Archive for January, 2012

जेसुस अंड गोड (Marathi)

Monday, January 16th, 2012

फौर श्र्पिरितुअल लाव्स

www.4laws.com/laws/marathi/default.htm

 

 

जेसुस फिल्म

Jesus Film: view in Marathi

 

 

नेव तेस्तामेंत

www.wbtc.com/downloads/bible_downloads/

Marathi/Marathi_Bible_90)_New_Testament.pdf

 

 

आउदिओ बिबळे

globalrecordings.net/en/language/38/

خداوند کے ساتھ تعلق کیسے رکھنا ہے ۔

Monday, January 16th, 2012

 بائبل ہمیں سکھاتی ہے کہ انسانیت کو شامل کرتے ہوئے ہر چیز کو خلق کیا اور اگرچہ خداوند کامل اور اچھا ہے ، انسان نہیں ہے ۔ خداوند نے بنی نو ع انسان کو نیک و بدکے درمیان انتخاب کرنے کی قابلیت دیتے ہوئے آزادنیک عامل خدا کی مقدس کتاب ، بائبل، خود خداوند کا مکاشفہ ہے جو ہمیں بتاتا ہے کہ ہم سب نے گناہ کیا اور اُس کے جلال سے محروم ہو گئے ۔

اگر مجھے کچھ احکامات کا نام لینا ہوتا ، جو قانونی کی ایک اخلاقی بنیاد ہے ، یہاں کوئی ایک بھی نہ ہوتا جس نے خدا کے قانون کو کسی حد تک تجاوز کیا ہوتا ۔ گناہ خدا  اور دوسرے لوگوں کی بے حُرمتی کرنا ہے خواہ یہ دوسرے معبودوں کی خدمت کرنے کے وسیلہ سے ہو یا اپنے پورے دل کے ساتھ خدا کی محبت میں مکمل ناکامی کے ساتھ خدا کے نام کا غلط استعمال کرنے کے وسیلہ سے ہو ۔اِس حکم کی ہمارے والدین کی رسوائی کے ساتھ پیروی کی گئی ، قتل جو نفرت کے مساوی ہے ، زناکاری جو ہماری آنکھوں کی ہوس کے برابر ہے ، چوری کرنا ، اپنے ہمسائے کے خلاف جھوٹی گواہی دینا ، اور کسی دوسرے شخص کے مال یا بیوی  کا لالچ کرنا جس کا برتاو غلط خواہشات اور محرکات کے ساتھ ہوتا ہے ۔

یہ بے حُرمتی ہمیں ابدی طور پر خداوند سے علیحدہ اور الگ ہونے کا سبب بنا ۔ دوسرے الفاظ میں ہم کھوئے ہوئے ہیں اور اُس سے جُدا ہو چُکے ہیں کیونکہ وہ پاک ہوتے ہوئے اپنے آپ کو گناہ کے ساتھ صحبت کرنے کی اجازت نہیں دے گا ۔ گناہ خدا کا قہر لاتا ہے اور اُس کی عدالت نہ صرف یہاں ہے بلکہ ابدیت میں بھی ہے ۔ بائبل اِسے ایسی جگہ کے طور پر بیان کرتی ہے جہاں آگ نہیں بجھتی  اور جہاں بڑی اذیت ہے ۔

اِس مقام پر چیزیں نا اُمید دکھائی دیتی ہیں لیکن اچھی خبر یہ ہے کہ خدا نے مسیحاکو بھیجا جو گناہ کے بغیر تھا ۔ اُس کا کام خدا کے سامنے لوگوں کے لیے درمیانی ہونا تھا اور اُس نے ایسا اپنی مادی زندگی کو مہیا کرتے ہوئے خدا کے انصاف کی تسکین کے لیے ہماری خاطر کیا ۔

وہ نا صرف بنی نوع انسان  کے لیے  ہمارے لیے سلامتی کو قا ئم رکھنے کے مرا بلکہ وہ مُردوں میں سے جی بھی اُٹھا  اور اب وہ اُن کا انتظار کرتا ہے جنہوں نے اپنا بھروسہ اُس پر رکھا ۔ پس اب جب ہم موت کے حوالہ کیے جاتے ہیں ہمارے اجسام مر جائیں گے لیکن ہم اُس کے ساتھ موجود ہونگے اور یہی ہے جس کا بائبل ابدی حیات کے طور پر حوالہ پیش کرتی ہے ۔

یہ سب کچھ اُس وقت رونما ہوتا ہے جب ہم یسوع میں اُسے اپنے نجات دہندہ کے طور پر  دل کے ساتھ اپنے ایمان کا اقرار کرتے ہیں ایک ایسے شخص کے طور پر جو گناہ کو مٹاتا ہے اور خدا کےساتھ ہمیں سلامتی کے لیے لاتا ہے ۔ اِس میں اُسے اِس سمجھ میں خداوند کے طور پر قبول کرنا بھی شامل ہے جیسے کہ اب ہم فرمانبرداری کے ساتھ اُس کی خدمت کرتے ہیں ۔

 جب ہم اِس حیثیت کے ساتھ مسیح کو حاصل کر لیتے ہیں پھر وہ ہمیں روح القدس کی شخصیت میں آسمان کی سلامتی کو بھیجتا ہے جو ہمیں خداوند کے لیے ہماری زندگیاں بسر کرنے میں مدد کرتے ہوئے ہم میں سکونت اختیار کرتا ہے ۔

ایمان کی یہ کاروائی پانی کے بپتسمہ  یا غوطہ کی رسم کے تحت سر انجا م پاتی ہے جو پانی والی قبر میں ہونے کی مانند ہے ۔ یہ عمل خداوند کے اندرونی کام کرنے کی یاد گیری میں جسمانی طور پر نئی پیدایش کی طرف اشارہ کرتی ہے جسے اِس عمل کے ذریعہ سے بیان اور قبول کیا جاتا ہے جو اندرونی طور پر ایک نیا شخص بننے کی روحانی حقیقی تبدیلی کے ساتھ تعلق جوڑتا ہے ۔

یہ سارا عمل محض ایک سادہ سی کاروائی کی مانند دکھائی دیتا ہے اب یہ بہت معنی خیز ہونے کے طور پر بھرا ہوا ہے ۔ یسوع آپ کو ایسا کہتے ہوئے دعوت دیتا ہے کہ ، ” اے محنت اٹھانے والو اور بوجھ سے دبے ہوئے لوگو سب میرے پاس آو ۔ میں تم کو آرام دونگا ۔ میرا جُوا اپنے اوپر اُٹھا لو اور مجھ سے ویکھو ، کیونکہ میں حلیم ہوں اور دل کا فروتن ۔ تو تمہاری جانیں آرام پائیں گی ۔ کیونکہ میرا جُوا ملائم اور میرا بوجھ ہلکا ہے ۔

میرے دوست اگر آج آپ اُس کے آپ کے لیے بُلاوے کی آواز سُنتے ہیں پھر آپ مہربانی سے اپنے دل کو سخت مت کیجیے بلکہ اپنی زندگی کو اپنی جان کے رکھوالے کے پاس سونپ دیجیے ۔ وہ آپ سے محبت کرتا ہے اور وہ آپ کو سلامتی بخشے گا جو ساری سمجھ اور خوشی سے بڑھ کر ہے جو ناقابلِ بیاں ہے ۔ یہ ایسا نہیں کہتی کہ آپ کی زندگی میں کبھی کوئی ہنگامہ نہیں ہو گا بلکہ وہ ہم سے وعدہ کرتا ہے کہ وہ ہم سے کبھی دستبردار نہ ہو گا او رنہ ہمیں چھوڑے گا ۔

اختتام پر میں آپ کی حوصلہ افزائی کرونگا کہ آپ اُس سے اُسے آپ پر حقیقی اور قابلِ دید طور سے  آشکارہ کرنے کے لیے دعا کیجیے جیسے ہم اُس پر ایمان رکھتے ہیں ۔ اگر آپ ایسا اپنے دل کی مخلصی اور وفاداری سے کرتے ہیں وہ ہمیں مایوس نہیں کرے گا ہمیں استعاراتی طور پر اِس کا ذائقہ چکھنے اور دیکھنے کے لیے حوصلہ افزائی کی جاتی ہے کہ خداوند کتنا بھلا ہے ۔ آمین ۔

 

 

knowgod.com/ur/fourlaws/0?utm_source=4laws&utm_medium=website&utm_campaign=4laws-visit&utm_content=urdu&cid=dp-website-4laws-gds-qq-4lawsref-ur-4944628045000

یسوع کے ساتھ میری ذاتی گواہی

How to know God

 

Used by Permission from The Pakistan Bible Society

लेअर्ण इंग्लिश (Marathi)

Thursday, January 12th, 2012

श्र्पिरितुअल

मराठी
www.4laws.com/laws/marathi/default.htm
इंग्लिश
Four Spiritual Laws
फिल्म
मराठी
इंग्लिश
बुक

हिंदू इस्लामिक बुद्धिस्त रेसौर्सिस (Marathi)

Wednesday, January 11th, 2012

फौर श्र्पिरितुअल लाव्स

www.4laws.com/laws/marathi/default.htm

 

 

जेसुस फिल्म

Jesus Film: view in Marathi

 

 

नेव तेस्तामेंत

www.wbtc.com/downloads/bible_downloads/

Marathi/Marathi_Bible_90)_New_Testament.pdf

 

 

आउदिओ बिबळे

globalrecordings.net/en/language/38/

कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ?

Tuesday, January 10th, 2012

बाईबल हमें सिखाता है कि भगवान ने मानवता सहित सब कुछ बनाया है और भले ही इश्वर सही और अच्छे हैं, लेकिन आदमी वैसा नहीं है. इश्वर ने मानव जाति को एक मुक्त नैतिक एजेंट बनाया और उसे अच्छाई और बुराई के बीच चयन करने की क्षमता दी. इश्वर का पवित्र पुस्तक, बाईबल इश्वर के खुद के रहस्योद्घाटन के सम्बन्ध में है जो हमें कहता है के हम सब ने पाप किया है और उनकी महिमा से गिर गए हैं.

अगर मैं आज्ञाओं के बारे में कहूँ, जो कानून का नैतिक आधार है तो ऐसा कोई भी नहीं होगा जो कुछ हद तक इश्वर के क़ानून के पार नहीं गया होगा. पाप का मतलब परमेश्वर या अन्य लोगों का उल्लंघन है चाहे वह दूसरे देवताओं की सेवा कर के किया गया हो या फिर इश्वर का नाम दुरुपयोग करके किया गया हो और इसका पूर्ण परिणाम ये होता है के हम इश्वर को हमारे पूरे दिल से प्यार नहीं कर पाते. इस आज्ञा के बाद आता है माता पिता की अनादर, हत्या जो नफरत के बराबर है, व्यभिचार जो आँखों की लालशा से जुड़ा है, चोरी, पड़ोसी के खिलाफ झूठी गवाही देना, और दुसरे आदमी की संपत्ति या पत्नी की लालशा करना जो गलत इच्छाओं और इरादों के साथ जुड़ा हुआ है.

इस उल्लंघन ने हमें इश्वर से सदा के लिए कटौती किया है या फिर अलग – थलग रखा है. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो हम खो गए हैं और उनसे जुदा हो गए हैं क्योंकी वो खुद पवित्र होते हुए खुद को पाप के साथ रहने की अनुमति नहीं दे सकते. पाप परमेश्वर का क्रोध लाता है सिर्फ यहीं पर नहीं बल्कि अनंत काल में भी. बाईबल इस जगह को एक ऐसे जगह के रूप में बयान करता है जहां आग कभी नही बुझती और जहां महान पीड़ा है.

इस बिंदु पर बातें निराशाजनक लगती हैं, लेकिन अच्छी खबर यह है कि परमेश्वर ने मसीहा को भेज दिया है जो पाप के बिना थे. उनका कार्य इश्वर के आगे लोगों के लिए मध्यस्तकर्ता बनना था और उन्होंने ये करने के लिए अपनि भौतिक जीवन को हमारे लिए एक बदले के रूप में कुर्बान कर दिया और परमेश्वर के न्याय को पूरा कर दिया.

वो न केवल मानव जाति के लिए मरे ताकि इश्वर और हमारे बिच शान्ति बन सके, वो मरने के बाद फिर जीवित भी हुए और अब उन सब का इन्तेजार कर रहे हैं जिन्होंने उन पर भरोसा रखा. तो अब जब हम मृत्यु के पार जाएंगे हमारा शरीर तो मर जाएगा, लेकिन हम उनके साथ मौजूद रहेंगे और इसी बात को बाइबल अनन्त जीवन के रूप में संदर्भित करता है.

यह सभी बातें हमारे आगे खुल जाएगा जब हम दिल से यीशु में विशवास रखेंगे और उनको हमारे उद्धारकर्ता के रूप में मान लेंगे जो पाप को निकाल कर इश्वर के साथ हमें शांति में लाते हैं. इसमें एक और बात सामिल है के जब हम उनको प्रभु के रूप में मानते हैं, अब हम उनकी आज्ञाकारिता से सेवा करेंगे.

जब हम इस क्षमता में यीशु को प्राप्त करते हैं तो वह हमें पवित्र आत्मा के व्यक्तित्व में स्वर्ग का एक टुकड़ा भेज देते हैं जो विश्वासी में रहकर हमें इश्वर के लिए जीने में मदत करते हैं.

आस्था की इस लेन – देन के बाद पानी का बपतिस्मा या डूबने का अनुष्ठान आता है जिसको पानी का कब्र माना जाता है. यह क्रिया नया जन्म का प्रतीक है जिसमें इश्वर के भीतर के काम को बाहिरी रूप दिया जाता है जिसको इस क्रिया द्वारा घोषित किया या माना जाता है और ये आतंरिक रूप से नया इंसान बनने के लिए एक आध्यात्मिक वास्तविकता का संचार करता है.

यह पूरी प्रक्रिया एक साधारण लेन – देन की तरह लगता है लेकिन ये महान महत्व और अर्थ से भरा हुआ है . यीशु आपको ये कह कर बुला रहे हैं “महेनत करने वालों और बोझ से दबे लोगों मेरे पास आओ और मैं तुम्हारे आत्मा के लिए विश्राम दूंगा. मेरा जुवा अपने आप पर लेलो और मुझसे सीखो क्योंकि मैं विनम्र और कोमल हृदय का हूँ, और तुम अपनी आत्मा के लिए शान्ति पाओगे, क्योंकि मेरा जुवा सरल है और मेरा बोझ हल्का है.”.

मेरे दोस्त अगर आज आप उनकी आवाज को आपको बुलाते हुए सुन रहे हैं तो कृपया अपने दिल को कठोर मत बनाइए बल्कि अपने जीवन को इस आत्मा के चरवाहा को समर्पित कर दीजिए. वह आपको प्यार करते हैं और आपको एक ऐसी शांति देंगे जो सभी समझदारी और खुशी से बढ़कर है जिसके बारे में बताना भी नामुम्किन है. इसका ये कहना नहीं है के आपको अपने जीवन में किसी भी तूफान के मौसम का सामना नहीं करना पड़ेगा पर वो हमें वादा करते हैं के वो हमें कभी नहीं छोड़ेंगे और कभी नहीं त्यागेंगे.

समापन में मैं आपको प्रोत्साहित करूँगा के आप उनसे प्रार्थना कीजिए के वो अपनेआप को आपके सामने एक वास्तविक और ठोस रूप में प्रकट कर दें ताकि आप उन पर विश्वास कर सकें.

यदि आप दिल की ईमानदारी और निष्कपटता के साथ ऐसा करते हैं तो आपको निरास नहीं होना पड़ेगा क्योंकि हमें प्रोत्साहित किया जाता है ये देखने और स्वाद लेने के लिए के परमेश्वर अच्छे हैं. आमेन

 

 

अन्य संबंधित लिंक

boanuge.github.io/biblesmith/Public/cc.mannam.PDF/Hindi_Indian_-_Four_Spiritual_Laws.pdf

यीशु के साथ मेरी व्यक्तिगत गवाही

How to know God

यीशु के साथ मेरी व्यक्तिगत गवाही

Tuesday, January 10th, 2012

नमस्ते, मेरा नाम रब है और मैं टेक्सास से हूँ जो अमेरिका में है. खैर मैं आपको मेरे खुद के बारे में थोड़ा बताना चाहता हूँ. मैं आम तौर पर परमेश्वर में मेरी आस्था के बारे में अपनी गवाही बता कर सुरु करता हूँ जो मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है. लगभग बीस साल पहले मैं ऐसे समय की अवधि से होकर गुजरा जहां मुझ में वास्तविक सुन्यता और खालीपन था. जब मैंने यीशु में विश्वास किया उन्होंने मुझे पूरी तरह से भर दिया और अब मेरे पास इतना प्रेम, आनन्द और शांति है जितना मुझे इस संसार ने कभी नहीं दिया. वो मेरे जुनून और मेरे जीवन हैं.

अगर मैं इस तरह के अनुभव के वास्तविकता से नहीं गुजरा होता तो मैंने इन सब को लंबे समय पहले छोड़ दिया होता और आस्था के अन्य क्षेत्र में ढूँढना शुरू कर दिया होता. जिस चीज ने मेरी जिंदगी बदल दी वो ये है के मैंने यीशु के साथ एक व्यक्तिगत संबंध में प्रवेश किया जो किसी भी धर्म / दर्शन की सीमाओं से बड़ी बात है. ये इक ऐसा चीज था जो वास्तविक और ठोस था. ये तब हुआ जब मैं अपने जीवन में आस्था को लेकर एक निर्णायक बिंदु पर पहुंचा तब उन्होंने मुझे इतने मौलिक तरीके से बदल दिया के सचमुच रातोंरात मेरे काम करने, सोचने और विशवास करने के तरीके को उन्होंने बदल दिया. मैं एक अलग व्यक्ति बन गया था और इस बात में कोई आशंका नहीं थी की यह परिवर्तन सभी के लिए स्पष्ट था. मैं फिर से पैदा हुआ था और मुझे ये मालूम था के ये सिर्फ एक दुसरे चर्च का अनुभव नहीं था. मैं मसीह में एक नया निर्माण था. अब मेरे जीवन में कुछ परिवर्तन प्रगतिशील थे फिर भी कुछ तो तात्कालिक और रातोंरात के परिवर्तन थे. मैंने देखा है के इश्वर ने मुझे मेरे जीवन में कुछ ऐसे चीजों से छुटकारा दिया है जो मेरे खुद के काबू पाने के प्राकृतिक क्षमता में नहीं था. यीशु ने मुझे निकोटीन की लत से लेकर व्यभिचार तक पापों के विशाल आयाम पर काबू पाने की ताकत दे दी. मैंने विशवास के एक बिंदु पर अपनी पत्नी को अपक्षयी गुर्दे और मेरे बेटे को आस्थमा से ठीक होते हुए देखा. अगर इस बिंदु पर मेरे पास आपको देने के लिए सिर्फ एक राय होता तो मैं अपनी गवाही पढाने में आपका समय बर्बाद नहीं करता.

आप ये कह सकते हैं के आपको मुझ पर विशवास नहीं है या फिर सबसे अच्छा आप मुझे ईमानदार पर ईमानदारी के साथ  गलत सोच सकते हैं पर मैं आपसे निवेदन करता हूँ के किसी तरह से इमानदारी और सच्चाई से परमेश्वर से प्रार्थना करें के वो आपके सामने यीशु की सच्चाई को प्रकार कर दें. खैर पढ़ने के लिए मैं आपको फिर से धन्यबाद देता हूँ और मैं प्रार्थना करता हूँ के इस के माध्यम से परमेश्वर आपको आशीर्वाद दें.

 

 

कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ

jesusandjews.com/wordpress/2012/01/10/कैसे-भगवान-के-साथ-एक-रिश्त/

 

अन्य संबंधित लिंक

My testimony with Jesus

सब के लिए मेरी व्यक्तिगत टिप्पणी

Tuesday, January 10th, 2012

जब मैंने पहली बार ब्लॉग पोस्ट करना शुरू किया मेरे लिए एक निजी नोट को शामिल करना महत्वपूर्ण था वो इसलिए के पाठक को मेरे आचरण और प्रेरणा के बारे में बताना जरूरी था इसके बाबजूद के पदों की सामग्री के बारे में मेरी प्रतिबद्धता थी.

मैंने ऐसा किया क्योंकि इंटरनेट के माध्यम से संचार बहुत सिमित होता है और इसमें इंसान को व्यक्तिगत रूप से जानना मुश्किल है और कभी – कभी एक पाठक का अर्थ को समझने की कुशलता घट जाता है उन लक्ष्य और इच्छाओं का पीछा करते हुए जो उस इंसान से सम्बंधित है जिसने वो ब्लॉग लिखा.

तो शुरू में मैंने हरेक विशेष समूह को अपने विश्वासों और दायरे में व्यक्तिपरक मानके इसको सुरु किया. हालांकि, जब ये ब्लॉग साईट बढ़ने लगा तब मैंने समूहों के आम तत्वों को एक साथ रखने के लिए सब के लिए निजी टिप्पणियां देने के सिवाए एक ही नोट लिखने का फैसला किया क्योंकि मुझे लगा के ये पाठकों को सिर्फ बढ़ा चढा जैसा दिखेगा और टुकड़ों के जैसा लगेगा जैसा के मेरे ब्लॉग साईट में दीखता है.

वैसे भी कभी कभी विश्वास और आस्था के महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करते समय काफी मुश्किल हो जाता है क्योंकि हमारे विश्वदृष्टि हमारे व्यक्ति और व्यक्तित्व के इतने अभिन्न अंग हैं के हम व्यक्ति और उनके मूल्य प्रणाली के बीच का अंतर ही नहीं जान सकते.

एक व्यक्ति को केवल एक बिंदु तक परिवर्तन किया जा सकता है लेकिन हम उन से खुद उनको ही अलग नहीं कर सकते. एक व्यक्ति को उनके दुनिया के विचारों द्वारा ही परिभाषित किया जा सकता है और इससे थोडा भी कम उसको एक बेतुका व्यक्ति बना देता है.

मैं यह कहना चाहता हूँ क्योंकि अक्सर जब मैं धार्मिक विश्वासों या धर्मनिरपेक्ष विचारों के बारे में बात करता हूँ यह अक्सर माना जाता है कि मैं किसी भी तरह से उन्हें व्यक्तिगत रूप से हमला कर रहा हूँ. फिर भी ये मेरा इरादा नहीं है, बल्कि मैं पाठकों के दिल और मन तक पहुँच कर इस बाधा को चुनौती देने की उम्मीद करता हूँ वो भी उनके लिए प्यार और चिंता के एक प्रतिबद्धता के माध्यम से और गुस्से और व्यर्थ निर्णय जैसे बुरे भावना से किए गए व्यर्थ वाद – विवाद से भी बचाना चाहता हूँ जो अक्सर इन प्रकार के विषयों के साथ आता है.

मुझे लगता है कि आप आसानी से इन्टरनेट की लफ्फाजी के भीतर इस प्रकार के ब्लॉग पा सकते हैं और आपको इस ब्लॉग के संवाद में उलझना जरूरी भी नहीं होगा.

मैं मानता हूँ कि कई बार इन ब्लॉगों को लिखते समय मैंने बहुत ही सीधा और प्रत्यक्ष तरीके से बात किया है और कभी कभी मैं भावुक हो गया लेकिन एक बात जो मैं नहीं चाहता के लोग गलत समझें वो ये है के मैं नफरत और पाठक की समूह के ओर क्रोध से प्रेरित नहीं हूँ लेकिन मेरी लड़ाई उन संस्थाओं से है जिन्होंने मतारोपण की इन मान्यताओं को शामिल किया है. फिर मैं ये भी समझता हूँ संगठन लोगों की वजह से मौजूद हैं पर मेरा दिल इन एजेंसियों के अवैयक्तिक कॉर्पोरेट ढांचे की वजह व्यक्ति की देखभाल की ओर समर्पित है.

इसके अलावा, अगर इस ब्लॉग साईट के माध्यम से आपके बुद्धि के बजाय अगर मैंने आपके गुस्से को जगाया है तो मैं अपने संदेश को व्यक्त करने में विफल रहा हूँ. मेरा आशय किसी का अपमान नहीं है भले ही मेरी टिप्पणी को आक्रामक के रूप में देखा जा सकता है और जो सब मैंने किया है उसे अगर नफरत, पूर्वाग्रह और हिंसा की अभिव्यक्ति के रूप में व्याख्या किया जाता है तो संवाद करने के लिए किए गए मेरे इन प्रयासों ने हम दोनों का समय बर्बाद किया है. इसके अलावा, मुझे पता है कि इन ब्लॉगों को पढ़ने से हर व्यक्ति को लाभ नहीं होगा, लेकिन मेरी आशा और प्रार्थना है कि किसी भी तरह से, किसी न किसी प्रकार से इस से किसी के जीवन में फरक पड़ेगा.

जैसे ही मैंने इन ब्लॉगों को लिखने के लिए तैयारी किया तब पूरे ईमानदारी में मुझे ये एहसास हुआ के हर व्यक्ति में कुछ स्तर तक धोखा होता है जिसमें में खुद भी शामिल हूँ और किसी भी व्यक्ति के पास जीवन के हर सवालों का जबाब नहीं होता है. फिर भी इन सीमाओं के बावजूद इसने मुझे सच का पीछा करने और रक्षा करने के साथ उसके पथ में चलने का जिम्मेदारी लेने से नहीं रोका चाहे वो मुझे जहां भी लेजाए और मैं इस रास्ते में आपको मेरे साथ चलने के लिए निवेदन करता हूँ.

मैं जानता हूँ कि “सच्चाई” शब्द का निरपेक्ष रूप में प्रयोग करना थोडा अभिमानी और असहिष्णु सुनाई देता है खासकर इसलिए क्योंकि हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जो राजनीतिक रूप से सही है और सापेक्षवाद के बहुलवादी दृश्य को सही मानता है.

फिर भी हमारा समाज सत्य के महत्वपूर्ण तत्वों पर निर्भर है जो हमारे मानव अस्तित्व के बहुत ही जरूरी आधार हैं. आम तौर पर इसे कानून और व्यवस्था के विभिन्न विषयों में या विज्ञान के संबंध में लागू करने में हमें कोई समस्या नहीं होता है लेकिन किसी तरह हम धार्मिक विश्वास की अवधारणा में इसी तर्क को लागू करना नहीं चाहते हैं.

यदि हम हमारे जीवन की खंडन करते हैं और सच्चाई को सार्वभौमिक रूप से लागू नहीं करते हैं तो अंततः हम खुद को धोखा देकर एक झूट की जिंदगी जीते हैं. अभी तक मानव समाज और संस्कृति की महानता ज्ञान की खोज के माध्यम से हासिल किया गया है और एक बार ज्ञान प्राप्त हो जाए तो प्रगति होता है जो हमें अपने ज्ञान का परम लक्ष्य की दिशा में ले जाता है.

तो आप इन ब्लॉगों में शोध की यात्रा शुरू कने से पहले अपने पहले की सोच और सांस्कृतिक फिल्टर के बारे में ध्यान रखें जो आपके जीवन की व्याख्या को प्रभावित करके आपके जीवन के बारे में सोच को प्रभावित करते हैं और जिसपर आप बिना ध्यान दिए ही काम कर रहे हैं.

इसके अलावा, मुझे पता है कि जीवन के बारे में पुनर्विचार करना एक भयावह बात या एक दर्दनाक अनुभव हो सकता है क्योंकि वहाँ हमारे सोच की त्रुटि की संभावना रहती है जो हमें ऐसे जगह पर ला कर खड़ा कर सकता है जो हमारे सुविधा क्षेत्र से बाहर है. फिर भी हमारे जीवन के बारे में गंभीर रूप से ना सोचने के कारण परिणामस्वरूप हम धोखे से खुदराय अज्ञानता की तरफ आगे बढ़ सकते हैं.

इस के अलावा हम कभी कभी आँख बंद करके हमारे परिवार, साथियों, सरकार, और बड़े पैमाने पर समाज की मान्यताओं को मान लेते हैं और वहाँ उन मान्यताओं को चुनौती देने की संभावना समेत नहीं रहती. हम में यथास्थिति और सामाजिक मानदंडों के साथ चलने की प्रवृत्ति है जिसको हम हमारे जीवन के नैतिक विचारों के लिए एक मानक मान लेते हैं.

यह ऐसा है के हम पहले विश्वास करते हैं और फिर उन मान्यताओं को समर्थन करने में हमारी दुनिया केंद्रित कर देते हैं.

वैसे भी शुरू करने के लिए मैंने जितने भी सन्देश पोस्ट किए हैं उसकी केंद्रीय आकृति लोगों को सुनाने का कोई अर्थ नहीं है और वो ये है के इश्वर सभी से प्यार करते हैं.

यहुन्ना ३:१६ कहता है कि “परमेश्वर को जगत से इतना प्रेम था की उसने अपने एकमात्र पुत्र को दे दिया, ताकि हर वह आदमी हो उसमें विश्वास रखता है, नष्ट न हो जाए बल्कि उसे अनंत जीवन मिल जाए.”

यह आज एक जीवंत वास्तविकता है कि हर संस्कृति, जनजाति, भाषा और लोगों के समूह हैं जो उन पर विश्वास करते हैं और वो भी बल या मजबूर किए जाने की वजह से नहीं बल्कि परमेश्वर के प्रेम की वजह है जिसके परिणामस्वरूप वो बदले हुए जीवन की तरफ आकर्षित हुए हैं.

यीशु की वास्तविकताओं में से एक ये है के उन्होंने औरों के लिए परमेश्वर के प्रेम को प्रदर्शन किया जिसके वजह से लोगों को गतिशील रूप से जिने का उपाय मिला और इश्वर को व्यक्तिगत और वास्तविक रूप से जानने का मौका भी मिला. उनका काम न केवल एक प्रभावशाली आदमी या एक नबी के रूप में पूरा हुआ बल्कि एक उद्धारकर्ता के रूप में भी पूरा हुआ जो दवा व्यसनों, अश्लीलता, चोरी, व्यभिचारी व्यवहार या फिर मानवता के अंदर की सारी बीमारीओं से बचाते हैं. उन्होंने लाखों लोगों के जीवन को परिवर्तन किया है जिसमें मैं भी शामिल हूँ और मेरे लिए मेरी गवाही के संबंध में उनके जीवित शक्ति और व्यक्तिगत संपर्क को इनकार करना आप के प्रति नफरत और बेईमानी होगा.

तो इश्वर के पास लोगों को लाने का येशु का तरीका हमें किसी प्रकार का असंभव बाधा वाला काम कराके या फिर एक योग्यता प्रणाली के माध्यम से क्रेडिट कमाने के प्रयास से नहीं है. पर मसीहा के रूप में उनके व्यक्ति और काम में हमारी आस्था और विश्वास रखने के द्वारा उन्होंने ये संभव बनाया है और हमारी अच्छाई भी यही है.

यीशु ने कहा “महेनत करने वालों और बोझ से दबे लोगों मेरे पास आओ और में तुम्हारे आत्मा के लिए विश्राम दूंगा. क्योंकि मेरा जुवा सरल है और मेरा बोझ हल्का है.”

उन्होंने हमें अनन्त विश्राम देने का वादा किया है जो  हमारे खुद के प्रयासों पर आधारित नहीं है बल्कि ये उनके अच्छाई के काम पर आधारित है जिसके परिणामस्वरूप उनकी मौत के बलि के माध्यम से हमें उद्धार मिला.

उन्होंने हमारे पापों को अपने कंधे पर उठाकर परमेश्वर के सजा को अपने आप पर ले लिया जिसके वजह से इश्वर के साथ हमारी सुलह होगई.

अंत में मैं आपको सिर्फ ये कहना चाहता हूँ के जैसे आप इस ब्लॉग को पढ़ें उसे एक खुला मन रख कर कीजिए और प्रार्थनापूर्वक सभी ईमानदारी और दिल की सच्चाई में इश्वर की खोजी करें. अगर मैंने कुछ बिंदुओं पर मेरी स्थिति से ज्यादा ही कह कर इस मामले को ज्यादा दूर तक लेगया तो कृपया मुझे माफ कर दीजिए. मैं जान बूझ कर किसी को अपमान करने के लिए कुछ नहीं कर सकता और मेरा उद्देश्य और लक्ष्य दूसरों को लाभ देना है ना की समाज के लिए हानि या उपद्रव बनना.

Ananda Marga Resources

Wednesday, January 4th, 2012

Four Spiritual Laws

 

 

Jesus Film

 

 

New Testament

 

 

Audio Bible

Lingayatism Resources

Wednesday, January 4th, 2012

Four Spiritual Laws

 

 

Jesus Film

 

 

New Testament

 

 

 

Audio Bible

Ananda Marga

Monday, January 2nd, 2012

Ananda Marga or Ananda Marga Pracaraka Samgha was founded by Shrii Prabhat Ranjan Sarkar as a social and spiritual movement.

In favor of this group they have made some progress in providing social services and relief under its neo humanistic values through education and PROUT or Progressive Utilization Theory yet there still remains some controversial matters to this sect such as the mythical legends which are attributed to the man Shrii Shrii Anandamurti who some claim was an accomplished yogi by age 4. He is also regarded by some of his followers as a miracle worker and mind reader. Furthermore P.R. Sarkar has been given the status as being god incarnate which is typical of admirers to give such exaggerated accreditation to their guru. Marga guru shrii shrii anandamurti may receive accolades as championing a cause in heralding social reform  but there have been many others who have also contributed to such philanthropic work without divine recognition.

Other questionable matters as related to this movement is its presentation as being  “scientific” with such unproven matters as the belief that the mind can be disturbed by consuming onions, garlic, leeks, chives, mushroom, etc. Also a person is said to achieve a sense of well being in practicing physical restraint by limiting sexual activity to four times a month.

However my greatest skepticism is whether or not this philosophy is able to fill the spiritual vacuum through its discipline of meditation along with its sixteen points and ten principles of morality known as yama and hiyama. For those of you who are not succeeding in becoming “realized” as attaining to the “path of bliss” and are weary of this arduous spiritual journey I would encourage you that there is another who can help shoulder your spiritual burden.

 

Mt 11:28-30

28 “Come to me, all you who are weary and burdened, and I will give you rest. 29 Take my yoke upon you and learn from me, for I am gentle and humble in heart, and you will find rest for your souls. 30 For my yoke is easy and my burden is light.”

 

Maybe you are a sadhaka who is practicing sadhana and you are wondering if this is all there is or perhaps you have your doubts whether this is the real deal of finding ultimate reality in that you have not been able to satiate the hunger and thirst of your soul by filling the emptiness or void in your heart and yet there is one who is able to fully satisfy.

 

John 6:35

35 Then Jesus declared, “I am the bread of life. He who comes to me will never go hungry, and he who believes in me will never be thirsty.

 

In AMPS there is an attempt to strive towards personal and societal transformation and yet what do you do with your guilt when you are not able to live up to the rigorous expectations of living a moral life? This failure to achieve an ethical standard is typical/normal and yet I would like to encourage you that there is a solution but it can’t be obtained on your own merit or effort but it comes as a gift from God. This provision of grace has come through the person and work of Jesus who is able to literally transform and regenerate you by the removal of moral guilt and by changing your very nature in the way you think and act.

Moreover this whole experience of deliverance is effectively communicated by a biblical character whose name was Paul and he was considered a moral man by the standards of his society yet he lacked the dimension of righteousness which he yearned for in serving the Supreme Consciousness or God and therefore he found his liberation in the power of Jesus who set him free by allowing him to overcome his natural weakness. This is his entry on the matter as found in Romans 7:14-25.

 

14 We know that the law is spiritual; but I am unspiritual, sold as a slave to sin. 15 I do not understand what I do. For what I want to do I do not do, but what I hate I do. 16 And if I do what I do not want to do, I agree that the law is good. 17 As it is, it is no longer I myself who do it, but it is sin living in me. 18 I know that nothing good lives in me, that is, in my sinful nature. For I have the desire to do what is good, but I cannot carry it out. 19 For what I do is not the good I want to do; no, the evil I do not want to do—this I keep on doing. 20 Now if I do what I do not want to do, it is no longer I who do it, but it is sin living in me that does it.

21 So I find this law at work: When I want to do good, evil is right there with me. 22 For in my inner being I delight in God’s law; 23 but I see another law at work in the members of my body, waging war against the law of my mind and making me a prisoner of the law of sin at work within my members. 24 What a wretched man I am! Who will rescue me from this body of death? 25 Thanks be to God—through Jesus Christ our Lord! 

 

My friend perhaps you identity with Paul’s struggle to obtain moral excellence and yet the mission of Christ was to unite us to God through his life and death resulting in both positional and practical righteousness.

Jesus is the light of the world and He has come to release those who are bound in darkness not through some physical, emotional or spiritual exercise of Tantra but through the power of His own sacrificial life that was given for you.

 

John 8:12

12 When Jesus spoke again to the people, he said, “I am the light of the world. Whoever follows me will never walk in darkness, but will have the light of life.”

 

Maybe you are desirous to see the fulfillment of World Peace and yet one day this will be achieved when Jesus the Prince of Peace establishes his coming kingdom  on earth. However in the meanwhile we can experience the peace of God in how we live out our lives in the here and now as well as the hereafter.

 

John 14:27

 Peace I leave with you; my peace I give you. I do not give to you as the world gives. Do not let your hearts be troubled and do not be afraid.

 

Perhaps you are looking for an ultimate sense of love and Jesus is the personification of such love so much so that he gave His life for those who were considered his enemies. It is this kind of unconditional and altruistic love which a person can receive which in turn allows us to reciprocate the love of God in how we respond to the Lord and others.

 

Romans 5:8

8 But God demonstrates his own love for us in this: While we were still sinners, Christ died for us.

 

1 John 4:7-12

7 Dear friends, let us love one another, for love comes from God. Everyone who loves has been born of God and knows God. 8 Whoever does not love does not know God, because God is love. 9 This is how God showed his love among us: He sent his one and only Son into the world that we might live through him. 10 This is love: not that we loved God, but that he loved us and sent his Son as an atoning sacrifice for our sins. 11 Dear friends, since God so loved us, we also ought to love one another. 12 No one has ever seen God; but if we love one another, God lives in us and his love is made complete in us.

 

2 Timothy 1:7

7 For God did not give us a spirit of timidity, but a spirit of power, of love and of self-discipline.

 

In defense of Christianity it began as an eastern religion which to date is the largest intercontinental movement whereby millions of life’s have been changed  not only personally but they have also altered the global climate and landscape to such a degree that much of the humanitarian work that is going on worldwide is either a direct result or influence of Christian intervention which started such establishments or institutions as orphanages and hospitals. I am providing a link which has some testimonials of people whose lives has been touched through the Christian experience.

www.cbn.com/700club/features/Amazing/

Finally it was not my intent to offend anyone over the content of this post but I am presenting this case as one who cares for your spiritual well being. Moreover I don’t want to merely end this appeal by contrasting competing views but rather I would just encourage you to think outside of the box of Ananda Marga and I challenge you to simply pray to God in your own way and ask him to reveal to you the truth concerning Jesus.

In conclusion this isn’t just about another religion or philosophy but rather it is about a relationship that is “realized” in outliving any guru’s idealism. A relationship which can be simply appropriated through the love of God in Christ.

 

John 3:16

16 “For God so loved the world that he gave his one and only Son, that whoever believes in him shall not perish but have eternal life.

 

 

How to know God

Ananda Marga Resources

 

 

 

Religions of the world: a comprehensive encyclopedia of beliefs and practices/ J. Gordon Melton, Martin Baumann, editors; Todd M. Johnson, World Religious Statistics; Donald Wiebe, Introduction-2nd ed., Copyright 2010 by ABC-CLIO, LLC. Reproduced with permission of ABC-CLIO, Santa Barbara, CA.

“Reprinted by permission.  “(Nelson’s Illustrated Guide to Religions), James A. Beverley, 2009,Thomas Nelson Inc. Nashville, Tennessee.  All rights reserved.”