिष्णुता से भरे हुए हैं. कैथोलिक मत में चला कुछ ऐसे ही बातें हैं जो क्रूसेड और धर्माधिकरण लगायत अन्यको भी सताते थे. फिर भी मसीह ने कभी भी इस तरीके से उनके राज्य के लिए लड़नेको नहीं बोला और उन्होंने ये भी कहा की हमें उनके चेलों के रूप में हमारे दुश्मनसे भी प्यार करना चाहिए और दूसरा गाल आगे कर देना चाहिए. तो वो सभी जो मसीह के दावे करते हैं, लेकिन दुनिया की तरह शत्रुतापूर्ण व्यवहार भी करते हैं वो वास्तव में उनके अनुयायि नहि हैं. एक तथ्य बात तो ये है के बहुत से ये शहीद जिनको सताया जाता है वो उनके अत्याचारीको माफ करके उनके लिए प्रार्थना करते हैं.

वैसे भी हम पीड़ा के लंबाई और चौड़ाई के बारे में प्रश्न तो उठा सकते हैं पर अगर अनंतकी बात करें  तो ये क्षणभंगुर है. बाइबल धुवां के एक वाष्प के रूप में मानव जीवनको परिभाषित करता है. प्रेरित पौलुस ने कहा कि हमारे हल्का और क्षणिक मुसीबतें हमारे लिए एक अनन्त महिमा लारहि है जो उन सबसे बोहोत ज्यादा है. फिर भी बहुत लोगों से ज्यादा दुःख तो उन्होंने ही पाया क्योंकि उनको ५ बार कोड़े लगाए गए, ३ बार छड से पीटा गया , एक बार उनपर पत्थराव किया गया और ३ बार उनको क्षतिग्रस्त किया गया था. वह अपने मिशनरी सफर के दौरान अधिकांस समय खतरे में थे, जब वह दूसरों के कल्याण को बढ़ावा देते थे. ये मुझे उन मानवीय मदतों की याद दिलाती है जो चर्च के माध्यम से बड़े पैमाने पर पूरे दुनिया को मिल रहा है और परमेश्वर या मसीह का उनके दिल पर प्रभावके बिना ये मदत आज दुनिया के लिए संभव नहीं होता. यह रूपांतरण के लिए एहसान नहीं है. मैंने अपनी सेवानिवृत्ति के साथ ७०००० डलर प्रति वर्ष बनने वाला काम इज़राइलके तेल अवीव सेहेर में भोजन और कपड़ों के वितरण केंद्र में स्वयंसेवा करने के लिए छोड़ दिया और बोहोत से लोग तो प्रभुमें नहीं आए पर हमने बांटना और सेवा देना जारी रखा.

अंत में मैं ये कहना चाहूँगा की कभी कभी दर्द और पीड़ा अच्छाई का एक बचाने वाला  कार्य उत्पादन कर सकता है . इस बातको समझाने के लिए कई उदाहरण है पर जो मैं अक्सर सोचता हूँ वो ये है के किसी दुर्घटना के बाद वहाँ पर ‘रोकने’का संकेत रखना चाहिए. दुर्भाग्य से किसी दूसरे के लिए किसी और को पीड़ित होना पड़ा और यह इश्वर ने हमारे लिए अपने पुत्रको पीड़ा सहने की इजाजत देके जो किया ऐसा सुनाई देता है जिसमें फाइदा हमारा ही हुआ.

वैसे भी यदि इस सब के बाद भी अगर बात समझ में नहीं आता है तो हम जो कर सकते हैं वो है इश्वर पर भरोसा. यह उसी तरह है के जब हम छोटे थे और हम जीवन के बारे में बातें समझ नहीं पाते थे , लेकिन हम हमेशा हमारे माता पिता को हमें प्यार और सुरक्षा देने के लिए भरोसा करते थे. बिलकुल यही इश्वर चाहते हैं के हम उनके साथ करें जब हम संकट के बीच में होते हैं. यहां तक कि अगर हमारे पास हर सवाल का जवाब होता तो क्या उसे हल करने के लिए पर्याप्त होता. परमेश्वर हमारी बुद्धि के बारे में चिंतित नहीं हैं जितना वो हमारे दिल के बारे में चिंतित हैं और इसी बात में दुविधा की कुंजी निहित है. चलो बस भगवान पर भरोसा रखें.

 

 

कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएं

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आप क्यों एक मुसलमान हो

Sunday, December 25th, 2011

आप क्यों एक मुसलमान हो? क्या आपने वास्तव में इस सवाल के बारे में विचार किया या सोचा है? क्या इसका कारण आपका व्यक्तिगत रूप से आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि पाना या जीवन का रहस्योद्घाटन मिलना था? या फिर परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत अंतरंग संबंध मिलने के कारण से स्वाभाविक रूप से आप इस्लाम धर्म की ओर गए?

क्या आप एक मुसलमान है क्योंकि आपकी संस्कृति और समाज ने आपको उस प्रकार से परिभाषित कर दिया है? विचार कीजिए के अगर आप अमेरिका जिसको बाईबल बेल्ट माना जाता है वहाँ के किसी क्षेत्र में अगर पैदा हुए होते तो क्या होता? ऐसे अवस्था में आपका इस्लामी विश्वास को मानने या फिर विश्वास करने के कितने संभावनाएं होते?

क्या आप एक मुस्लिम हैं क्योंकि आपको चुनाव की स्वतंत्रता नहीं है और अन्यथा करने से आप सब कुछ खो देंगे? एक बार फिर से सोचिये के अगर आप एक लोकतांत्रिक समाज में पैदा हुए होते जहां धार्मिक स्वतंत्रता की अनुमति होती है, तो क्या आप अभी भी एक मुस्लिम ही होना चाहेंगे?

क्या आप एक मुसलमान है क्योंकि आप के परिवार आप से यही उम्मीद करते हैं और वही आप के विश्वदृष्टि और मूल्यों को परिभाषित करते हैं?  सोचिए के आपका परिवार आपको अपने स्वयं के विषय में निर्णय करने की पूरी तरह से अनुमति देते हैं और आप की स्थिति की परवाह किए बिना आप को स्वीकार करते हैं?

क्या आप एक मुसलमान हैं क्योंकि यह बाकी सब कर रहे हैं? क्या होगा अगर आप एक ऐसे संस्कृति का एक हिस्सा हैं जो विश्वासोंकी विविधता के लिए अनुमति  देती है? क्या आप अभी भी आप इस्लाम को गले लगाने के लिए प्रेरित होंगे?

क्या आप इस्लामको इसलिए मानते हैं क्यों के धार्मिक अधिकारियों और शिक्षा प्रणाली ने आप से ये कहा है की इस्लाम ही सच्चा धर्म है? कल्पना कीजिए के अगर आप एक नास्तिक देश में पैदा हुए होते जहां इश्वर बिना के जीवन की एक पूरी अलग दर्शन है तो भी क्या आप मुस्लिम की रहेंगे?

क्या आप एक मुस्लिम हैं क्यों की आपको मुस्लिम नहोने से या फिर इस विशवास को नामानने के परिणाम से डर है. सोचिये अगर ये भय या संकोचकी सामना आपको नहीं करना पड़ता तो आप क्या करते?

क्या यह संभव है कि इस्लाम एक अभ्यास है जिसको भौगोलिक स्थान के आधार पर परिभाषित किया गया है?

क्या यह संभव है कि एक व्यक्ति को किसी धार्मिक प्रणाली में इतना एकीकृत किया जा सकता है कि उसके प्रभाव से मुक्त होना उसके लिए लगभग असंभव होजाए?

क्या ये संभव है के हम बस उस बात पर अंधा विशवास करें जो हम को मानने के लिए बोला गया है और उसके बारे में पूछताछ करना भी मना है?

एक व्यक्ति को एक संस्कृति इतना अलग कर सकती है के उसको बाहर के स्रोतों से प्रभावित ही नहीं किया जा सकता?

एक धर्म को लोगों को नियंत्रित करने और छेड़छाड़ करने का एक तरीका बनाया जा सकता है जिससे राजनीतिक एजेंडा पूरा होसके?

एक धर्म क्या आपको अपनी व्यक्तिगत पहचान की भावना खोने का कारण बन सकता है?

आप ईमानदारी से अपने आपको बताओ कि ये ब्लॉग के माध्यम से सोचने के बाद भी आप इस्लाम में अपने विश्वास पर अडिग हैं या फिर आपको संदेह है?  यदि आप अभी भी अपने विश्वासों में समर्पित हैं तो क्या आप अभी भी मुस्लिम रह सकते हैं उस गर्व की वजह से जो आप को कभी गलत नहीं होने देगा? या आपका अधिक विशवास आपको धोखा दे सकता है?

तो अपका एक मुस्लिम होने में सच प्रेरणा क्या है? यह वास्तव में सत्य का एक मामला है या यह संस्कृति द्वारा परिभाषित किया गया है?

इस्लाम के विकास ज्यादातर सैन्य विजय और बच्चे के जन्म के माध्यम से हुआ है. क्या  ये दृष्टिकोण वास्तव में एक गंभीर या वैध विश्वास करने के लिए काफी है?

वैसे भी ऐसे मुसलमान हैं जिनहहोने इस्लाम पर शक किया और चमत्कारिक ढंग से यीशु में विश्वास द्वारा मुक्त होगए. मैंने अपने ब्लॉग साईट पर एक लिंक दिया है जिसमें पूर्व मुसलमानों की गवाही है जिन्होंने अपने संदेह और भय के लिए एक दूसरा उपाय ढूंढ निकाला.

समापन में मैं आपको एक चुनौती देता हूँ की आप इन गवाहियों को पढ़ें और परमेश्वर से पूछें की यीशुको आप के सामने प्रकट कर दें वो भी ऐसे रूप में की आप उनको प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में विशवास कर सकें. किसी भी तरह के डर को आपको ये करने से नरोक्ने दें ये सोचकर के ये आपको उस स्वर्ग में प्रबेश करने से रोकेगा जिस में आपके जाने की कोई गारंटी नहीं है.

 

 

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क्या कुरान पवित्र है

Sunday, December 25th, 2011

जब कुरान की पवित्रता पर हम विचार करना चाहें तो इसे अन्य साहित्य के किसी टुकड़े की तरह विश्लेषण करके इसके दावे को प्रमाणित करना चाहिए.

कुरानको इस्लाम के भीतर इस तरह का एक उच्च स्थान दिया गया है कि यह आस्था के मानाने वालोंके बीच मूर्ति पूजा की एक वस्तु बन गया है.

इस के अलावा इस्लाम के दावे इसके शाब्दिक सबूत के पार जाता है.

मैने मोर्मोन के अध्ययन के दौरान इसका इस्लाम की परंपराओं से कुछ समानताएँ देखा. मोर्मोन स्वर्ण पर लिखी गयी एक स्वर्गीय शिलालेख में विश्वास करते हैं जिसको एक स्वर्गीय दूत ने दिया था और ये लिप्यंतरण के लिए सुरक्षित रखा गया था.

इसके अलावा जोसेफ स्मिथ एक सच्चे विश्वासको ढूँढने में लगा था और उसके कई कहे गए सामनों के बाद उसने ये माना के एक सच्चाई के बारे में कई सारे विस्वास हैं.

अभी तक इन दिव्य रहस्योद्घाटन के बावजूद “मोर्मोन की पुस्तक” कुरान की तरह एक संपूर्ण दस्तावेज़ से कम ही है .

मुस्लिम ये दावा कर सकते हैं कि कुरान सबसे सही और सुंदर साहित्यका स्रोत है जो इस्लाम के अनुसार आंतरिक दैवी प्रेरणा के माध्यम से प्रमाणित होते हैं.

अभी तक यह भी मोर्मोन की पुस्तक लिखी गई पुस्तकों में सबसे सही है, ये कहते समय जोसेफ स्मिथ की स्थिति भी यही रही होगी.

हालांकि, ये दोनों ग्रंथ उनके दावे से कम हैं क्योंकि दैविक स्थापना के उनके दावे में सच्चाई नहीं है. दावा करना और वास्तविक रूप में होना दो अलग बातें हैं और एक व्यक्ति को साबित करना चाहिए या फिर एक प्रसंसनीय सबूत देना चाहिए जो उसके दावे को साबित करता है.

कुरान शुरू करने के लिए एक एकल संस्थापक थे जो एक संदिग्ध चरित्र के हैं.

इन बारे में खुलासे की शुरुआत से मुहम्मद अपने स्वयं के विवेक पर शक करता था और वह नहीं जानता था कि क्या वह एक पागल आदमी था या एक कवि था. उसने अपने आप को शैतानिक शक्तियों से भरा हुआ पाया और उसके कई अभिव्यक्तियों की वजह से ऐसे खुलासे प्राप्त हुए जैसे की मुँह से फीज निकलना या एक ऊंट की तरह गरजना जैसे अजीब व्यवहार. इस नवी के बारे में और एक सवाल है के अल्लाह एक शिच्छित सच कहने के लिए एक गवार को क्यों चुनेंगे, जो सच उसके अपने जीवनकाल के दौरान संकलित भी नहीं किया गया था.

वैसे भी एक और ब्लॉग है कि जिस में मैंने इस विषय पर और चर्चा की है

क्या मुहम्मद एक झूठा भविष्यद्वक्ता है

कुरान के बारे में और एक बात यह है के इसने अपनी साहित्य और स्रोतों से लिया है. ये स्रोतें बाइबल और अन्य विधर्मी पाठ हैं जैसे की जुदेव इसाइ मनगढ़ंत साहित्य जो विशवास से बाहर थे क्योंकि इनमें दैविक प्रेरणा नहीं था. ये लेखन दोनों यहूदी और ईसाई संस्कृति से बाहर कर दिए गए थे और इन्हें कभी गंभीरता से नहीं लिया गया.

इन लेखों के इलावा इनमें फ़ारसी पारसी के मौखिक परंपराओं का प्रभाव था जिसको भी कुरानके लेखन में सामिल किया गया.

तो अल्लाह अपने स्वर्गीय संदेश सांसारिक दूतों और मानव परंपराओं से कैसे उधार ले सकते हैं?

मानव का कल्पना या मानव आविष्कार से हम पूर्णता या चमत्कारकी क्या उम्मीद लगा सकते हैं जिसे समाज ने अस्वीकार कर दीया क्योंकी वो साहित्य पूर्ण नहीं था?

यदि इस्लाम सर्वोच्च धर्म है तो इसने अपने स्वयं के स्रोत सामग्री देने के बजाय अन्य धार्मिक आंदोलनों के इतिहास और संस्कृति का बचा उधार क्यों लिया जो इस्लाम के ही समय में थे?  ये कितना मौलिक है?

एक और सवाल है की यह माना गया पवित्र पाठ हड्डी, लकड़ी, चमड़े, पत्ते, और चट्टानों जैसे ग़ैरमज़बूत और अल्पविकसित चीजों पर क्यों निर्भर था.

कुरान को स्मृति और भाषण के अविश्वसनीय गवाही द्वारा इकट्ठा किया गया था और इसके शुद्धता और यथातथ्यता को बचाकर इसको गिरने से बचाने के लिए पूरी याद होना जरूरी है.

तो इस पुस्तक को “सभी पुस्तकों की माँ” के रूप में वर्णित करना चाहिए या यह वास्तव में प्राचीन साहित्य के किसी अन्य भाग से अलग नहीं था.

ये कभी नहीं साबित हुवा के कुरान मुहम्मद के जीवन के दौरान या उसकी मौत के बाद शीघ्र ही सिद्ध किया गया बल्कि सबूत से पता चलता है कि ये नवी के मरने के १५० से २०० साल तक इसका बिकास किया गया और ८ वीं या ९ वीं सताब्दी में इसे बाहर लाया गया.

विद्वानों का निष्कर्ष है कि कुरान की बातें एक आदमी के द्वारा नहीं बल्कि सौ या दो सौ  साल की अवधि में पुरुषों के एक समूह द्वारा इकट्ठे किये गए थे.

कुरान का सबसे पुराना प्रति ७९० इस्वी में मेल लिपि में लिखी गयी थी जो के मुहम्मद की मृत्यु के १५० साल बाद की बात है.

यहां तक कि सबसे पुराना पांडुलिपि ही उसको मुहम्मद के समय से करिब सौ साल अलग कर रहे हैं .

इस के इलावा उथमान के प्रतियां भी अब अस्तित्व में नहीं हैं जिसके बारे मैं इस्लामी विद्वानों अन्यथा दावा करते हैं पर वास्तविकता यह है कि जो कुफिक लिपि इन विवादास्पद ग्रंथों में प्रयोग की गयी हैं वो उस समय के दौरान उपयोग में नहीं था और उथमान के निधन के साल बाद तक दिखाई नहीं दिया.

इसके अलावा माना जाता है कि अरबी भाषा अल्लाह का स्वर्गीय जीभ है और कुरान की सुरुवात अल्लाह के साथ ही हुआ तो क्यों कुरान अपनी बातें कहने के लिए अकादियन, अश्शूरियों, फ़ारसी, सिरिएक, हिब्रू, ग्रीक जैसे विदेशी भाषाओं का उपयोग करता है.

यदि कुरान इतना प्रामाणिक है तो उसका एक मूल पाठ अभी भी क्यों उपलब्ध नहीं है क्यों की इस्लाम के सुरुवात से रहा सभी दस्तावेज पूरी तरह से बरकरार है? निश्चित रूप से अल्लाह उसकी संप्रभुता में अपने ही पवित्र पाठ की संरक्षण जरूर कर सकता था .

कुरान के इतिहास के संबंध में यह माना जाता है के  इसकी संरचना ज़ैद इब्न थाबित के तहत हुआ था जो मुहम्मद के लिए एक निजी सचिव था. अबू बकर के निर्देश के तहत ज़ैद मुहम्मद की बातें लेकर एक दस्ताबेज बना रहा था.

नतीजतन, उथमान के शासनकाल के दौरान जो तीसरा खलीफा था, जान बुझ कर प्रयास किया गया के कुरान को मानकीकरण किया जाए और पूरे मुस्लिम समुदाय के ऊपर उस दस्ताबेज को लागू किया जाए जिसके लिए ज़ैद के उन दस्ताबेज के अन्य प्रतियां भी बने और सभी प्रतिस्पर्धी दस्तावेजों को नष्ट किया गया था .

कौन इस पाठ को मानक कह सकता है क्योंकि एक आदमी में अंतिम अधिकार दिया गया बनाम वो तमाम विश्वासियों के समुदाय जिसमें से कई मुहम्मद के व्यक्तिगत साथी भी थे.

अब हमारे पास इस पहले से मौजूदा पाठ के प्रतियां पर प्रतियां हैं . हमें कैसे पता चलेगा कि जो हमारे पास है वो वास्तव में सच कुरान का प्रतिनिधित्व करता है और क्या मुहम्मद भी इसके संपूर्ण सामग्री को मान्यता देता?

इसके अलावा बहुत से सबूतको नष्ट कर देने की वजह से अमिश्रित पाठको पुनर्निर्माण करनेका एक सटीक तरीका भी नहीं है.

ज़ैद, अब्दुल्ला इब्न मसूद, अबू मूसा, और उबय्य के मौजूदा पाठों के बीच मतभेद है. उनमें विचलन और विलोपन थे फिर भी इन पाठों के सृस्तिकर्ता मुहम्मद के संबंध में विश्वसनीय व्यक्ति थे.

अब्दुल्ला मसूद मुहम्मद द्वारा कुरान पाठ का एक शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था और उबय्य नबी का एक सचिव था.

मेरा प्रश्न है के नबी के निजी चेलों के बीच किसका पांडुलिपि सही या अधिक आधिकारिक था?

शुद्धता के अंतिम प्राधिकारी बनने के लिए उथमान कौन था जबकि वहाँ अन्य प्रामाणिक ग्रंथों भी थे जिन्हें अन्य समुदायों द्वारा मान्यता प्राप्त था.

इसके अलावा पाठ संकलित करते समाया ज़ैद “पत्थराह” से संबंधित कुछ बातें शामिल करना भूल गया.

इन सभी पाठों के एकजुट करने के लिए किया गया संघर्ष के बाद अल हज्जाज द्वारा समीक्षा और संशोधित किया गया जो कुफा का गवर्नर था.

उसने शुरू में ११ ग्रंथों में संशोधन किया और अंत में अपने परिवर्तनको कम करके ७ में ही सिमित कर दिया था.

इस कार्रवाई के बाद हफ्साह पाठ जो मूल दस्तावेज़ था जिसमें से अंतिम पाठ लिया गया था उसे बाद में मिर्वान, मदीना के गवर्नर द्वारा नष्ट कर दिया गया था .

इसके अलावा कुरान में अभिनिषेध के कई घटनाएं हैं जो आंतरिक विरोधाभास से जूझने के उपाय हैं और इन्हें सुधार के रूप में व्याख्या किया गया है.

मैं सोच रहा हूँ के कैसे आप पहले से ही पूर्ण रही चीज़ को सुधार सकते हैं क्यों की इस रहस्योद्घाटन को सामने आने के लिए केबल २० साल लगे और उसे अपने सांस्कृतिक मानकों के विकास की जरूरत ही नहीं पड़ी.

अभिनिषेध की संख्या ५ से ५०० के बीच है . अन्य लोगों का कहना है कि यह २२५  के करीब है. हमें इससे ये पता चलता है कि अभिनिषेध के विज्ञान वास्तव में एक अयथार्थ विज्ञान है, क्यों की कोई भी वास्तव में नहीं जानता के कितने छंद निराकृत हैं.

आंतरिक विरोधाभासों के अलावा इसमें वैज्ञानिक तथा व्याकरणके त्रुटियां भी हैं.

इन भिन्नताओं के इलावा हदीसों की बढ़ती संख्या है जो अचानक ९ वीं सदी मैं दिखी जो इस घटना के २५० साल बाद की बात है.

यदि ६००,००० हदीस की बातें उस समाय में प्रचालन में थे तो उस में से ७००० से कुछ ही ज्यादा बच गए और बाकी ९९ प्रतिशत को गलत करार दिया गया.

फिर भी अगर ९९% गलत कह रहे हैं तो हम कैसे इस १% पर भरोसा कर सकते हैं  जिसको अल बुखारी ने मंजूरी दी थी?

मुस्लिम परंपरा कहानी कहने वालों या फिर कुस्सास की मौखिक संचरणसे भी बिकसित हुआ था जिसको ८ वीं सदी के बाद ही इकठ्ठा किया गया था. इन कहानियों को आम लोकगीत से लिया गया था और इस प्रकार इस्लाम में एक बड़ा विरूपण आगया.

इसके अलावा अगर आप कभी टेलीफोनका खेल या कहानी एक दुसरे को सुनाते हुए एक बड़े समूह में सुनाते हैं तो आप अक्सर अंतिम में एक पूरी अलग कहानी उस अंतिम इंसान से सुनते हैं.

अब सौ या दो सौ सालमें अगर ये बात फैला है तो आपको क्या लगता है इस अभ्यास का अंत परिणाम क्या होगा ?

कुरानको अल्लाहका खाका या साहित्यिक बराबरी नहीं रही सबसे बड़ी चमत्कार के रूप में मानना एक अतिशयोक्ति है जो कई मोर्चों पर निराधार है.

कुरान जबाब की तुलना में ज्यादा सवाल छोड़ता है.

क्या कुरान साहित्य का एक शानदार टुकड़ा है या फिर अपनी प्रसिद्धि के दावों से कम है.

क्या यह साहित्य के किसी अन्य टुकड़े से बराबरी नहीं करने जितना सुन्दर है ? ये देखने वालों के लिए छोड़ दिया गया एक राय है जैसे की और बोहोत सारे शास्त्रीय साहित्य होते हैं जिनमें से कुरान अपना आधार लेता है और औरों के राय के आधार पर इस साहित्यिक क्षेत्र से पार जाता है.

एक किताब जो और किसी पुस्तक के आगे दूसरा नहीं माना जाना चाहिए उसे कई बार बहुत सी जगह पर असंबद्ध और गलत तरीके से सम्पादित किया हुवा कहा जाता है और वो ऐसे लोगों की आलोचना और जांच में खड़े होने के लिए सक्षम नहीं है जो इसके प्रामाणिकता को अपना उद्देश्य बना कर देखने के काबिल हैं.

समुदाय के भीतर के लोगों के लिए आज्ञाकारी बनके नासमझ रूप से इसकी सभी बातों को मानना जरूरी है जो इसके पूजा करने वालों को इसके लेख के बारे में गंभीर तरीके सी सोचने का मौका ही नहीं देता.

इसके लेख पर प्रश्न उठाने का मतलब है अल्लाह पर और उसके नबी पर प्रश्न उठाना जो मुस्लिम सोच से बहुत बाहर की बातें हैं जिसको विश्वासघात और अवज्ञा के रूप में देखा जाता है जिसके परिणामस्वरूप अनन्त नतीजों के साथ गंभीर परिणाम मिलता है.

आप कह सकते हैं कि यह कुरान इस्लाम के इन सभी संक्रमण काल के सभी चरणों से बच गया और मेरे लिए प्रमाणों के बाबजूद ये एक दिव्य रहस्योद्घाटन है कहके विश्वास करना एक चमत्कार ही होगा.

अंत में मैं कुरान के बारे में कोई भी अन्य टिप्पणी नहीं करना चाहता. केवल एक बात मैं कहना चाहता हूँ कि मुझे आशा है की मैंने अपने सीधे बातों को बढ़ा चढाकर नहीं कहा और अपने  मुस्लिम दोस्तों के प्रति अनादर नहीं दिखाया है.

यह करना कठिन है क्योंकि जब एक धर्म को मानसिकता की एक चुनौती के वजाय एक व्यक्तिगत विश्वास के रूप में लिया जाता है, तो उसे अक्सर खतरा या दुश्मनी के रूप में व्याख्या किया जाता है.

मैं चाहता हूँ कि आप कृपया मुझे माफ कर दो अगर यह सब से मैंने आप जिस पाठ को पवित्र मानते हैं उस की दिशा में आपका शक बढाने की वजाय आपके क्रोध को जगाया है.

मेरे इरादे किसिका अपमान करना नहीं बल्कि सत्य की रक्षा करना है और सत्य के रास्ते पर चलना है जहाँ यह अंततः हमें नेतृत्व करके लेजाए.

अन्त में इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए जे स्मिथ द्वारा लिखे गए लेखों को पढ़ने का सल्लाह देता हूँ जिसके बारे में मैंने ऊपर भी कहा है.

 

 

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क्या काबा पवित्र है

Sunday, December 25th, 2011

हालांकि अरब ने इस्लाम के सच्चे परमेश्वर के रूप में  अल्लाह को अपनाया है,पर अभी भी उसके बहुदेववादी अतीत को वो अलग नहीं कर पाया है .

काबा  जो मक्का में स्थित इमारत की तरह एक घन है ये इस्लाम का सबसे पवित्र स्थल है पर इस्लाम के आगमन से पहले यह एक मंदिर के रूप में इस्तेमाल किया गया था.

इस संरचना की आधारशिला एक काला उल्का है जो स्वर्ग से गिर गया था और वो मानव पाप के अंधेरे के साथ जुडा था यह  कहा जाता है. आज मुसलमान हज के दौरान पूजा या पूजा के एक अधिनियम के रूप में इस पत्थरका चुंबन करते हैं.

पुराने इस्लामिक संस्कृति में प्राचीन अरब वस्तुकामुक थे जो अपने खुद के कर्मकांडों और प्रथाओं के एक भाग के रूप में इन काले पत्थरको मूल्यवान मानते थे.

अरब पत्थर उपासक थे जिसमें अपने आदिवासी समूहों को अपने स्वयं के काबाका अभयारण्य था जो अपने खुद के काले पत्थरका पूजा करते थे.

काबा के साथ जुड़े अनुष्ठान मंदिर की परिक्रमा है. कैसे इस बुतपरस्त अभ्यास की उत्पत्ति हुई इस पर एक सिद्धांत था कि ये आदिवासी समूहों काबा की परिक्रमा करते थे जो चाँद, सूरज और सितारों की पूजा से संबंधित था. इस अभ्यास के दौरान इन पत्थरमें देवता या आत्माओं का निवास माना गया और चुंबन भी किया जाता था. इस पत्थर की छूने का यह चुंबनसे  आशीर्वाद मिलता है वो ऐसा सोचते थे.

काबाके काले पत्थरके संबंध में इसके अलावा चंद्रमा भगवान की पूजा भी थी.

अरब संस्कृति के उनके प्राचीन बुतपरस्त अरब समाज के बारे में अतीत के साथ जुड़े अन्य पहलुओं मीना पर पत्थर  “” भागो “सफा और मारवा जो सिर्फ काफिरकि दो मूर्तियों के बीच में चलाने के लिए इस्तेमाल किया गया एक कानूनका नवीकरण है, और अंत में “स्तुति करो” जो अपने मृत पूर्वजोंकी तारीफ करने के लिए इस्तेमाल किया गया और अब इस कार्यसे अल्लाह की ओर प्रशंसा के साथ पुनः निर्देशित किया गया है.

अरब संस्कृति अपनी बुतपरस्त अतीत से अलग नहीं हो पाया है भले ही उनके एकेश्वरवाद के नए बैनर तले सब कुछ होनेका दावा वो करते हैं. इस्लाम धर्म में अरब संस्कृति को शामिल करने का यह अभ्यास अपनी धार्मिक घटक के लिए शुद्धता के बजाय एक मिश्रण की तरह लगता है और काबा एक प्रमुख स्तंभके रूप में रहने से पता चलता है कि इसके धार्मिक संरचनामें कुछ दरारें हैं .

तो इस्लाम एक सच्ची श्रद्धा के रूप में अपना खुदका पहचान बनाने के बारे में कितनी दूर आया है? यह स्पष्ट है कि यह इसकी संरचना जूदेव ईसाई विश्वासों से उधार लिया गया है और अपनी बुतपरस्त अतीत से इसने अपनेआपको भरा है?.

यह वास्तव में सच्ची श्रद्धा है या बस विभिन्न अन्य धार्मिक दुनियासे लियागया स्थानीय धर्म के अभ्याससे एकजुट विचारों के एक समूह का एक उधार है ?

क्या आप इस्लामको अपने पूरे दिल से स्वीकार करके उसे अपनानेके लिए तैयार हैं जो अपने खराब इतिहास से अलग नहीं हो पाया है?क्या इस्लाम मूर्ति पूजा को एक नया रूप देकर एक स्वर्गीय दूत द्वारा दियागया नया धर्म के रूप में स्थापित नहीं है? इस्लाम के घूंघट के पीछे देवताओं के एक टोटेम पोल बनाम अध्यक्ष मूर्ति छिपा है .

इस ब्लॉग लेखन में मैंने एक साथ कई अलग अलग इस मामले से संबंधित संसाधनों को जमा किया और डाटा संकलन कर एक ईमानदार और निष्पक्ष मूल्यांकन करने की कोशिश की है .

मैं चाहता हूँ की आप इस लेख के समग्री को केबल मानहानि के साधन के रूप में खारिज न करें. मैं आपको इस मामले के बारे में अपने स्वयं के अनुसंधान करके एक खुला मन रखके सोचने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ.

इस ब्लॉग के माध्यम से मैंने इस्लामी विश्वास के लिए एक चुनौती की पेशकश की है, जबकि अनावश्यक बदनामी और मुसलमानों और जिसको वो पवित्र मानते हैं उसकी ओर झूठे आरोप लगाने की कोशिश नहीं की है.  मैं जानता हूँ की मेरे कई मुसलमान दोस्त परमेश्वर को पुरे दिल से मानते हैं और मैं इस बातका सम्मान भी करता हूँ. फिर भी मैं उन्हें तथ्यात्मक जानकारी देकर ही उनकी निष्ठाके बारे में निर्णय बनाने में गाइड करने की कोशिश करना चाहता  हूँ.

समापन में, यदि आप एक मुस्लिम हैं तो मैं आपको प्रोत्साहित करता हूँ के प्रार्थना के माध्यम से इस्लामी विश्वास और अभ्यास के पीछे की सच्चाई के बारेमें भगवान से पूछिए.

 

 
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क्या मुहम्मद एक झूठा भविष्यद्वक्ता है

Sunday, December 25th, 2011

क्या मुहम्मद एक झूठा भविष्यद्वक्ता है? कई धर्म और उपासनाएं है जिसमे एक व्यक्ति सत्य के  मध्यस्थ होने और विशेष रहस्योद्घाटन प्राप्त करने के दावे करता है. फिर भी हमें पता लगाना चाहिए कि इन स्थितियोंमें से सच क्या है और मिथकों या झूट क्या  है. परमात्मा से ज्ञान मिलने का बयान कोई भी कर सकता है, लेकिन कुछ बिंदु पर इन दावोंका निरीक्षण करके देख सकते हैं की आगे की आलोचनाओं के चुनौती के तहत वो खड़े होंगे या नहीं.  एक गवाही उतना ही अच्छा होता है जितना गावाह या व्यक्ति अच्छे होते हैं. यदि आप कानून की अदालत में एक वैध गवाह के रूप में एक व्यक्तिको खड़ा करेंगे तो पहली बात जो आप निर्धारित करेंगे वो है उनकी योग्यता के स्तर. उनको गवाह के रूप में भरोसेमंद उनके चरित्र की विश्वसनीयता के आधार पर गिना जा सकता है या वे एक अयोग्य गवाह के रूप में देखा जाएगा?

मुझे लगता है कि पहली बात जिस पर मैं विचार करना चाहता हूँ वो है इस्लामका प्रवर्तक या संस्थापक का चरित्र जिसने इस्लामको धार्मिक आंदोलन के रूप में परिभाषित किया है.

मुहम्मद एक ऐसा व्यक्ति था जो ध्यान और आध्यात्मिक विषयों के चिंतन के लिए समर्पित हो गया था. इसके दौरान अंत में उसका मुलाकात एक दैविक प्राणीसे हुआ जो उसके हिसाब से एक जिन था. इस मामले उस पर इतना दबाव डाला जारहा था कि उसने दो बार आत्महत्याका विचार किया था और इन खुलासे की वजह से उसे पता नहीं था के एक पागल या कवि में से कौन से रूप में वो खुदको माने. इसके अलावा पुराने इस्लामी राज्य के मुताबिक वह पैशाचिक प्रभाव के तहत था जब वह  सुरा ५३ लिख रहा था जो मेरे लिए दावे की वैधता पर ही सवाल करने के लिए कारण है.

न केवल यहाँ सवाल है इन दावों और व्युत्पत्ति के अपने स्रोतों की प्रकृति के बारेमें, लेकिन हम उनकी व्यक्तिगत विशेषताओं और चरित्र में प्रश्न देखते हैं. उन्होंने उनकी मान्यताओं के प्रचार के लिए आवश्यकता पर्नेपर सैन्य बलका का इस्तेमाल किया. ये धर्म आगे जाकर जिहाद या ‘पवित्र युद्ध’का रूप लेने वाला था और आज भी इस्लाम को टिके रखने के लिए यही रणनीति इस्तेमाल करते हैं. यह रक्तपात के साथ शुरू हुआ और यह आज भी खून बहा रहा है. तो यह एक ऐसा धर्म है जो अपनी पहचान प्यार के मानव अभिव्यक्ति का ऊंचा स्थान पर नहीं करता है बल्कि यह मानव महारत जो मानवता के विनाश और शोषण की ओर जाता है इस पर केंद्रित है.

सत्ता के इस दुरुपयोग के साथ वह एक बच्ची जिस्से लाभ लेता है और बाद में ९ साल की उम्र की उस बच्चीके साथ शादी करता है और वह बच्ची यौवन तक पहुँचे इससे पहले कि उसके साथ सम्भोग भी करता है. मानव अधिकारों के उल्लंघन के अन्य उदाहरणों में महिलाओंको अगर आवश्यक समझा गया तो थोडा बहुत पिटाई करने को बोला गया है .

इस बिंदु पर अब बिना ज्यादा जांच किये यह कहा जा सकत है के इस धर्म को एक संदिग्ध व्यक्ति जिसमे स्थिरता का अभाव है उसने स्थापित किया है.

वहाँ दूसरे ऐसे लोग भी है जिसने इतिहासमें राजनीतिक या धार्मिक मंच इस्तेमाल करके अपने उद्देश्यों और आदर्शोंको पूरा किया है. इन आदर्शोंने मानव जाति के नरसंहारके लिए कई बरबादी और पूर्वाग्रह और असहिष्णुता को जन्म दिया है जो मानव प्रभाव और क्षमताओं से परे है. कुछ चीजें तो इतनी मूर्ख है कि यह केवल प्रकृति में राक्षसी मान कर ही वर्णित किया जा सकता है. स्टालिन और हिटलर जैसे लोग जो झूठे भविष्यवक्ता थे और उनमें पूर्ण अधिकार था जिस वजह से वो पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुके थे और अपनी योजनाओं को पूरा करने के लिए लगे हुए थे. यह आश्चर्यजनक है कि कैसे लोगों  हिटलरको  करिश्माई नेतृत्व करनेवाला बताते थे जो खुद मानसिक रूप से अस्थिर हो सकता था. इन बातों को आज देखें तो हमें आश्चर्य लगता है की इतना गिरा हुआ काम २०वी सदी मैं कैसे मुमकिन है और इन बातों को लोग पूरी तरह से मानते हैं. दुर्भाग्य से यह  घटनाएं आज भी इस्लाममें हो रहा है . यह पागलपन मानवता और संस्कृति के हर पहलूको संक्रमण कर रहा है . इसके दावोंको लोग मानते आ रहे हैं और इस बात को कोई भी समझ नहीं रहा है के हिटलर के राज्य की तरह एक दिन सब कुछ विनास होजाएगा.

इन नीच और दुष्ट पुरुषों ने जो महान गलतियाँ और अपराध किये हैं वो पूरी दुनिया जानती है और घूंघट के पीछे के अंधेरे की गहराई को भी सब देख चुके हैं. इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिसका दुनिया भर में प्रभाव है और ये महामारी के अनुपात में मानव जातिको संक्रमित कर रहा है. दुनिया में ऐसे हजारों लोग हैं जो गलत रूप से पीड़ित होते हैं और मर जाते हैं क्योंकि एक आदमीने संदिग्ध प्रेरणा का एक सपना देखा.

क्या आप सच में मौत और विनाश के इस मार्ग का अनुसरण करना जारी रखना चाहते हैं? यदि आप इस्लाम के एक करता हैं तो मैं आपको सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ के जिस चीज को आप पवित्र मानते हैं उसके बचाव में सोचना छोड़ दीजिए और परमेश्वर से प्रार्थना कीजिए के उनको आपके सामने प्रकट करें जो जीवन देने आए और वो भी प्रशस्त मात्रा में और जिनका नाम येशु है.

 

 

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