Archive for December, 2011

हरे कृष्ण

Sunday, December 25th, 2011

हरे कृष्ण या ‘कृष्ण चेतना के लिए अंतरास्ट्रीय समाज’ कहा जाने वाला धर्म या संप्रदाय एक आंदोलन है जो हिंदू सोच पर आधारित है. यह अपने विचारों के सभी पहलु में मौलिक नहीं है क्योंकि यह अपनि प्रभाव अपनी माँ धर्म से उधार लेती है. बेशक, अगर विशवास की बात करें तो दोनो में फरक है पर हरे कृष्ण का चेहरा स्पष्ट रूप से वैष्णव के संतान के रूप में पहचाना जा सकता है. इस उपासना का जन्म ईश्वरके अवधारणाको निजीकृत और लोकप्रिय बनाने के लिए हुआ जो इसके हिंदू समकक्ष से फरक है जहां देवी – देवताओं को अलग – थलग किया जाता है.

जब मैं डलास टेक्सास में रहता था तो हम सेहर के उस हिस्से में जाते थे जिसको डीप एल्लुम बुलाते थे और इस्कॉन के साथ ये मेरा पहला अनुभव था. मैं ग्रामीण कान्सास से होने के कारण इन गंजे, रंगीन और खुलेआम भावप्रदर्शक लोग जो ड्रम बजाकर जप और नृत्य कर रहे थे ये देख कर मुझे झटका लगा. उस समय मैं नहीं समझा था के इस सब का मतलब क्या है पर अब मुझे पता है कि यह उनके धार्मिक विचारधाराओं के लिए बहुत जरूरी है.

पूजा की यह लयबद्ध शैलीको धार्मिक गान के मंत्र जप की वजह से एक मुक्ति के रूपमें समझना चाहिए क्योंकी ये भगवान के नामको जादुई चीज से जोड़ती है और किसी तरह रहस्यमय और बुद्धिहीन तरीके से परमेश्वर के छुपे हुए ज्ञान देती है. इसका मतलब अकेले शब्दों में उस व्यक्ति की अज्ञानता को बदलने का जादू है जो उसे बोल रहे हैं. बेशक इस समीकरण में और अधिक चीजें हैं, लेकिन फिर भी यह एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है और उनके धार्मिक प्रथाओं के लिए एक आवश्यक घटक ये है के आदर्श के लिए इस मंत्र का जाप दिन में १०८ बार करते हैं और पूरा ध्यान केंद्रित करके अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए एक साधन के रूप में माला जप (माला) का प्रयोग करते हैं. यहां तक कि सड़क पर एक अजनबी कृष्ण के किसी भी ज्ञान के बिना इस मंत्र में शामिल होकर समझ से बाहरके शब्दों के जीवन को बदलने की शक्ति से लाभ ले सकता है.

यह सब लेकिन बहुत ही जादुई प्रकृतिका लगता है जिसके द्वारा एक व्यक्ति धार्मिक अभिव्यक्ति को संतुष्ट करने के लिए शब्द को नियंत्रण और प्रयोग करता है जैसे की बोल, शब्दों और वाक्यांशों को जोड़ना. ऐसा प्रतीत होता है कि अनंत बार दोहोराने के माध्यम से यह लगभग एक लय बन जाता है जैसे के एक कृत्रिम निद्रावस्था और कुछ समय बाद मुंह की बोली पूजा करने वाले की दिल की ईमानदारी के साथ संयुक्त नहीं रहती. हालांकि यह दावा किया जाता है कि इस प्रतिक्रिया को मन पर कृत्रिम रूप से लादा नहीं जाता पर मैं उलझन में हूँ क्योंकी जो मैं देखता हूँ वो सिर्फ एक थकाऊ और अंतहीन सम्बोधन प्रक्रिया है. तो उन व्यक्ति का क्या जिसके पास उनके सभी मानसिक या शारीरिक संकाय नहीं है और कृष्ण के इस भक्ति अनुष्ठान में शामिल नहीं होसकते और उनके बारे में क्या जो विकलांग हैं और ताली और नृत्य के द्वारा अपने पापों को दूर करने में सक्षम नहीं हैं? क्या इन असक्षम व्यक्तियों को उनके ही बुरा कर्म के उत्पाद के रूप में लिया जाता है और ये माना जाता है के उनको अपने ही भाग्य पर छोड़ देना चाहिए और अपने अगले सांसारिक कर्म या पुनर्जन्म के साथ उनको विशवास के इन धार्मिक अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण भागोंमें हिस्सा लेने का मौका मिलेगा?

यह मुझे एक और विवादास्पद स्थिति की तरफ लाता है की पूर्वी धर्मों के बीच सबसे आम कौनसा है और समसारा या पुनर्जन्म के विश्वास में कौन केंद्रीय सिद्धांत है जब की इसकी पुष्टि करने के लिए कोई वास्तविक सबूत नहीं है सिवाए व्यक्तिगत धोखा के या फिर ऐसे विचार रखने वालों के दिमाग पर राक्षसी प्रेरणा का प्रभाव भी हो सकता है.

विज्ञान ने दूसरों की गवाही के माध्यम से मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में अनुसंधान की शुरुआत की है उन अनुभवों को साबित करने के लिए और मृत्यु की वातावरण को नियंत्रण करना जो किसी अंतिम अवस्था के बीमार इंसान के क्षमता से बाहर की चीज है. मैंने मृत्यु के बाद के जीवन पर  ब्लॉग में लिखा है जो मौतके नजदिक और नैदानिक मौत के अनुभव पर आधारित है और कुछ लोगों ने वापस आकर उनकी कहानियां सुनाई और इसको दुनिया भर में से रिपोर्ट किया गया जो बाइबलके मृत्युके बाद के जीवनके अवधारणा से मिलती है नाकि वापस घूमने के लिए दूसरे शरीर में पुनर्जन्म से.

क्या नर्क वास्तव में है?

मुझे लगता है कि इस स्थिति के खिलाफ प्रमुख दार्शनिक तर्क ये है की कैसे एक व्यक्ति को  परिवर्तन किया जा सकता है जब के पिछले जीवन के पापों से वो अनभिज्ञ है? इसके अलावा आपको कैसे पता चलेगा के आपने उस चक्र से निकलने के लिए पर्याप्त कर लिया है और क्योंकि आप के पास इस बात का आत्मविश्वास नहीं होगा के इस आध्यात्मिक विमान पर आप कहाँ से आए और कहाँ जा रहे हैं ये बस आपको जीवन में डर और धोखा या फिर जीने के नाश्वाद सोच के पास लेजाएगा.

इसके अलावा अगर आत्मा के अनन्तता में विशवास की बात करें जो कारण के अनुभवजन्य साक्ष्य विचार के साथ संघर्ष करता है, इस प्रक्रिया को कैसे शुरू किया जा सकता है क्योंकी इसे समय की सुरुवात की आवश्यकता होगी बनाम कालातीत समारोह की और उसे सुरुवात कैसे करेंगे क्योंकि ब्रह्मांड के मूल के लौकिक अस्तित्व तो है जैसेकी दूरबीनों और हिसाब के यंत्रों  के माध्यम से देखा गया है?

वैसे भी आगे बढ़ने पर मैं उनके ईश्वरके विषय में विरोधाभासी धारणा पर चर्चा करना चाहूँगा जो एकतरफ एकेश्वरवाद होने का दावा करते हैं और दूसरी और अद्वैतवाद के विचारों को बनाए रखते हैं. संक्षेप में वो खुदको या फिर मुक्ति पाने वाले को अपने मुख्य देवता से अलग एक अलग इकाई के रूपमें नहीं देखते और एक बार कोई व्यक्ति अगर इस आध्यात्मिक स्थिति में पहुँच जाए तो वो फिर से देवत्व की एकता में वापस अवशोषित हो जाते या मिलजाते हैं. फिर भी मैं इस बात का यकीन नहीं लगा पा रहा हूँ कि शुरूमें कैसे इश्वरको सबसे पहले विभाज्य किया गया?

विडंबना यह है के पवित्र अनुग्रही भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद का कहना है कि अगर कोई भगवान होने का दावा करता है तो वो व्यक्ति एक कुत्ता है और अनिवार्य रूप से इस बात की पुष्टि यही सिद्धांत करता है. यदि यह मामला है तो देवता के उन अवतारों का क्या जो श्री चैतन्य महाप्रभु के व्यक्ति में प्रतिनिधित्व करते हैं?

इस आंदोलन के लिए एक और संघर्ष की बात उनके नैतिक विशेषताएँ हैं जो उनके और खुद के सराहनीय घटक हैं फिर भी उनके अपने नेताओं और लगावकर्ताओं में कमी है और ये उनके बचावके संदेश के आवश्यक प्रकृति के विपरीत है.

ये आंदोलन विवाद में डूबा हुआ है और ६० और ७० की उमंग का समय के विपरीत वहाँ कम दृश्यता है जो किसी समय अपनी प्रसिद्धि के लिए दावा कर रहा था. इन अपवित्र खुलासों में से कुछ तो तब हुआ जब उनके प्रतिष्ठित गुरु प्रभुपाद की मृत्यु हुई. बिलकुल इसी समय पर नेतृत्व के घोटालों की बात बाहर आई क्योंकि वहाँ आंतरिक शक्तिके लिए कई नेताओं के इस्तीफे की वजह से बहुत से नेताओं पर कर की चोरी, अफीम का व्यापार और हत्या जैसे अभियोग लगाए गए. विडंबना यह है कि इन लोगों को सांसारिक संलग्नक ना बनके पवित्रता की अग्रणी जीवन जिनी थी पर ये मुख्य फसल ही सडे हुए सेब से भरे हुए निकले.

इसके अलावा इस पूरे दौर के लिए सबसे अधिक आश्चर्य की बात और परेशान पहलू यह है कि उनके मुख्य देवता कृष्ण नशा और व्यभिचार जैसे पाप का आनंद में भाग ले सकते हैं पर उनके भक्तों को इन सब में सामिल होने से बचना है जो उनके भविष्य के विपरीत बात है. में जैसा कहूँ वैसा करो पर मैं जैसा करूं वैसा मत करो ऐसा कहना तो बिलकुल गलत बात हुआ. भक्तों को इन चीजों से (भक्ति) के माध्यम से अलग रहना है और एक बार मुक्ति प्राप्त होने के बाद ये सब करना जरूरी नहीं है क्योंकि आप ईश्वरत्व की तरफ लौट गए फिर भी ये सब  कुछ अजीब मोड़ की तरह लगता है जो तर्क बेतुका है जो सबसे अच्छे रूप में विरोधाभासी और बेतुके लगते हैं और सब से बुरे रूप में यह एक झूठ है जो कई कीमती लोगों की आत्माओं को नाश कर चुका है जो लोग अपने नाम और परिवारको समेत त्याग कर धोखे के जाल में पद गए.

अंत में हरे कृष्ण आंदोलन अन्य विभिन्न भारतीय धार्मिक समूहों की तरह धार्मिक अभिव्यक्ति के लिए एकल भावनाको निर्वासित करते हैं . फिर भी व्यावहारिक बात करें तो उन्होंने विभिन्न धार्मिक विचारों के समूह की तुलना में अपने विश्वासों में एक अद्वितीय अभिव्यक्ति के रूप में विशिष्टता बनाए रखा है. फिर भी ईश्वरको अल्लाह, जेहोवा, बुद्ध आदि के रूप में चित्रण करना उनके लिए विरोधात्मक प्रकृति है और अगर आप दुनिया के अन्य विविध धर्मों का अध्ययन करेंगे तो आप को पता चलेगा के उनके धर्मशास्त्रके अपने  ही सिद्धांत एक दूसरे से असंगत हैं.

अन्त में हरे कृष्ण आंदोलन के भक्तों द्वारा यीशुको कृष्ण के बेटे के रूप में माना जाता है और मैं आप के साथ यीशु के कहे शब्दोंको उनके चेलों से जैसे लिया गया वैसे ही कहता हूँ.

शुरू करने के लिए यीशुने कभी नहीं देखा कि मानव जाति इश्वर के हस्तक्षेप बिना केवल खुद के लिए नैतिक पूर्णताको प्राप्त करने में सक्षम और आत्मनिर्भर था. हम मैथ्यू १९ में अमीर जवान आदमी की बाइबलिय गवाह में इसका एक उदहारण देखते हैं जो सारांश में अपने व्यवहार में किसी औसत पवित्र आदमी से ज्यादा नैतिक था जिसने यीशु को भी भावुक कर दिया फिर भी अपने धन की वजह से वो परीक्षण में विफल रहा जिसके वजह से उनके चेलों ने ये सवाल किया के कैसे किसी को बचाया जाना संभव है और यीशु का उत्तर था के इंसान के लिए ये असंभव है पर परमेश्वर के लिए तो सब कुछ संभव है.

वो अमीर जवान आदमी शायद आत्मविश्वास की भावना के साथ यीशुके निकट गया होगा बिलकुल उसी तरह जैसे हम दूसरों के साथ हमारे कार्यों की तुलना करने पर महसूस करते हैं और शायद हम यीशु के दिन की धार्मिक कट्टरपंथियों की तरह बन जाते हैं जो इश्वर के सामने प्रार्थना में अपने धर्म के कामों के सभी पूर्वाभ्यास करते थे पर कभी अपनी नाकामी और पापों का एहसास नहीं करते थे और फिर भी एक तुच्छ और समाजसे निर्वासित कर उठानेवाला जो अपनी विनम्रता में दया के लिए रोया और इश्वर से उसे बचाने के लिए चिल्लाया और उस दिन वही था जिसे उचित ठहराया गया,लुका १८.

यीशु हमें आजाद कराने और हमें हमारे पापों की क्षमा देने और इश्वर के साथ हमारा एक उचित रिश्ता बनाने के लिए आए (मती ०१:२१) और उन्होंने हमें फिर से पैदा किया है जो पुनर्जन्म के साथ भ्रमित होनेकी वजह नहीं है पर ये हमारी आंतरिक प्रकृतिको बदलने की बात करता है नाकि शारीरिक एवं बाहरी आणविक संरचना के पुनर्गठन जो पुनर्जन्म से सम्बंधित है. एक दिल का बदलाव है और दूसरा केवल शरीर के भागों को बदलने के लिए है, ३ जॉन.

वो प्रार्थना जो यीशुने मैथ्यू ६:५-८ में कहते हैं 5 “जब तुम प्रार्थना करो तो कपटियों की तरह मत करो. क्योंकि वो यहूदी प्रार्थना-सभाओं और गली के नुक्कडों पर खड़े होकर प्रार्थना करना चाहते हैं ताकि लोग उन्हें देख सकें. मैं तुमसे सत्य कहता हूँ के उन्हें तो उसका फल पहले ही मिल चूका है. किन्तु जब तू प्रार्थना करे, अपनी कोठरी में चला जा और द्वार बंद करके गुप्त रूप से अपने परम-पिता से प्रार्थना कर. फिर तेरा परम-पिता जो तेरे छिपकर किए गए कर्मों को देखता है, तुझे उनका प्रतिफल देगा. जब तुम प्रार्थना करते हो वो तो विधर्मियों की तरह यूँ ही निरार्थक बातों को बार – बार मत दुहराते रहो. वे तो यह सोचते हैं की उनके बहुत बोलने से उनकी सुनले जाएगी. इसलिए उनके जैसे मत बनो क्योंकि तुम्हारा परम पिता तुम्हारे मांगने से पहले ही जानता है के तुम्हारी आवश्यकता क्या है.”

मैथ्यू ११:२८-३० में यीशु कहते हैं “अरे ओ थके-मांदे, बोझ से दबे लोगों! मेरे पास आओ , मैं तुम्हे सुख चैन दूँगा. मेरा जुवा लो और उसे अपने ऊपर संभालो. फिर मुझसे सीखो क्योंकि मैं सरल हूँ और मेरा मन कोमल है. तुम्हे भी अपने लिए सुख-चैन मिलेगा. क्योंकि वह जुवा जो मैं तुम्हे देरहा हूँ बहुत सरल है. और वह बोझ जो मैं तुम पर डाल रहा हूँ, हल्का है. ”

उन्होंने यूहन्ना ८:३६ में यह भी बताया है “जो इसने कहा है उसका अर्थ क्या है? की तुम मुझे ढूंढोगे पर मुझे पाओगे नहीं. और जहां मैं होऊंगा वहाँ तुम नहीं आ सकते. ”

मुझे पता है कि मैंने अपनी लेख में कई चुनौतीपूर्ण और कठोर बातें कहा है और मेरी इच्छा किसी को जानबूझकर अपमान करने का नहीं है. फिर भी मेरी प्राथमिक विवाद संस्था के साथ है हालांकि मैं जानता हूँ कि संस्था व्यक्तिगत है और यह लोगों द्वारा प्रबंधित किया जाता है. मुझे लगता है इस नजरिए से कह सकते हैं कि मेरी बातों को अवैयक्तिक शून्य के रूप में लिया नहीं जा सकता है और ये बस प्रबंधकीय स्थिति से ही नहीं बल्की हरेक उन अभ्यासकर्ताओं जो इन सब को पवित्र मानते हैं उनके नजर से महत्वपूर्ण और शत्रुतापूर्ण लगता है. मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ के मेरा इरादा परोपकारी है और मैं सिर्फ ये पूछ रहा हूँ के आप शायद अपनी स्थिति का समीक्षा या पुनर्विचार करें वो भी व्यक्तिपरक अनुभव बनाम एक उद्देश्य दृष्टि से. अपने धार्मिक संस्कृति से परे होकर देखें और सच का पीछा करें और वो आपको जहां लेजाए वहाँ जाइए. यदि आप खुले विचार के हैं तो मैं मेरी धार्मिक नजरिया आपके साथ बांटना चाहूँगा और मैंने अपने विचार को आपके सामने पहुंचाने के लिए ब्लॉग में अन्य संबंधित लिंक भी शामिल किया है. इश्वर आपको आपके इस प्रयास में आशीर्वाद दें.

 

 

कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ?

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अन्य संबंधित लिंक

हरे कृष्ण संसाधन

jesusandjews.com/wordpress/2010/08/08/hare-krishna/

 

 

“From the Handbook of World Religions,published by  Barbour Publishing, Inc. Used by permission.”

दर्द और पीड़ा

Sunday, December 25th, 2011

क्यों दुनिया में दर्द और पीड़ा है और विशेष करके हमारे व्यक्तिगत जीवन में ऐसा क्यों है इस जटिल सवाल का जवाब देना और वो भी इस छोटी ब्लॉग में यह मुश्किल है. इस विषय पर कई किताबें लिखी गई हैं और ये प्रश्न जबाब के लिए भीख माँग रहा है. इस ब्लॉग के द्वारा मेरा उद्देश्य यह है कि लोग अक्सर अपने दर्द और पीड़ाके अस्तित्वको भगवान के साथ जोड़कर उनके प्रति एक गलत धारणा रखते हैं.

जब दर्द दुख, और बुराई की समस्या से निपटने की बात आती है, वहाँ कई चुनौतियां होती हैं जो इस बार पर निर्भर करती हैं के हम इसको इश्वरकी उपस्थिति और उनका हमारे साथके सम्बन्धको कैसे देखते हैं. यह उनकी संप्रभुता और अच्छाई के साथ साथ उनकी वास्तविकता पर ही सवाल खड़ा करती है. एक और विचार जिसको हमें ध्यान देना चाहिए वो ये है की अगर भगवान मौजूद हैं और वो इस पीड़ाको अनुमति क्यों देते हैं, तो क्या अच्छाईको अनुमति देने के लिए भी क्या वही जिम्मेबार हैं?

बाइबलके परिप्रेक्ष्य से जो मेरी इस समस्या को हल करनेका तरीका है वो ये है के बुराई एक मौजूदा सच्चाई है जिसकी सुरुवात समय की शुरुआत के साथ ही हुआ था. बुराई के साथ साथ दर्द और पीड़ा भी रहते हैं. यदि आप सृष्टिके खाते का अध्ययन करेंगे तो आप देखेंगे की इश्वरने जो सुरुवात में बनाया था वो बहुत अच्छा था और उन्होंने जब मानवको बनाया तो उसे विकल्पों में से चुननेकी क्षमता देदी और आप जानते हैं के जिस किसीके पास भी विकल्प हो वो अपनी संस्कृति पर प्रभाव डालसकता है. बेशक इस प्रभावके परिणामस्वरूप अंततः मानावने भगवान की अच्छाईको ठुकराते हुए अपनेआप और सृष्टि के सभी पर अभिशाप लाया. इस अभिशाप के एक परिणामके स्वरुप मानावने खुद को भगवान से विमुख करने का प्राकृतिक क्षमता पालिया. बुराई की साजिश के लिए मानव जाति की योगदान के साथ साथ एक दूसरा दुश्मन अर्थात शैतान भी है. वह एक विरोधी है जो परमेश्वर और उसकी रचना की भलाई के विरोध में काम करता है. वह अपने राक्षसी साथियों के साथ भगवान के लिए एक आध्यात्मिक समकक्ष के रूप में देखा जाता है और भले ही वे नग्न या प्राकृतिक आंखसे नदिखे पर वे वर्तमान और हमारी दुनियाके एक सक्रिय वास्तविकता हैं और मानव जाति और प्रकृति पर कहर लारहे हैं. जब राक्षसी और मानव तत्व परमेश्वर के दुश्मन के रूप में एक दूसरेके साथ खुशी खुशी शामिल होजाए तो एक जुड़ाहुआ प्रभाव बनता है जिसके परिणाम स्वरुप मानव की सबसे बड़ी भ्रष्टता और दुष्टता है.

इन सबके साथ यह स्पष्ट है कि इश्वर अपनी संप्रभुता में कम से कम एक मौसम के लिए ही स्वतंत्र इच्छाका मौका देते हैं. भगवान के बारे में एक दिलचस्प विशेषता या पहलू यह है कि वह अनन्तके न्यायाधीश हैं जो बिलकुल निस्पछ हैं. समाज की बुराई कर्ताको इश्वरके भविष्य के न्याय में अपने कृत्यों के विषय में जवाबदेही होना पड़ेगा और हमें भी अपने कर्मोंका खाता देना होगा. तो वैसे भी ये कहना चाहिए की इश्वर मानवजातीको उसके अपने फैसलों पर और उसने ईश्वरके अधिनको स्वीकार करके अपना जीवन बिताया या फिर उनके विद्रोह में इसपर आधारित रहकर न्याय करेंगे. तो फैसले में भगवान की संप्रभुता पूरी तरह से प्रयोग किया जाएगा यदि इस जीवन में नहीं तो आने वाले जीवन में.

एक बात जो हमें बुराई और दर्दको ईश्वरकी संप्रभुता और अच्छाईसे जोड़कर देखते वक्त विचार करना चाहिए वो खुद के विषयसे शुरू होता है. इस सवाल को अगर हम हमारे ही जीवन में व्यक्तिगत रूप से एक निष्पक्ष मूल्यांकन करेंगे तो हमें खुद से पूछना पड़ेगा के हमने हमारे अपने जीवन में कोई बुराई तो नहीं बनाई? की हमने किसी भी हद तक और किसी भी समय पर भगवान का उल्लंघन किया है?  क्या हम निर्दोष हैं? क्या हम किसी के सीकार हैं या फिर हम भी पाप अपराधों के अपराधि हैं? हमने हमारी दुनिया में पीड़ा को खत्म करने में क्या मदद किया है ? बाईबल भगवान की दस आज्ञाओंको संदर्भित करता है और इस स्तर पर सभी लोगों ने इंसान और परमेश्वर के विरुद्ध कुछ हद तक पाप किया है. इसलिए हम हमारी दुनिया में इन सब अभिशाप या  दु:ख के लिए जिम्मेदार हैं.

हमें अन्त में यह देखना चाहिए कि खुद परमेश्वर ने यीशु के व्यक्ति के माध्यम से खुदको यातना के एक मानव साधन अर्थात् क्रूस पर मानवता की पीड़ा में दर्द महसूस करने की अनुमति दी. यशायाह नबी का कहना है कि यीशु दु: ख से भरे एक आदमी थे और दु: ख से परिचित भी थे . काफी दिलचस्प बात तो ये है के इश्वर ने खुद को जान – बूझकर दर्द और पीड़ा के मानवीय तत्व के अधिन में रखा और ये कहा के उन्होंने हमारे साथ सब कुछ का सामना किया. उनका दर्द हमारे लाभ के लिए अंततः साबित हुआ क्योंकी उन्होंने अपना ही जीवन हमारे पापी जीवन जिसके लिए पवित्र और सर्वोच्च न्यायाधीश के आगे हमें दोषी ठहराया जाता उसके बदले में एक फिरौती के रूप में देकर परमेश्वर के धर्मी और सही न्याय को पूरा किया. हालांकि हम दुश्मन थे फिर भी वो परमेश्वर और एक दूसरे के साथ हमारे मिलन के लिए मर गए और ये बस अयोग्य प्राणियों के प्रति उनकी दया और अनुग्रह की वजह से संभव हुआ. इस से एक व्यक्तिको ये अनुमान लगाना चाहिए के इश्वर बुराई के आगे भी अच्छे और संप्रभु रेहते हैं और इस बात में कोई विवाद नहीं है.

जो कुछ भी इस मामले पर  हमारा दृष्टिकोण हो ,ये अच्छे परमेश्वर हमें एक नया आकाश और नई पृथ्वी देंगे और किसी दिन सब दर्द, पीड़ा और दुख को हटाकर परम शांति देंगे. बेशक यह स्पष्ट है कि ये सब अभी तक नहीं हुआ है लेकिन फिर भी यह हमारी आशा है और यह आगामी क्षितिज पर है . एक बात हम आज और अभी सुरक्षित कर सकते हैं कि अगर हम येशुको अपने प्रभु और मुक्तिदाता के रूप में स्वीकार करके उनकी इच्छा पूरा करते हैं तो वो हमारे पापी दिलको बदल देंगे. जब वह हमारे दिलको परिवर्तन करेंगे तो हमारे अपने व्यक्तिगत जीवन में जो अभिशाप है वो उलट जाएगा और इश्वर हमारे भीतर अपने अच्छाईका उत्पादन करेंगे और वो भी इस हद तक के हम हमारे दुश्मन से प्यार कर सकते हैं.

मैं एक ‘शहीद की आवाज’ नामक समूहका समर्थन करता हूँ और उनके आंकड़ों के आधार पर कहा जा सकता है की ऐसे ३००००० ईसाइ हैं जो अपने विश्वास के लिए हरेक वर्ष पीड़ित किए जाते हैं. अब एक शहीद सिर्फ ऐसा कोई नहीं है जो विश्वास के लिए मरते है बल्कि यह वो सब हैं जो अपने विश्वास के लिए अमानवीय व्यबहारका सामना करते हैं. इसमें नौकरी, परिवार, घर,आदि का खोना या फिर शारीरिक और भावनात्मक यातना आदि हो सकता है. उनकी बस इतनी दोष है की वो ईसाई हैं और वो एक ऐसे शत्रुतापूर्ण संसार में रेहते हैं जो उके विशवास के प्रति असहिष्णुता से भरे हुए हैं. कैथोलिक मत में चला कुछ ऐसे ही बातें हैं जो क्रूसेड और धर्माधिकरण लगायत अन्यको भी सताते थे. फिर भी मसीह ने कभी भी इस तरीके से उनके राज्य के लिए लड़नेको नहीं बोला और उन्होंने ये भी कहा की हमें उनके चेलों के रूप में हमारे दुश्मनसे भी प्यार करना चाहिए और दूसरा गाल आगे कर देना चाहिए. तो वो सभी जो मसीह के दावे करते हैं, लेकिन दुनिया की तरह शत्रुतापूर्ण व्यवहार भी करते हैं वो वास्तव में उनके अनुयायि नहि हैं. एक तथ्य बात तो ये है के बहुत से ये शहीद जिनको सताया जाता है वो उनके अत्याचारीको माफ करके उनके लिए प्रार्थना करते हैं.

वैसे भी हम पीड़ा के लंबाई और चौड़ाई के बारे में प्रश्न तो उठा सकते हैं पर अगर अनंतकी बात करें  तो ये क्षणभंगुर है. बाइबल धुवां के एक वाष्प के रूप में मानव जीवनको परिभाषित करता है. प्रेरित पौलुस ने कहा कि हमारे हल्का और क्षणिक मुसीबतें हमारे लिए एक अनन्त महिमा लारहि है जो उन सबसे बोहोत ज्यादा है. फिर भी बहुत लोगों से ज्यादा दुःख तो उन्होंने ही पाया क्योंकि उनको ५ बार कोड़े लगाए गए, ३ बार छड से पीटा गया , एक बार उनपर पत्थराव किया गया और ३ बार उनको क्षतिग्रस्त किया गया था. वह अपने मिशनरी सफर के दौरान अधिकांस समय खतरे में थे, जब वह दूसरों के कल्याण को बढ़ावा देते थे. ये मुझे उन मानवीय मदतों की याद दिलाती है जो चर्च के माध्यम से बड़े पैमाने पर पूरे दुनिया को मिल रहा है और परमेश्वर या मसीह का उनके दिल पर प्रभावके बिना ये मदत आज दुनिया के लिए संभव नहीं होता. यह रूपांतरण के लिए एहसान नहीं है. मैंने अपनी सेवानिवृत्ति के साथ ७०००० डलर प्रति वर्ष बनने वाला काम इज़राइलके तेल अवीव सेहेर में भोजन और कपड़ों के वितरण केंद्र में स्वयंसेवा करने के लिए छोड़ दिया और बोहोत से लोग तो प्रभुमें नहीं आए पर हमने बांटना और सेवा देना जारी रखा.

अंत में मैं ये कहना चाहूँगा की कभी कभी दर्द और पीड़ा अच्छाई का एक बचाने वाला  कार्य उत्पादन कर सकता है . इस बातको समझाने के लिए कई उदाहरण है पर जो मैं अक्सर सोचता हूँ वो ये है के किसी दुर्घटना के बाद वहाँ पर ‘रोकने’का संकेत रखना चाहिए. दुर्भाग्य से किसी दूसरे के लिए किसी और को पीड़ित होना पड़ा और यह इश्वर ने हमारे लिए अपने पुत्रको पीड़ा सहने की इजाजत देके जो किया ऐसा सुनाई देता है जिसमें फाइदा हमारा ही हुआ.

वैसे भी यदि इस सब के बाद भी अगर बात समझ में नहीं आता है तो हम जो कर सकते हैं वो है इश्वर पर भरोसा. यह उसी तरह है के जब हम छोटे थे और हम जीवन के बारे में बातें समझ नहीं पाते थे , लेकिन हम हमेशा हमारे माता पिता को हमें प्यार और सुरक्षा देने के लिए भरोसा करते थे. बिलकुल यही इश्वर चाहते हैं के हम उनके साथ करें जब हम संकट के बीच में होते हैं. यहां तक कि अगर हमारे पास हर सवाल का जवाब होता तो क्या उसे हल करने के लिए पर्याप्त होता. परमेश्वर हमारी बुद्धि के बारे में चिंतित नहीं हैं जितना वो हमारे दिल के बारे में चिंतित हैं और इसी बात में दुविधा की कुंजी निहित है. चलो बस भगवान पर भरोसा रखें.

 

 

कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएं

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बौद्ध संसाधनें

हिंदी-बुद्ध-धर्म

Pain and suffering 

आप क्यों एक मुसलमान हो

Sunday, December 25th, 2011

आप क्यों एक मुसलमान हो? क्या आपने वास्तव में इस सवाल के बारे में विचार किया या सोचा है? क्या इसका कारण आपका व्यक्तिगत रूप से आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि पाना या जीवन का रहस्योद्घाटन मिलना था? या फिर परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत अंतरंग संबंध मिलने के कारण से स्वाभाविक रूप से आप इस्लाम धर्म की ओर गए?

क्या आप एक मुसलमान है क्योंकि आपकी संस्कृति और समाज ने आपको उस प्रकार से परिभाषित कर दिया है? विचार कीजिए के अगर आप अमेरिका जिसको बाईबल बेल्ट माना जाता है वहाँ के किसी क्षेत्र में अगर पैदा हुए होते तो क्या होता? ऐसे अवस्था में आपका इस्लामी विश्वास को मानने या फिर विश्वास करने के कितने संभावनाएं होते?

क्या आप एक मुस्लिम हैं क्योंकि आपको चुनाव की स्वतंत्रता नहीं है और अन्यथा करने से आप सब कुछ खो देंगे? एक बार फिर से सोचिये के अगर आप एक लोकतांत्रिक समाज में पैदा हुए होते जहां धार्मिक स्वतंत्रता की अनुमति होती है, तो क्या आप अभी भी एक मुस्लिम ही होना चाहेंगे?

क्या आप एक मुसलमान है क्योंकि आप के परिवार आप से यही उम्मीद करते हैं और वही आप के विश्वदृष्टि और मूल्यों को परिभाषित करते हैं?  सोचिए के आपका परिवार आपको अपने स्वयं के विषय में निर्णय करने की पूरी तरह से अनुमति देते हैं और आप की स्थिति की परवाह किए बिना आप को स्वीकार करते हैं?

क्या आप एक मुसलमान हैं क्योंकि यह बाकी सब कर रहे हैं? क्या होगा अगर आप एक ऐसे संस्कृति का एक हिस्सा हैं जो विश्वासोंकी विविधता के लिए अनुमति  देती है? क्या आप अभी भी आप इस्लाम को गले लगाने के लिए प्रेरित होंगे?

क्या आप इस्लामको इसलिए मानते हैं क्यों के धार्मिक अधिकारियों और शिक्षा प्रणाली ने आप से ये कहा है की इस्लाम ही सच्चा धर्म है? कल्पना कीजिए के अगर आप एक नास्तिक देश में पैदा हुए होते जहां इश्वर बिना के जीवन की एक पूरी अलग दर्शन है तो भी क्या आप मुस्लिम की रहेंगे?

क्या आप एक मुस्लिम हैं क्यों की आपको मुस्लिम नहोने से या फिर इस विशवास को नामानने के परिणाम से डर है. सोचिये अगर ये भय या संकोचकी सामना आपको नहीं करना पड़ता तो आप क्या करते?

क्या यह संभव है कि इस्लाम एक अभ्यास है जिसको भौगोलिक स्थान के आधार पर परिभाषित किया गया है?

क्या यह संभव है कि एक व्यक्ति को किसी धार्मिक प्रणाली में इतना एकीकृत किया जा सकता है कि उसके प्रभाव से मुक्त होना उसके लिए लगभग असंभव होजाए?

क्या ये संभव है के हम बस उस बात पर अंधा विशवास करें जो हम को मानने के लिए बोला गया है और उसके बारे में पूछताछ करना भी मना है?

एक व्यक्ति को एक संस्कृति इतना अलग कर सकती है के उसको बाहर के स्रोतों से प्रभावित ही नहीं किया जा सकता?

एक धर्म को लोगों को नियंत्रित करने और छेड़छाड़ करने का एक तरीका बनाया जा सकता है जिससे राजनीतिक एजेंडा पूरा होसके?

एक धर्म क्या आपको अपनी व्यक्तिगत पहचान की भावना खोने का कारण बन सकता है?

आप ईमानदारी से अपने आपको बताओ कि ये ब्लॉग के माध्यम से सोचने के बाद भी आप इस्लाम में अपने विश्वास पर अडिग हैं या फिर आपको संदेह है?  यदि आप अभी भी अपने विश्वासों में समर्पित हैं तो क्या आप अभी भी मुस्लिम रह सकते हैं उस गर्व की वजह से जो आप को कभी गलत नहीं होने देगा? या आपका अधिक विशवास आपको धोखा दे सकता है?

तो अपका एक मुस्लिम होने में सच प्रेरणा क्या है? यह वास्तव में सत्य का एक मामला है या यह संस्कृति द्वारा परिभाषित किया गया है?

इस्लाम के विकास ज्यादातर सैन्य विजय और बच्चे के जन्म के माध्यम से हुआ है. क्या  ये दृष्टिकोण वास्तव में एक गंभीर या वैध विश्वास करने के लिए काफी है?

वैसे भी ऐसे मुसलमान हैं जिनहहोने इस्लाम पर शक किया और चमत्कारिक ढंग से यीशु में विश्वास द्वारा मुक्त होगए. मैंने अपने ब्लॉग साईट पर एक लिंक दिया है जिसमें पूर्व मुसलमानों की गवाही है जिन्होंने अपने संदेह और भय के लिए एक दूसरा उपाय ढूंढ निकाला.

समापन में मैं आपको एक चुनौती देता हूँ की आप इन गवाहियों को पढ़ें और परमेश्वर से पूछें की यीशुको आप के सामने प्रकट कर दें वो भी ऐसे रूप में की आप उनको प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में विशवास कर सकें. किसी भी तरह के डर को आपको ये करने से नरोक्ने दें ये सोचकर के ये आपको उस स्वर्ग में प्रबेश करने से रोकेगा जिस में आपके जाने की कोई गारंटी नहीं है.

 

 

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क्या कुरान पवित्र है

Sunday, December 25th, 2011

जब कुरान की पवित्रता पर हम विचार करना चाहें तो इसे अन्य साहित्य के किसी टुकड़े की तरह विश्लेषण करके इसके दावे को प्रमाणित करना चाहिए.

कुरानको इस्लाम के भीतर इस तरह का एक उच्च स्थान दिया गया है कि यह आस्था के मानाने वालोंके बीच मूर्ति पूजा की एक वस्तु बन गया है.

इस के अलावा इस्लाम के दावे इसके शाब्दिक सबूत के पार जाता है.

मैने मोर्मोन के अध्ययन के दौरान इसका इस्लाम की परंपराओं से कुछ समानताएँ देखा. मोर्मोन स्वर्ण पर लिखी गयी एक स्वर्गीय शिलालेख में विश्वास करते हैं जिसको एक स्वर्गीय दूत ने दिया था और ये लिप्यंतरण के लिए सुरक्षित रखा गया था.

इसके अलावा जोसेफ स्मिथ एक सच्चे विश्वासको ढूँढने में लगा था और उसके कई कहे गए सामनों के बाद उसने ये माना के एक सच्चाई के बारे में कई सारे विस्वास हैं.

अभी तक इन दिव्य रहस्योद्घाटन के बावजूद “मोर्मोन की पुस्तक” कुरान की तरह एक संपूर्ण दस्तावेज़ से कम ही है .

मुस्लिम ये दावा कर सकते हैं कि कुरान सबसे सही और सुंदर साहित्यका स्रोत है जो इस्लाम के अनुसार आंतरिक दैवी प्रेरणा के माध्यम से प्रमाणित होते हैं.

अभी तक यह भी मोर्मोन की पुस्तक लिखी गई पुस्तकों में सबसे सही है, ये कहते समय जोसेफ स्मिथ की स्थिति भी यही रही होगी.

हालांकि, ये दोनों ग्रंथ उनके दावे से कम हैं क्योंकि दैविक स्थापना के उनके दावे में सच्चाई नहीं है. दावा करना और वास्तविक रूप में होना दो अलग बातें हैं और एक व्यक्ति को साबित करना चाहिए या फिर एक प्रसंसनीय सबूत देना चाहिए जो उसके दावे को साबित करता है.

कुरान शुरू करने के लिए एक एकल संस्थापक थे जो एक संदिग्ध चरित्र के हैं.

इन बारे में खुलासे की शुरुआत से मुहम्मद अपने स्वयं के विवेक पर शक करता था और वह नहीं जानता था कि क्या वह एक पागल आदमी था या एक कवि था. उसने अपने आप को शैतानिक शक्तियों से भरा हुआ पाया और उसके कई अभिव्यक्तियों की वजह से ऐसे खुलासे प्राप्त हुए जैसे की मुँह से फीज निकलना या एक ऊंट की तरह गरजना जैसे अजीब व्यवहार. इस नवी के बारे में और एक सवाल है के अल्लाह एक शिच्छित सच कहने के लिए एक गवार को क्यों चुनेंगे, जो सच उसके अपने जीवनकाल के दौरान संकलित भी नहीं किया गया था.

वैसे भी एक और ब्लॉग है कि जिस में मैंने इस विषय पर और चर्चा की है

क्या मुहम्मद एक झूठा भविष्यद्वक्ता है

कुरान के बारे में और एक बात यह है के इसने अपनी साहित्य और स्रोतों से लिया है. ये स्रोतें बाइबल और अन्य विधर्मी पाठ हैं जैसे की जुदेव इसाइ मनगढ़ंत साहित्य जो विशवास से बाहर थे क्योंकि इनमें दैविक प्रेरणा नहीं था. ये लेखन दोनों यहूदी और ईसाई संस्कृति से बाहर कर दिए गए थे और इन्हें कभी गंभीरता से नहीं लिया गया.

इन लेखों के इलावा इनमें फ़ारसी पारसी के मौखिक परंपराओं का प्रभाव था जिसको भी कुरानके लेखन में सामिल किया गया.

तो अल्लाह अपने स्वर्गीय संदेश सांसारिक दूतों और मानव परंपराओं से कैसे उधार ले सकते हैं?

मानव का कल्पना या मानव आविष्कार से हम पूर्णता या चमत्कारकी क्या उम्मीद लगा सकते हैं जिसे समाज ने अस्वीकार कर दीया क्योंकी वो साहित्य पूर्ण नहीं था?

यदि इस्लाम सर्वोच्च धर्म है तो इसने अपने स्वयं के स्रोत सामग्री देने के बजाय अन्य धार्मिक आंदोलनों के इतिहास और संस्कृति का बचा उधार क्यों लिया जो इस्लाम के ही समय में थे?  ये कितना मौलिक है?

एक और सवाल है की यह माना गया पवित्र पाठ हड्डी, लकड़ी, चमड़े, पत्ते, और चट्टानों जैसे ग़ैरमज़बूत और अल्पविकसित चीजों पर क्यों निर्भर था.

कुरान को स्मृति और भाषण के अविश्वसनीय गवाही द्वारा इकट्ठा किया गया था और इसके शुद्धता और यथातथ्यता को बचाकर इसको गिरने से बचाने के लिए पूरी याद होना जरूरी है.

तो इस पुस्तक को “सभी पुस्तकों की माँ” के रूप में वर्णित करना चाहिए या यह वास्तव में प्राचीन साहित्य के किसी अन्य भाग से अलग नहीं था.

ये कभी नहीं साबित हुवा के कुरान मुहम्मद के जीवन के दौरान या उसकी मौत के बाद शीघ्र ही सिद्ध किया गया बल्कि सबूत से पता चलता है कि ये नवी के मरने के १५० से २०० साल तक इसका बिकास किया गया और ८ वीं या ९ वीं सताब्दी में इसे बाहर लाया गया.

विद्वानों का निष्कर्ष है कि कुरान की बातें एक आदमी के द्वारा नहीं बल्कि सौ या दो सौ  साल की अवधि में पुरुषों के एक समूह द्वारा इकट्ठे किये गए थे.

कुरान का सबसे पुराना प्रति ७९० इस्वी में मेल लिपि में लिखी गयी थी जो के मुहम्मद की मृत्यु के १५० साल बाद की बात है.

यहां तक कि सबसे पुराना पांडुलिपि ही उसको मुहम्मद के समय से करिब सौ साल अलग कर रहे हैं .

इस के इलावा उथमान के प्रतियां भी अब अस्तित्व में नहीं हैं जिसके बारे मैं इस्लामी विद्वानों अन्यथा दावा करते हैं पर वास्तविकता यह है कि जो कुफिक लिपि इन विवादास्पद ग्रंथों में प्रयोग की गयी हैं वो उस समय के दौरान उपयोग में नहीं था और उथमान के निधन के साल बाद तक दिखाई नहीं दिया.

इसके अलावा माना जाता है कि अरबी भाषा अल्लाह का स्वर्गीय जीभ है और कुरान की सुरुवात अल्लाह के साथ ही हुआ तो क्यों कुरान अपनी बातें कहने के लिए अकादियन, अश्शूरियों, फ़ारसी, सिरिएक, हिब्रू, ग्रीक जैसे विदेशी भाषाओं का उपयोग करता है.

यदि कुरान इतना प्रामाणिक है तो उसका एक मूल पाठ अभी भी क्यों उपलब्ध नहीं है क्यों की इस्लाम के सुरुवात से रहा सभी दस्तावेज पूरी तरह से बरकरार है? निश्चित रूप से अल्लाह उसकी संप्रभुता में अपने ही पवित्र पाठ की संरक्षण जरूर कर सकता था .

कुरान के इतिहास के संबंध में यह माना जाता है के  इसकी संरचना ज़ैद इब्न थाबित के तहत हुआ था जो मुहम्मद के लिए एक निजी सचिव था. अबू बकर के निर्देश के तहत ज़ैद मुहम्मद की बातें लेकर एक दस्ताबेज बना रहा था.

नतीजतन, उथमान के शासनकाल के दौरान जो तीसरा खलीफा था, जान बुझ कर प्रयास किया गया के कुरान को मानकीकरण किया जाए और पूरे मुस्लिम समुदाय के ऊपर उस दस्ताबेज को लागू किया जाए जिसके लिए ज़ैद के उन दस्ताबेज के अन्य प्रतियां भी बने और सभी प्रतिस्पर्धी दस्तावेजों को नष्ट किया गया था .

कौन इस पाठ को मानक कह सकता है क्योंकि एक आदमी में अंतिम अधिकार दिया गया बनाम वो तमाम विश्वासियों के समुदाय जिसमें से कई मुहम्मद के व्यक्तिगत साथी भी थे.

अब हमारे पास इस पहले से मौजूदा पाठ के प्रतियां पर प्रतियां हैं . हमें कैसे पता चलेगा कि जो हमारे पास है वो वास्तव में सच कुरान का प्रतिनिधित्व करता है और क्या मुहम्मद भी इसके संपूर्ण सामग्री को मान्यता देता?

इसके अलावा बहुत से सबूतको नष्ट कर देने की वजह से अमिश्रित पाठको पुनर्निर्माण करनेका एक सटीक तरीका भी नहीं है.

ज़ैद, अब्दुल्ला इब्न मसूद, अबू मूसा, और उबय्य के मौजूदा पाठों के बीच मतभेद है. उनमें विचलन और विलोपन थे फिर भी इन पाठों के सृस्तिकर्ता मुहम्मद के संबंध में विश्वसनीय व्यक्ति थे.

अब्दुल्ला मसूद मुहम्मद द्वारा कुरान पाठ का एक शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था और उबय्य नबी का एक सचिव था.

मेरा प्रश्न है के नबी के निजी चेलों के बीच किसका पांडुलिपि सही या अधिक आधिकारिक था?

शुद्धता के अंतिम प्राधिकारी बनने के लिए उथमान कौन था जबकि वहाँ अन्य प्रामाणिक ग्रंथों भी थे जिन्हें अन्य समुदायों द्वारा मान्यता प्राप्त था.

इसके अलावा पाठ संकलित करते समाया ज़ैद “पत्थराह” से संबंधित कुछ बातें शामिल करना भूल गया.

इन सभी पाठों के एकजुट करने के लिए किया गया संघर्ष के बाद अल हज्जाज द्वारा समीक्षा और संशोधित किया गया जो कुफा का गवर्नर था.

उसने शुरू में ११ ग्रंथों में संशोधन किया और अंत में अपने परिवर्तनको कम करके ७ में ही सिमित कर दिया था.

इस कार्रवाई के बाद हफ्साह पाठ जो मूल दस्तावेज़ था जिसमें से अंतिम पाठ लिया गया था उसे बाद में मिर्वान, मदीना के गवर्नर द्वारा नष्ट कर दिया गया था .

इसके अलावा कुरान में अभिनिषेध के कई घटनाएं हैं जो आंतरिक विरोधाभास से जूझने के उपाय हैं और इन्हें सुधार के रूप में व्याख्या किया गया है.

मैं सोच रहा हूँ के कैसे आप पहले से ही पूर्ण रही चीज़ को सुधार सकते हैं क्यों की इस रहस्योद्घाटन को सामने आने के लिए केबल २० साल लगे और उसे अपने सांस्कृतिक मानकों के विकास की जरूरत ही नहीं पड़ी.

अभिनिषेध की संख्या ५ से ५०० के बीच है . अन्य लोगों का कहना है कि यह २२५  के करीब है. हमें इससे ये पता चलता है कि अभिनिषेध के विज्ञान वास्तव में एक अयथार्थ विज्ञान है, क्यों की कोई भी वास्तव में नहीं जानता के कितने छंद निराकृत हैं.

आंतरिक विरोधाभासों के अलावा इसमें वैज्ञानिक तथा व्याकरणके त्रुटियां भी हैं.

इन भिन्नताओं के इलावा हदीसों की बढ़ती संख्या है जो अचानक ९ वीं सदी मैं दिखी जो इस घटना के २५० साल बाद की बात है.

यदि ६००,००० हदीस की बातें उस समाय में प्रचालन में थे तो उस में से ७००० से कुछ ही ज्यादा बच गए और बाकी ९९ प्रतिशत को गलत करार दिया गया.

फिर भी अगर ९९% गलत कह रहे हैं तो हम कैसे इस १% पर भरोसा कर सकते हैं  जिसको अल बुखारी ने मंजूरी दी थी?

मुस्लिम परंपरा कहानी कहने वालों या फिर कुस्सास की मौखिक संचरणसे भी बिकसित हुआ था जिसको ८ वीं सदी के बाद ही इकठ्ठा किया गया था. इन कहानियों को आम लोकगीत से लिया गया था और इस प्रकार इस्लाम में एक बड़ा विरूपण आगया.

इसके अलावा अगर आप कभी टेलीफोनका खेल या कहानी एक दुसरे को सुनाते हुए एक बड़े समूह में सुनाते हैं तो आप अक्सर अंतिम में एक पूरी अलग कहानी उस अंतिम इंसान से सुनते हैं.

अब सौ या दो सौ सालमें अगर ये बात फैला है तो आपको क्या लगता है इस अभ्यास का अंत परिणाम क्या होगा ?

कुरानको अल्लाहका खाका या साहित्यिक बराबरी नहीं रही सबसे बड़ी चमत्कार के रूप में मानना एक अतिशयोक्ति है जो कई मोर्चों पर निराधार है.

कुरान जबाब की तुलना में ज्यादा सवाल छोड़ता है.

क्या कुरान साहित्य का एक शानदार टुकड़ा है या फिर अपनी प्रसिद्धि के दावों से कम है.

क्या यह साहित्य के किसी अन्य टुकड़े से बराबरी नहीं करने जितना सुन्दर है ? ये देखने वालों के लिए छोड़ दिया गया एक राय है जैसे की और बोहोत सारे शास्त्रीय साहित्य होते हैं जिनमें से कुरान अपना आधार लेता है और औरों के राय के आधार पर इस साहित्यिक क्षेत्र से पार जाता है.

एक किताब जो और किसी पुस्तक के आगे दूसरा नहीं माना जाना चाहिए उसे कई बार बहुत सी जगह पर असंबद्ध और गलत तरीके से सम्पादित किया हुवा कहा जाता है और वो ऐसे लोगों की आलोचना और जांच में खड़े होने के लिए सक्षम नहीं है जो इसके प्रामाणिकता को अपना उद्देश्य बना कर देखने के काबिल हैं.

समुदाय के भीतर के लोगों के लिए आज्ञाकारी बनके नासमझ रूप से इसकी सभी बातों को मानना जरूरी है जो इसके पूजा करने वालों को इसके लेख के बारे में गंभीर तरीके सी सोचने का मौका ही नहीं देता.

इसके लेख पर प्रश्न उठाने का मतलब है अल्लाह पर और उसके नबी पर प्रश्न उठाना जो मुस्लिम सोच से बहुत बाहर की बातें हैं जिसको विश्वासघात और अवज्ञा के रूप में देखा जाता है जिसके परिणामस्वरूप अनन्त नतीजों के साथ गंभीर परिणाम मिलता है.

आप कह सकते हैं कि यह कुरान इस्लाम के इन सभी संक्रमण काल के सभी चरणों से बच गया और मेरे लिए प्रमाणों के बाबजूद ये एक दिव्य रहस्योद्घाटन है कहके विश्वास करना एक चमत्कार ही होगा.

अंत में मैं कुरान के बारे में कोई भी अन्य टिप्पणी नहीं करना चाहता. केवल एक बात मैं कहना चाहता हूँ कि मुझे आशा है की मैंने अपने सीधे बातों को बढ़ा चढाकर नहीं कहा और अपने  मुस्लिम दोस्तों के प्रति अनादर नहीं दिखाया है.

यह करना कठिन है क्योंकि जब एक धर्म को मानसिकता की एक चुनौती के वजाय एक व्यक्तिगत विश्वास के रूप में लिया जाता है, तो उसे अक्सर खतरा या दुश्मनी के रूप में व्याख्या किया जाता है.

मैं चाहता हूँ कि आप कृपया मुझे माफ कर दो अगर यह सब से मैंने आप जिस पाठ को पवित्र मानते हैं उस की दिशा में आपका शक बढाने की वजाय आपके क्रोध को जगाया है.

मेरे इरादे किसिका अपमान करना नहीं बल्कि सत्य की रक्षा करना है और सत्य के रास्ते पर चलना है जहाँ यह अंततः हमें नेतृत्व करके लेजाए.

अन्त में इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए जे स्मिथ द्वारा लिखे गए लेखों को पढ़ने का सल्लाह देता हूँ जिसके बारे में मैंने ऊपर भी कहा है.

 

 

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क्या काबा पवित्र है

Sunday, December 25th, 2011

हालांकि अरब ने इस्लाम के सच्चे परमेश्वर के रूप में  अल्लाह को अपनाया है,पर अभी भी उसके बहुदेववादी अतीत को वो अलग नहीं कर पाया है .

काबा  जो मक्का में स्थित इमारत की तरह एक घन है ये इस्लाम का सबसे पवित्र स्थल है पर इस्लाम के आगमन से पहले यह एक मंदिर के रूप में इस्तेमाल किया गया था.

इस संरचना की आधारशिला एक काला उल्का है जो स्वर्ग से गिर गया था और वो मानव पाप के अंधेरे के साथ जुडा था यह  कहा जाता है. आज मुसलमान हज के दौरान पूजा या पूजा के एक अधिनियम के रूप में इस पत्थरका चुंबन करते हैं.

पुराने इस्लामिक संस्कृति में प्राचीन अरब वस्तुकामुक थे जो अपने खुद के कर्मकांडों और प्रथाओं के एक भाग के रूप में इन काले पत्थरको मूल्यवान मानते थे.

अरब पत्थर उपासक थे जिसमें अपने आदिवासी समूहों को अपने स्वयं के काबाका अभयारण्य था जो अपने खुद के काले पत्थरका पूजा करते थे.

काबा के साथ जुड़े अनुष्ठान मंदिर की परिक्रमा है. कैसे इस बुतपरस्त अभ्यास की उत्पत्ति हुई इस पर एक सिद्धांत था कि ये आदिवासी समूहों काबा की परिक्रमा करते थे जो चाँद, सूरज और सितारों की पूजा से संबंधित था. इस अभ्यास के दौरान इन पत्थरमें देवता या आत्माओं का निवास माना गया और चुंबन भी किया जाता था. इस पत्थर की छूने का यह चुंबनसे  आशीर्वाद मिलता है वो ऐसा सोचते थे.

काबाके काले पत्थरके संबंध में इसके अलावा चंद्रमा भगवान की पूजा भी थी.

अरब संस्कृति के उनके प्राचीन बुतपरस्त अरब समाज के बारे में अतीत के साथ जुड़े अन्य पहलुओं मीना पर पत्थर  “” भागो “सफा और मारवा जो सिर्फ काफिरकि दो मूर्तियों के बीच में चलाने के लिए इस्तेमाल किया गया एक कानूनका नवीकरण है, और अंत में “स्तुति करो” जो अपने मृत पूर्वजोंकी तारीफ करने के लिए इस्तेमाल किया गया और अब इस कार्यसे अल्लाह की ओर प्रशंसा के साथ पुनः निर्देशित किया गया है.

अरब संस्कृति अपनी बुतपरस्त अतीत से अलग नहीं हो पाया है भले ही उनके एकेश्वरवाद के नए बैनर तले सब कुछ होनेका दावा वो करते हैं. इस्लाम धर्म में अरब संस्कृति को शामिल करने का यह अभ्यास अपनी धार्मिक घटक के लिए शुद्धता के बजाय एक मिश्रण की तरह लगता है और काबा एक प्रमुख स्तंभके रूप में रहने से पता चलता है कि इसके धार्मिक संरचनामें कुछ दरारें हैं .

तो इस्लाम एक सच्ची श्रद्धा के रूप में अपना खुदका पहचान बनाने के बारे में कितनी दूर आया है? यह स्पष्ट है कि यह इसकी संरचना जूदेव ईसाई विश्वासों से उधार लिया गया है और अपनी बुतपरस्त अतीत से इसने अपनेआपको भरा है?.

यह वास्तव में सच्ची श्रद्धा है या बस विभिन्न अन्य धार्मिक दुनियासे लियागया स्थानीय धर्म के अभ्याससे एकजुट विचारों के एक समूह का एक उधार है ?

क्या आप इस्लामको अपने पूरे दिल से स्वीकार करके उसे अपनानेके लिए तैयार हैं जो अपने खराब इतिहास से अलग नहीं हो पाया है?क्या इस्लाम मूर्ति पूजा को एक नया रूप देकर एक स्वर्गीय दूत द्वारा दियागया नया धर्म के रूप में स्थापित नहीं है? इस्लाम के घूंघट के पीछे देवताओं के एक टोटेम पोल बनाम अध्यक्ष मूर्ति छिपा है .

इस ब्लॉग लेखन में मैंने एक साथ कई अलग अलग इस मामले से संबंधित संसाधनों को जमा किया और डाटा संकलन कर एक ईमानदार और निष्पक्ष मूल्यांकन करने की कोशिश की है .

मैं चाहता हूँ की आप इस लेख के समग्री को केबल मानहानि के साधन के रूप में खारिज न करें. मैं आपको इस मामले के बारे में अपने स्वयं के अनुसंधान करके एक खुला मन रखके सोचने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ.

इस ब्लॉग के माध्यम से मैंने इस्लामी विश्वास के लिए एक चुनौती की पेशकश की है, जबकि अनावश्यक बदनामी और मुसलमानों और जिसको वो पवित्र मानते हैं उसकी ओर झूठे आरोप लगाने की कोशिश नहीं की है.  मैं जानता हूँ की मेरे कई मुसलमान दोस्त परमेश्वर को पुरे दिल से मानते हैं और मैं इस बातका सम्मान भी करता हूँ. फिर भी मैं उन्हें तथ्यात्मक जानकारी देकर ही उनकी निष्ठाके बारे में निर्णय बनाने में गाइड करने की कोशिश करना चाहता  हूँ.

समापन में, यदि आप एक मुस्लिम हैं तो मैं आपको प्रोत्साहित करता हूँ के प्रार्थना के माध्यम से इस्लामी विश्वास और अभ्यास के पीछे की सच्चाई के बारेमें भगवान से पूछिए.

 

 
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क्या मुहम्मद एक झूठा भविष्यद्वक्ता है

Sunday, December 25th, 2011

क्या मुहम्मद एक झूठा भविष्यद्वक्ता है? कई धर्म और उपासनाएं है जिसमे एक व्यक्ति सत्य के  मध्यस्थ होने और विशेष रहस्योद्घाटन प्राप्त करने के दावे करता है. फिर भी हमें पता लगाना चाहिए कि इन स्थितियोंमें से सच क्या है और मिथकों या झूट क्या  है. परमात्मा से ज्ञान मिलने का बयान कोई भी कर सकता है, लेकिन कुछ बिंदु पर इन दावोंका निरीक्षण करके देख सकते हैं की आगे की आलोचनाओं के चुनौती के तहत वो खड़े होंगे या नहीं.  एक गवाही उतना ही अच्छा होता है जितना गावाह या व्यक्ति अच्छे होते हैं. यदि आप कानून की अदालत में एक वैध गवाह के रूप में एक व्यक्तिको खड़ा करेंगे तो पहली बात जो आप निर्धारित करेंगे वो है उनकी योग्यता के स्तर. उनको गवाह के रूप में भरोसेमंद उनके चरित्र की विश्वसनीयता के आधार पर गिना जा सकता है या वे एक अयोग्य गवाह के रूप में देखा जाएगा?

मुझे लगता है कि पहली बात जिस पर मैं विचार करना चाहता हूँ वो है इस्लामका प्रवर्तक या संस्थापक का चरित्र जिसने इस्लामको धार्मिक आंदोलन के रूप में परिभाषित किया है.

मुहम्मद एक ऐसा व्यक्ति था जो ध्यान और आध्यात्मिक विषयों के चिंतन के लिए समर्पित हो गया था. इसके दौरान अंत में उसका मुलाकात एक दैविक प्राणीसे हुआ जो उसके हिसाब से एक जिन था. इस मामले उस पर इतना दबाव डाला जारहा था कि उसने दो बार आत्महत्याका विचार किया था और इन खुलासे की वजह से उसे पता नहीं था के एक पागल या कवि में से कौन से रूप में वो खुदको माने. इसके अलावा पुराने इस्लामी राज्य के मुताबिक वह पैशाचिक प्रभाव के तहत था जब वह  सुरा ५३ लिख रहा था जो मेरे लिए दावे की वैधता पर ही सवाल करने के लिए कारण है.

न केवल यहाँ सवाल है इन दावों और व्युत्पत्ति के अपने स्रोतों की प्रकृति के बारेमें, लेकिन हम उनकी व्यक्तिगत विशेषताओं और चरित्र में प्रश्न देखते हैं. उन्होंने उनकी मान्यताओं के प्रचार के लिए आवश्यकता पर्नेपर सैन्य बलका का इस्तेमाल किया. ये धर्म आगे जाकर जिहाद या ‘पवित्र युद्ध’का रूप लेने वाला था और आज भी इस्लाम को टिके रखने के लिए यही रणनीति इस्तेमाल करते हैं. यह रक्तपात के साथ शुरू हुआ और यह आज भी खून बहा रहा है. तो यह एक ऐसा धर्म है जो अपनी पहचान प्यार के मानव अभिव्यक्ति का ऊंचा स्थान पर नहीं करता है बल्कि यह मानव महारत जो मानवता के विनाश और शोषण की ओर जाता है इस पर केंद्रित है.

सत्ता के इस दुरुपयोग के साथ वह एक बच्ची जिस्से लाभ लेता है और बाद में ९ साल की उम्र की उस बच्चीके साथ शादी करता है और वह बच्ची यौवन तक पहुँचे इससे पहले कि उसके साथ सम्भोग भी करता है. मानव अधिकारों के उल्लंघन के अन्य उदाहरणों में महिलाओंको अगर आवश्यक समझा गया तो थोडा बहुत पिटाई करने को बोला गया है .

इस बिंदु पर अब बिना ज्यादा जांच किये यह कहा जा सकत है के इस धर्म को एक संदिग्ध व्यक्ति जिसमे स्थिरता का अभाव है उसने स्थापित किया है.

वहाँ दूसरे ऐसे लोग भी है जिसने इतिहासमें राजनीतिक या धार्मिक मंच इस्तेमाल करके अपने उद्देश्यों और आदर्शोंको पूरा किया है. इन आदर्शोंने मानव जाति के नरसंहारके लिए कई बरबादी और पूर्वाग्रह और असहिष्णुता को जन्म दिया है जो मानव प्रभाव और क्षमताओं से परे है. कुछ चीजें तो इतनी मूर्ख है कि यह केवल प्रकृति में राक्षसी मान कर ही वर्णित किया जा सकता है. स्टालिन और हिटलर जैसे लोग जो झूठे भविष्यवक्ता थे और उनमें पूर्ण अधिकार था जिस वजह से वो पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुके थे और अपनी योजनाओं को पूरा करने के लिए लगे हुए थे. यह आश्चर्यजनक है कि कैसे लोगों  हिटलरको  करिश्माई नेतृत्व करनेवाला बताते थे जो खुद मानसिक रूप से अस्थिर हो सकता था. इन बातों को आज देखें तो हमें आश्चर्य लगता है की इतना गिरा हुआ काम २०वी सदी मैं कैसे मुमकिन है और इन बातों को लोग पूरी तरह से मानते हैं. दुर्भाग्य से यह  घटनाएं आज भी इस्लाममें हो रहा है . यह पागलपन मानवता और संस्कृति के हर पहलूको संक्रमण कर रहा है . इसके दावोंको लोग मानते आ रहे हैं और इस बात को कोई भी समझ नहीं रहा है के हिटलर के राज्य की तरह एक दिन सब कुछ विनास होजाएगा.

इन नीच और दुष्ट पुरुषों ने जो महान गलतियाँ और अपराध किये हैं वो पूरी दुनिया जानती है और घूंघट के पीछे के अंधेरे की गहराई को भी सब देख चुके हैं. इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिसका दुनिया भर में प्रभाव है और ये महामारी के अनुपात में मानव जातिको संक्रमित कर रहा है. दुनिया में ऐसे हजारों लोग हैं जो गलत रूप से पीड़ित होते हैं और मर जाते हैं क्योंकि एक आदमीने संदिग्ध प्रेरणा का एक सपना देखा.

क्या आप सच में मौत और विनाश के इस मार्ग का अनुसरण करना जारी रखना चाहते हैं? यदि आप इस्लाम के एक करता हैं तो मैं आपको सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ के जिस चीज को आप पवित्र मानते हैं उसके बचाव में सोचना छोड़ दीजिए और परमेश्वर से प्रार्थना कीजिए के उनको आपके सामने प्रकट करें जो जीवन देने आए और वो भी प्रशस्त मात्रा में और जिनका नाम येशु है.

 

 

कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ?

 

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मुस्लिम और इस्लामी संसाधन

हिंदी-मुस्लिम

jesusandjews.com/wordpress/2009/04/26/is-muhammad-a-false-prophet/

Divine Light Mission Resources

Friday, December 23rd, 2011

Four Spiritual Laws

 

Jesus Film

 

New Testament

 

Audio Bible

Divine Light Mission

Tuesday, December 20th, 2011

This sect has come to be known as Divya Sandesh Parishad or Divine Light Mission which had originally began as a means of finding enlightenment through knowledge and due to the controversial actions of its propagators there have been many things which have been questionably brought to the light regarding this movement.

Its founder, Guru Shri Hans Ji Maharaj, supposedly came to enlightenment by means of carrying another ones lamp as being under the influence of the Bhagavad Gita and the Sant Mat tradition as well as Arya Samaj.

Shri Maharaji’s message was that all religions are principally one which is irreconcilable for anyone who has an understanding of comparative religions.

jesusandjews.com/wordpress/2010/01/23/all-paths-lead-to-god/

However if this is true then there should be no further reason for him to make any religious distinctions or statements at all since essentially all religions are unified in their core beliefs and by making such a move to add to the richness of the mix only stirs up animosity and disunity among other religious practitioners who hold to a more exclusive view as being the only right road in life versus a convergent path. Furthermore if that be the case then why attempt to advance spiritual knowledge since the distillation of the process achieves the same reality? Therefore if you accept the guru’s viewpoint then essentially there is no good reason to make religious characterizations since we are all headed down to the same watering hole anyway and yet this sect has an individuated personality that signifies this cults identity contrary to a universalist view.

Nevertheless in defense of Hans Ram Singh Rawat he initially resisted towards identifying his movement as a recognizable organization but in time he eventually yielded to the pressure to do so which is understandable considering that he had a peculiarity of belief which is unique. Also this group has a conglomerated mixture of other religious views as well but still there is a particularism which sets it apart from being incorporated or absorbed under the branch of another religious movement by maintaining specific teachings and practices. Thus his concept of unity regardless of cast, creed or religion is only theoretical not practical.

Moreover this whole matter may appear as a progression to establishing peace but does the “ends” of just trying to find something that works somehow justify the “means” of sacrificing the most critical matters of existence regarding ultimate truth? Do we do obeisance and bow to the god of compliance and compatibility irregardless? Is it our personal right and objective to seek for a common solution or denominator towards achieving our own ultimate reality or is this something which is beyond the role of the creature in establishing a criteria for religious duty in respect to a transcendent or supreme being?

Peace is good and should be pursued to the best of our ability but to do so at all costs such as with the intermingling of all beliefs may be a conflict of interest to the creator who establishes the way of truth. In other words it is really not our place to erect another “Tower of Babel” as unifying all humanity under the common banner of our own personalized religious reality.

Additionally another point of contention is expounded by Guru Maharaji’s son and successor Prem Rawat who holds to the belief that the nature of mankind is generally  good and this position grossly underestimates and denies the realities of evil in our society. We may have progressed technologically but the human race has not achieved advancements in ethical and moral values as this century has been the bloodiest era on human record. If goodness is a natural tendency of mankind then why does our society establish laws and government in order to manage and legislate rules so as to make people accountable instead of just trusting them to uphold a proper code of conduct? Could you imagine a society that just allowed people to do whatever they  wanted to do? What do you think the outcome of such a practice would create?  Furthermore if everyone was left to subjectively express their own idea of goodness then essentially goodness might mean different things for different people which would be catastrophic and chaotic.

The irony of these two philosophies of achieving peace and having goodness is conflicted in Shri Maharaji’s own family due to the fighting and argumentation in contending for power as seen displayed between Jagat Janani Mata Shri Rajeshwari Devi and her son Prem Pal Singh Rawat  or Balyogeshwar. This whole concept of unity was abandoned when Balyogeshwar Param Hans Satgurudev Shri Sant Ji Maharaj  married a non Indian or Westerner which alienated him from his family. Also this further scandalized the matter as Divine Light Mission which was to be a beacon of light was schismed in that Prem Rawat’s mother Mata Ji disowned him and appointed his older brother Satpal Maharaj (Satpal Singh Rawat, also called Bal Bhagwan Ji as his brothers successor.

To add to this controversy is the fact that Prem Rawat was first accepted and received by his family as the predecessor of his father, Hans ji, and so my question is who is the real guru here if either?

After this split Satpal Singh Rawat took over the Divine Light Mission in India and latter became the guru for the Manav Utthan Seva Samiti which is an off-shoot of the DLM  and now he and his family are worshipped as divinity in living an excessive lifestyle. Thus his family has taken a free ride on the rickshaw of Indian life which in a sense has promoted a form of caste system towards inequality contrary to the egalitarian views of his father.

Anyway after the death of Guru Shri Hans Ji Maharaj his son Prem Pal Singh Rawat accepted the title of satguru as being the perfect Master but in reality he was anything but perfect. Initially his followers thought of him as the incarnation of the divine and yet many of them were disillusioned as he was seduced by the influence of western materialism in which he obtained luxury automobiles, multiple residences, etc. and even though these extravagant gifts were given to him by some of his followers it was nevertheless viewed as excessive as living the life of a millionaire.

In all fairness regarding his supposed divine status he is noted as going on record in his earlier years as denying his divinity but according to his groupies he was honored and worshipped without any denunciation from him. His title as  being “The Lord of the Universe” and “Perfect Master” along with his supposed self acclaimed role as “The Savior of the World” appears to be a strong proclamation not merely of a respected and honored man but that of a demigod putting him in association with such characters as Jesus and the Buddha. Also during the Millennium festival in the Houston astrodome in 1973 he allowed 20,000 people to offer him worship as he sat on an elevated throne which shows the duplicity to his response as his behavior depicts him as being the Mahharajo or divine incarnation. Additionally this attitude is consistent with Satpal’s actions of acclaiming divinity which makes me wonder if Hans Ram Singh Rawat initially acted out his divine role only to reject and deny it publicly for the sake of avoiding more bad press or controversy.

Needless to say he failed to inaugurate a messianic millennial peace and this carnival was disastrous as the attendance was low along with being financially crippling. In time his credibility began to decline which required him to change his tactics on several occasions to accommodate his popularity. In response to this downturn he vacillated his actions in adapting to maintain his lifestyle by replacing his divine status to being just a teacher and exchanging his Indian wardrobe for a suit. However once he realized that this universal approach actually was not the right move then he proceeded to change back into his original costume.

So as his followers dwindled he manipulated his marketing strategy which caused him to abandon some of his followers who were a part of the original movement as he transitioned from a religious or spiritual  organization to a more secularized self help program known as Elan Vital and The Prem Rawat Foundation.

In summary even though these brothers are on opposite poles of different continents they still share the common ability to be able to brain wash individuals by making them believe in something they are not. The bible forewarns others about falling into this trap of deception as it refers to false teachers, prophets and messiahs.

 

Mt 7: 15-20

15 “Watch out for false prophets(gurus). They come to you in sheep’s clothing, but inwardly they are ferocious wolves. 16 By their fruit you will recognize them. Do people pick grapes from thornbushes, or figs from thistles? 17 Likewise every good tree bears good fruit, but a bad tree bears bad fruit. 18 A good tree cannot bear bad fruit, and a bad tree cannot bear good fruit. 19 Every tree that does not bear good fruit is cut down and thrown into the fire. 20 Thus, by their fruit you will recognize them.

 

 

Anyway this family continues to victimize and dupe their adherents into following after a guru or a teaching which according to their practice is contrary to their intent of bringing about equality, peace, unity and goodness which should lead you to question the efficacy of idealism as preached by their father. So my question to the members of this group is whether or not there is any real hope in trusting these individuals considering that these objectives could not be achieved or obtained by these divinely perfect and enlightened role models? Additionally for this  movement to break down in only two generations is really a commentary in itself on the credibility of this organization or any other subsequent association of which these individuals identify themselves with.

My dear friend I hope that I have no hurt or offended you over this post. Moreover I don’t want you to interpret my content as hate mail or character assassination but I just want you to seriously consider whatever claims these individuals are making in advocating a false sense of security concerning the achievement of a fulfilled and meaningful life. On the positive side of the movement there has been some social benefits towards providing humanitarian aid  but there are other groups who also do a significant work in providing relief or aid. After all this could just be a disguise in order to advocate this whole religious or secular culture and therefore it does not necessitate you taking the bait; hook, line and sinker. These men are mere mortals who can not give you what they themselves do not have as based on their biographical histories.

In conclusion if your mission is to find light I hope that the light within in you is not really  the darkness that is contained within these movements and in turn I would  challenge you to seek out the guiding light of Jesus who lights every mans path.

 

Matthew 6:22-23

 

22 “The eye is the lamp of the body. If your eyes are good, your whole body will be full of light. 23 But if your eyes are bad, your whole body will be full of darkness. If then the light within you is darkness, how great is that darkness!

 

John 8:12

12 When Jesus spoke again to the people, he said, “I am the light of the world. Whoever follows me will never walk in darkness, but will have the light of life.”

 

 

 

How to know God

Divine Light Mission Resources

 

 

 

 

Religions of the world: a comprehensive encyclopedia of beliefs and practices/ J. Gordon Melton, Martin Baumann, editors; Todd M. Johnson, World Religious Statistics; Donald Wiebe, Introduction-2nd ed., Copyright 2010 by ABC-CLIO, LLC. Reproduced with permission of ABC-CLIO, Santa Barbara, CA.

हिन्दु श्रोतहरु

Monday, December 19th, 2011

बाइबल

Nepali Bible New Testament

Audio New Testament

 

चार आत्मिक नियमहरु

www.4laws.com/laws/downloads/NepEng4s.pdf

 

येशुको चलचित्र

Jesus Film: view in Nepali

 

हिन्दु धर्म र पुनर्जन्म

Monday, December 19th, 2011

पुनर्जन्म धेरै पूर्वीय विचारधाराहरुले मृत्युपछिको जीवनमा आफ्नो कर्मको परिणामसँग जोडेका छन् । हिन्दुहरुले जीवनलाई जन्म, मृत्यु र पुनर्जन्मको चक्रका रुपमा लिन्छन् जसलाई सम्सरा पनि भनिन्छ जुन पहिलेको जन्मको सही अथवा गलत कामहरुसँग सिधै सम्बन्धित हुन्छ । उनीहरुको उद्देश्य मोक्ष अथवा मुक्ति पाउनु हो जुन उद्धारको एक रुप हो । त्यसैले हिन्दुहरुको अन्तिम उद्देश्य भनेको यो “जे जान्छ त्यो फर्केर आउँछ” भन्ने चक्रबाट बाहिर निस्किनु हो जसले गर्दा केही पवित्रता प्राप्त गर्न  सकियोस् । उद्धारको यो अन्तिम स्थीतिमा पुग्नकालागि केही मानिसहरुले ज्ञानका तत्व, भक्तिका आधारमा कठिन योग गर्छन् र जीवनको कठिनाइबाट आफ्नो आत्माकोलागि मुक्ति पाउनकालागि कर्महरु गर्छन् ।

तर विश्वासको यो प्रणालीलाई प्रमाणित गर्न भने असम्भव छ र यो धर्म मान्ने मानिसहरुले यी सबै कुराहरुलाई संस्कृतिका रुपमा अपनाउने गर्छन् । मैले भर्खरै मात्र एउटा लेख लेखेको थिएँ जसमा डाक्टर र यी कुराबारे खोजी गर्ने मानिसहरुको आधारमा जीवन र मृत्युकाबारेमा लेखिएको थियो । तर यी शोधका आधारमा बाइबलमा भनेजस्तै मानिसहरु अस्थायी चक्रमा परेर न्याय गर्ने भन्दा स्वर्ग अथवा नर्कको अनुभव गरे ।

के नर्क वास्तवमा छ?

सुरुवातमा भन्दाखेरि म विश्वास गर्छु कि हिन्दु धर्मले दुष्टताको समस्या र यो वास्तविकताको परिणामलाई मान्दैन । यी कुराहरु कसरी नियन्त्रित हुन्छ भन्नेबारे विचारहरु बाइबल र मैले पहिले नै भनिसकेको मृत्युनजिक पुगेका मानिसबारे मेल खाँदैन ।

रोमी १ र २मा भनिएको छ कि हरेक मानिसभित्र एउटा आचरणको दिशासूचक राखिएको छ जसले सही र गलत छुट्याउन सक्छ र हामीलाई पापको स्वभाव र न्यायबारे सूचित गराउँछ । यो ज्ञान हुनु सामान्य कुरा हो र यसले नै हामीलाई मानव पनि बनाउँछ तर यही जन्मदेखिको बुद्धिमताको कुराले क्रिस्टियन र हिन्दु विश्वासमा भिन्नता पनि ल्याउँछ । बाइबलले भन्छ कि मानिस एकचोटि मर्छ अनि उसको न्याय हुन्छ तर हिन्दु धर्मले आत्माको प्रवसनमाथि विश्वास गर्छ जसले गर्दा कुनै अस्तित्व नवीकरण हुन्छ । यो प्रणाली कारण र परिणामजस्तो सम्बन्धमा आधारित हुन्छ र ढिलो अथवा चाँडो अन्तिममा गएर आफूले चाहेकोजस्तो स्थीतिमा मानिसको अस्तित्व पुग्न सक्छ ।

मैले हिन्दु विश्वासमा देखेका केही समस्यामध्ये एउटा यो पनि हो कि केही जनावर र रुखहरुलाई मानवभन्दा बढि मर्यादासाथ हेरिन्छ जुन मेरो विचारमा मानव जातिको पवित्रताको विरुद्धको कुरा हो । मैले तिनीहरुलाई संकेत गर्दैछु जसलाई दलित अथवा अछुत भनेर छुट्याइएको हुन्छ र यिनीहरु भारतको जनसंख्याको पाँच भागको एक भाग छन् । जातिवादको यो प्रकार धेरै अगाडि सरकारले बहिष्कार गरिसकेको छ तर भारतको धेरै भागमा भने हिन्दु विश्वासीहरुले यो प्रथालाई अझै अगाडि बढाइराखेका छन् । वास्तवमा भन्नुपर्दा यो धार्मिक दवावले आफ्नो संस्कृतिको सफलताकालागि यी तथाकथित साना जातलाई आफ्ना नीच कामहरु गर्न लगाएर समाजको राजनीतिक र सामाजिक ढाँचालाई नियन्त्रण गर्छ । साना जातका यी मानिसहरुलाई गरिने नराम्रो व्यवहारलाई सरकारले पनि आवस्यक दुष्टता भनेर स्वीकार नै गर्छ । यी मानिसहरु सानो जातमा जन्म लिनुको कारण यिनीहरुको पूर्व जन्ममा गरिएको गल्तीलाई लिइन्छ जसले यिनीहरुलाई जीवनको यो गाह्रो परिस्थीतिमा पु¥याएको छ । मलाई यो कुरा अचम्म लाग्छ कि हिन्दु धर्मको अहिंसाको नीतिलाई नमानेर कोही मानिसहरुलाई अछुत भनेर छुट्याउन सक्छ ।

क्रिस्टियन संस्थाहरुले प्रभु येशुको प्रेम यी दलितहरुलाई बाँडेका छन् र उनीहरुलाई बताएका छन् कि प्रभुले सम्पूर्ण मानव जातिलाई धेरै नै माथि राख्नुभएको छ । तर जातिवाद अपनाउने हिन्दुहरु यसको विरोधमा उत्रेका छन् र अहिंसाको नीतिलाई भुलेर क्रिस्टियन दलित र संस्थाहरुलाई आक्रमण गर्छन् । केही हिन्दुहरुकालागि मासु नखानू र बलि नदिनु भनेको नै अहिंसा हो तर हिन्दु देवहरुलाई खुशी पार्न साना जातिका मानिसलाई  यसरी त्याग गर्नु भने स्वीकारयोग्य हुन्छ ।

अर्को हिन्दु धर्मको चित्त नबुझ्ने कुरा के हो भने मानव जीवनको पतन असीमित ढंगले हुन्छ र अर्को तिर फेरि यसले सीमित पृथ्वीलाई पनि स्वीकार गर्छ । विज्ञानले पनि एक सीमित ब्रह्माण्डलाई मान्दछ र यो कुरा उनीहरुको दुरबीनद्वारा गरिएको ब्रह्माण्डको विस्तारको अवलोकनले पनि बताउँदछ र यसलाई “ठूलो विस्फोट”भनेर पनि भनिन्छ । मानिसको आत्माको सीमित ब्रह्माण्डमा असीमित रुपको अस्तित्व छ भन्ने कुरा निरर्थक हो । यदि जीवन असीमित छ भने सबैभन्दा पहिलो मानिस कहाँबाट आयो र यो कर्मको वास्तविकतामा मानिसले भाग कसरी लियो यदि तिनीहरु पहिलेदेखि थिएनन् । पहिलो जन्मलाई अर्को कुन कुराले पनि आवश्यक बनाउँछ भने पहिलेदेखि हुँदै नभएको अस्तित्वले त केही काम पनि त गर्न सक्दैन । यदि त्यसो हो भने के परमेश्वर नै ठूलो विस्फोट हुनुभयो र अब हामीले उहाँलाई नै मोक्षद्वारा फेरि सँगै ल्याउँछौँ । यदि सबै प्रमाणले समयको एउटा आरम्भकोबारेमा बताउँछ भने हामीले आज देख्ने जीवन कहाँबाट आयो र पहिलो जन्म के कारणले भयो किनभने जन्म कर्मको परिणम हो ।

कर्मसँग सम्बन्धीत अर्को कुरा यो पनि हो कि मानिसलाई उसले पूर्वजन्ममा गरेको कुराबारेमा उसलाई कसरी थाह हुन्छ र थाह नै नभएको कुरासँग मानिसलाई कसरी जिम्मेबार बनाउन सकिन्छ । उसलाई यो पनि कसरी थाह हुन्छ कि उसले यो जन्ममा गरेको कर्म उसको पूर्वजन्ममा गरेको पापलाई सन्तुलन गर्न पुग्छ कि पुग्दैन । कसलाई थाह छ कि ऊ कहाँ छ, कहाँ जान्छ र कहाँ गएर ऊ सिद्धिन्छ । यसले एउटा मानिसलाई निराशातर्फ नै धकेल्छ र अन्त्यमा ऊसँग  कुनै यस्तो योजना हुँदैन जसले उसलाई मोक्ष प्राप्त गर्न सफल बनाओस् । ती मानिसहरुको निराशाको चाहिँ के गर्ने जो किरा र जनावर जस्ता सानो प्राणीको रुपमा यो पृथ्वीमा आउँछन् र ढलमा हिँड्ने मुसाको भविष्यको उसको जीवनबारे के आशा छ ।

यदि भारतको संस्कृति नै विश्वको आध्यात्मिक केन्द्र हो जसमा धेरै जान्ने गुरुहरुको पहुँच छ भने भारतमा त्यति धेरै कार्मिक पापीहरु किन छन् । कुष्ट रोग लागेका तीन भाग मध्ये एक भाग मानिस र भारतका आधा अन्धा मानिसहरु यही विश्वास त राख्छन् । अन्त्यमा, विश्वासको यो तोडिएको चक्रले ती आराधकहरुको भार थाम्न सक्दैन जसले गाईलाई आफ्नो अन्तिम गनतव्यसम्म पु¥याउने साधनको रुपमा लिन्छन् । फेरि पनि  यो संसार एक मायाजाल पनि त हुनसक्छ जसमा मानिसलाई यो मान्न बाध्य गराइन्छ कि कुनै कुरा वास्तविक छैन भनेर पनि हिन्दु धर्मले नै भन्छ ।

म यो भन्न चाहन्छु कि मैले धेरै कठोर शब्दहरुको प्रयोग गरें र म आफ्ना हिन्दु साथीहरुलाई कुनै प्रकारले अनादर गर्न पनि चाहन्न तर म उनीहरुलाई आफ्नो संस्कृतिको सीमाभन्दा बाहिर गएर सोच्नमात्र अनुरोध गर्न चाहन्छु जुन विश्वासले तिनीहरुको धार्मिक मर्यादाभन्दा बाहिर निस्केर सोच्न दिँदैन । म फेरि पनि यदि मैले कसैलाई चोट पु¥याएँ भने म माफि माग्दछु तर कसैलाई चोट पु¥याएजस्तो नदेखिएर चुनौती दिन पनि त गाह्रै हुन्छ र म विश्वास गर्छु कि तपाईंले आत्मिक यात्राका केही क्षण यी कुराहरुको वास्तविकताबारे सोच्न बिताउनुहुन्छ ।

निष्कर्षमा म विश्वास गर्छु कि येशु प्रभुमा हुने सबैजनाका लागि आशा छ तर यो कुनै धर्मका नियमहरु पालना गरेर भने होइन तर साधारण रुपले उहाँ र उहाँको काममा विश्वास गरेर हो जसले तपाईंलाई तपाईंको आत्माको खालिपनादेखि र मनमा रहेको गल्तीको भावनादेखि छुट्कारा दिन्छ र तपाईंलाई नयाँ जन्मतिर डोर्याउँछ । प्रभु येशुले मती ११:२८–३०मा भन्नुभयो “ म कहाँ आऊ । जो थकित औ कष्टले दविएकाहरु हो, म तिमीहरुलाई आत्माको निम्ति विश्राम दिनेछु । मेरो कामकुरो ग्रहण गर अनि मबाट सिक । म विनयी र विनम्र हृदयको छु । अनि तिमीहरुले आफ्नो आत्मामा विश्राम पाउनेछौ । हो , मेरो काम कुरो ग्रहण गर्नु सजिलो छ । तिमीहरुलाई दिइने भार हल्का छ । ”

 

 

परमेश्वरसँग सम्बन्ध कसरी बनाउने

हिन्दु श्रोतहरु

हिन्दु-धर्म

Hinduism and Reincarnation

 

 

Copyright permission by Bridge-Logos “The School of Biblical Evangelism”

Copyright permission by Random House Inc./Multnomah on New Birth or Rebirth by Ravi Zacharias