हरे कृष्ण या ‘कृष्ण चेतना के लिए अंतरास्ट्रीय समाज’ कहा जाने वाला धर्म या संप्रदाय एक आंदोलन है जो हिंदू सोच पर आधारित है. यह अपने विचारों के सभी पहलु में मौलिक नहीं है क्योंकि यह अपनि प्रभाव अपनी माँ धर्म से उधार लेती है. बेशक, अगर विशवास की बात करें तो दोनो में फरक है पर हरे कृष्ण का चेहरा स्पष्ट रूप से वैष्णव के संतान के रूप में पहचाना जा सकता है. इस उपासना का जन्म ईश्वरके अवधारणाको निजीकृत और लोकप्रिय बनाने के लिए हुआ जो इसके हिंदू समकक्ष से फरक है जहां देवी – देवताओं को अलग – थलग किया जाता है.
जब मैं डलास टेक्सास में रहता था तो हम सेहर के उस हिस्से में जाते थे जिसको डीप एल्लुम बुलाते थे और इस्कॉन के साथ ये मेरा पहला अनुभव था. मैं ग्रामीण कान्सास से होने के कारण इन गंजे, रंगीन और खुलेआम भावप्रदर्शक लोग जो ड्रम बजाकर जप और नृत्य कर रहे थे ये देख कर मुझे झटका लगा. उस समय मैं नहीं समझा था के इस सब का मतलब क्या है पर अब मुझे पता है कि यह उनके धार्मिक विचारधाराओं के लिए बहुत जरूरी है.
पूजा की यह लयबद्ध शैलीको धार्मिक गान के मंत्र जप की वजह से एक मुक्ति के रूपमें समझना चाहिए क्योंकी ये भगवान के नामको जादुई चीज से जोड़ती है और किसी तरह रहस्यमय और बुद्धिहीन तरीके से परमेश्वर के छुपे हुए ज्ञान देती है. इसका मतलब अकेले शब्दों में उस व्यक्ति की अज्ञानता को बदलने का जादू है जो उसे बोल रहे हैं. बेशक इस समीकरण में और अधिक चीजें हैं, लेकिन फिर भी यह एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है और उनके धार्मिक प्रथाओं के लिए एक आवश्यक घटक ये है के आदर्श के लिए इस मंत्र का जाप दिन में १०८ बार करते हैं और पूरा ध्यान केंद्रित करके अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए एक साधन के रूप में माला जप (माला) का प्रयोग करते हैं. यहां तक कि सड़क पर एक अजनबी कृष्ण के किसी भी ज्ञान के बिना इस मंत्र में शामिल होकर समझ से बाहरके शब्दों के जीवन को बदलने की शक्ति से लाभ ले सकता है.
यह सब लेकिन बहुत ही जादुई प्रकृतिका लगता है जिसके द्वारा एक व्यक्ति धार्मिक अभिव्यक्ति को संतुष्ट करने के लिए शब्द को नियंत्रण और प्रयोग करता है जैसे की बोल, शब्दों और वाक्यांशों को जोड़ना. ऐसा प्रतीत होता है कि अनंत बार दोहोराने के माध्यम से यह लगभग एक लय बन जाता है जैसे के एक कृत्रिम निद्रावस्था और कुछ समय बाद मुंह की बोली पूजा करने वाले की दिल की ईमानदारी के साथ संयुक्त नहीं रहती. हालांकि यह दावा किया जाता है कि इस प्रतिक्रिया को मन पर कृत्रिम रूप से लादा नहीं जाता पर मैं उलझन में हूँ क्योंकी जो मैं देखता हूँ वो सिर्फ एक थकाऊ और अंतहीन सम्बोधन प्रक्रिया है. तो उन व्यक्ति का क्या जिसके पास उनके सभी मानसिक या शारीरिक संकाय नहीं है और कृष्ण के इस भक्ति अनुष्ठान में शामिल नहीं होसकते और उनके बारे में क्या जो विकलांग हैं और ताली और नृत्य के द्वारा अपने पापों को दूर करने में सक्षम नहीं हैं? क्या इन असक्षम व्यक्तियों को उनके ही बुरा कर्म के उत्पाद के रूप में लिया जाता है और ये माना जाता है के उनको अपने ही भाग्य पर छोड़ देना चाहिए और अपने अगले सांसारिक कर्म या पुनर्जन्म के साथ उनको विशवास के इन धार्मिक अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण भागोंमें हिस्सा लेने का मौका मिलेगा?
यह मुझे एक और विवादास्पद स्थिति की तरफ लाता है की पूर्वी धर्मों के बीच सबसे आम कौनसा है और समसारा या पुनर्जन्म के विश्वास में कौन केंद्रीय सिद्धांत है जब की इसकी पुष्टि करने के लिए कोई वास्तविक सबूत नहीं है सिवाए व्यक्तिगत धोखा के या फिर ऐसे विचार रखने वालों के दिमाग पर राक्षसी प्रेरणा का प्रभाव भी हो सकता है.
विज्ञान ने दूसरों की गवाही के माध्यम से मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में अनुसंधान की शुरुआत की है उन अनुभवों को साबित करने के लिए और मृत्यु की वातावरण को नियंत्रण करना जो किसी अंतिम अवस्था के बीमार इंसान के क्षमता से बाहर की चीज है. मैंने मृत्यु के बाद के जीवन पर ब्लॉग में लिखा है जो मौतके नजदिक और नैदानिक मौत के अनुभव पर आधारित है और कुछ लोगों ने वापस आकर उनकी कहानियां सुनाई और इसको दुनिया भर में से रिपोर्ट किया गया जो बाइबलके मृत्युके बाद के जीवनके अवधारणा से मिलती है नाकि वापस घूमने के लिए दूसरे शरीर में पुनर्जन्म से.
jesusandjews.com/wordpress/2009/10/29/is-hell-real/
मुझे लगता है कि इस स्थिति के खिलाफ प्रमुख दार्शनिक तर्क ये है की कैसे एक व्यक्ति को परिवर्तन किया जा सकता है जब के पिछले जीवन के पापों से वो अनभिज्ञ है? इसके अलावा आपको कैसे पता चलेगा के आपने उस चक्र से निकलने के लिए पर्याप्त कर लिया है और क्योंकि आप के पास इस बात का आत्मविश्वास नहीं होगा के इस आध्यात्मिक विमान पर आप कहाँ से आए और कहाँ जा रहे हैं ये बस आपको जीवन में डर और धोखा या फिर जीने के नाश्वाद सोच के पास लेजाएगा.
इसके अलावा अगर आत्मा के अनन्तता में विशवास की बात करें जो कारण के अनुभवजन्य साक्ष्य विचार के साथ संघर्ष करता है, इस प्रक्रिया को कैसे शुरू किया जा सकता है क्योंकी इसे समय की सुरुवात की आवश्यकता होगी बनाम कालातीत समारोह की और उसे सुरुवात कैसे करेंगे क्योंकि ब्रह्मांड के मूल के लौकिक अस्तित्व तो है जैसेकी दूरबीनों और हिसाब के यंत्रों के माध्यम से देखा गया है?
वैसे भी आगे बढ़ने पर मैं उनके ईश्वरके विषय में विरोधाभासी धारणा पर चर्चा करना चाहूँगा जो एकतरफ एकेश्वरवाद होने का दावा करते हैं और दूसरी और अद्वैतवाद के विचारों को बनाए रखते हैं. संक्षेप में वो खुदको या फिर मुक्ति पाने वाले को अपने मुख्य देवता से अलग एक अलग इकाई के रूपमें नहीं देखते और एक बार कोई व्यक्ति अगर इस आध्यात्मिक स्थिति में पहुँच जाए तो वो फिर से देवत्व की एकता में वापस अवशोषित हो जाते या मिलजाते हैं. फिर भी मैं इस बात का यकीन नहीं लगा पा रहा हूँ कि शुरूमें कैसे इश्वरको सबसे पहले विभाज्य किया गया?
विडंबना यह है के पवित्र अनुग्रही भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद का कहना है कि अगर कोई भगवान होने का दावा करता है तो वो व्यक्ति एक कुत्ता है और अनिवार्य रूप से इस बात की पुष्टि यही सिद्धांत करता है. यदि यह मामला है तो देवता के उन अवतारों का क्या जो श्री चैतन्य महाप्रभु के व्यक्ति में प्रतिनिधित्व करते हैं?
इस आंदोलन के लिए एक और संघर्ष की बात उनके नैतिक विशेषताएँ हैं जो उनके और खुद के सराहनीय घटक हैं फिर भी उनके अपने नेताओं और लगावकर्ताओं में कमी है और ये उनके बचावके संदेश के आवश्यक प्रकृति के विपरीत है.
ये आंदोलन विवाद में डूबा हुआ है और ६० और ७० की उमंग का समय के विपरीत वहाँ कम दृश्यता है जो किसी समय अपनी प्रसिद्धि के लिए दावा कर रहा था. इन अपवित्र खुलासों में से कुछ तो तब हुआ जब उनके प्रतिष्ठित गुरु प्रभुपाद की मृत्यु हुई. बिलकुल इसी समय पर नेतृत्व के घोटालों की बात बाहर आई क्योंकि वहाँ आंतरिक शक्तिके लिए कई नेताओं के इस्तीफे की वजह से बहुत से नेताओं पर कर की चोरी, अफीम का व्यापार और हत्या जैसे अभियोग लगाए गए. विडंबना यह है कि इन लोगों को सांसारिक संलग्नक ना बनके पवित्रता की अग्रणी जीवन जिनी थी पर ये मुख्य फसल ही सडे हुए सेब से भरे हुए निकले.
इसके अलावा इस पूरे दौर के लिए सबसे अधिक आश्चर्य की बात और परेशान पहलू यह है कि उनके मुख्य देवता कृष्ण नशा और व्यभिचार जैसे पाप का आनंद में भाग ले सकते हैं पर उनके भक्तों को इन सब में सामिल होने से बचना है जो उनके भविष्य के विपरीत बात है. में जैसा कहूँ वैसा करो पर मैं जैसा करूं वैसा मत करो ऐसा कहना तो बिलकुल गलत बात हुआ. भक्तों को इन चीजों से (भक्ति) के माध्यम से अलग रहना है और एक बार मुक्ति प्राप्त होने के बाद ये सब करना जरूरी नहीं है क्योंकि आप ईश्वरत्व की तरफ लौट गए फिर भी ये सब कुछ अजीब मोड़ की तरह लगता है जो तर्क बेतुका है जो सबसे अच्छे रूप में विरोधाभासी और बेतुके लगते हैं और सब से बुरे रूप में यह एक झूठ है जो कई कीमती लोगों की आत्माओं को नाश कर चुका है जो लोग अपने नाम और परिवारको समेत त्याग कर धोखे के जाल में पद गए.
अंत में हरे कृष्ण आंदोलन अन्य विभिन्न भारतीय धार्मिक समूहों की तरह धार्मिक अभिव्यक्ति के लिए एकल भावनाको निर्वासित करते हैं . फिर भी व्यावहारिक बात करें तो उन्होंने विभिन्न धार्मिक विचारों के समूह की तुलना में अपने विश्वासों में एक अद्वितीय अभिव्यक्ति के रूप में विशिष्टता बनाए रखा है. फिर भी ईश्वरको अल्लाह, जेहोवा, बुद्ध आदि के रूप में चित्रण करना उनके लिए विरोधात्मक प्रकृति है और अगर आप दुनिया के अन्य विविध धर्मों का अध्ययन करेंगे तो आप को पता चलेगा के उनके धर्मशास्त्रके अपने ही सिद्धांत एक दूसरे से असंगत हैं.
अन्त में हरे कृष्ण आंदोलन के भक्तों द्वारा यीशुको कृष्ण के बेटे के रूप में माना जाता है और मैं आप के साथ यीशु के कहे शब्दोंको उनके चेलों से जैसे लिया गया वैसे ही कहता हूँ.
शुरू करने के लिए यीशुने कभी नहीं देखा कि मानव जाति इश्वर के हस्तक्षेप बिना केवल खुद के लिए नैतिक पूर्णताको प्राप्त करने में सक्षम और आत्मनिर्भर था. हम मैथ्यू १९ में अमीर जवान आदमी की बाइबलिय गवाह में इसका एक उदहारण देखते हैं जो सारांश में अपने व्यवहार में किसी औसत पवित्र आदमी से ज्यादा नैतिक था जिसने यीशु को भी भावुक कर दिया फिर भी अपने धन की वजह से वो परीक्षण में विफल रहा जिसके वजह से उनके चेलों ने ये सवाल किया के कैसे किसी को बचाया जाना संभव है और यीशु का उत्तर था के इंसान के लिए ये असंभव है पर परमेश्वर के लिए तो सब कुछ संभव है.
वो अमीर जवान आदमी शायद आत्मविश्वास की भावना के साथ यीशुके निकट गया होगा बिलकुल उसी तरह जैसे हम दूसरों के साथ हमारे कार्यों की तुलना करने पर महसूस करते हैं और शायद हम यीशु के दिन की धार्मिक कट्टरपंथियों की तरह बन जाते हैं जो इश्वर के सामने प्रार्थना में अपने धर्म के कामों के सभी पूर्वाभ्यास करते थे पर कभी अपनी नाकामी और पापों का एहसास नहीं करते थे और फिर भी एक तुच्छ और समाजसे निर्वासित कर उठानेवाला जो अपनी विनम्रता में दया के लिए रोया और इश्वर से उसे बचाने के लिए चिल्लाया और उस दिन वही था जिसे उचित ठहराया गया,लुका १८.
यीशु हमें आजाद कराने और हमें हमारे पापों की क्षमा देने और इश्वर के साथ हमारा एक उचित रिश्ता बनाने के लिए आए (मती ०१:२१) और उन्होंने हमें फिर से पैदा किया है जो पुनर्जन्म के साथ भ्रमित होनेकी वजह नहीं है पर ये हमारी आंतरिक प्रकृतिको बदलने की बात करता है नाकि शारीरिक एवं बाहरी आणविक संरचना के पुनर्गठन जो पुनर्जन्म से सम्बंधित है. एक दिल का बदलाव है और दूसरा केवल शरीर के भागों को बदलने के लिए है, ३ जॉन.
वो प्रार्थना जो यीशुने मैथ्यू ६:५-८ में कहते हैं 5 “जब तुम प्रार्थना करो तो कपटियों की तरह मत करो. क्योंकि वो यहूदी प्रार्थना-सभाओं और गली के नुक्कडों पर खड़े होकर प्रार्थना करना चाहते हैं ताकि लोग उन्हें देख सकें. मैं तुमसे सत्य कहता हूँ के उन्हें तो उसका फल पहले ही मिल चूका है. किन्तु जब तू प्रार्थना करे, अपनी कोठरी में चला जा और द्वार बंद करके गुप्त रूप से अपने परम-पिता से प्रार्थना कर. फिर तेरा परम-पिता जो तेरे छिपकर किए गए कर्मों को देखता है, तुझे उनका प्रतिफल देगा. जब तुम प्रार्थना करते हो वो तो विधर्मियों की तरह यूँ ही निरार्थक बातों को बार – बार मत दुहराते रहो. वे तो यह सोचते हैं की उनके बहुत बोलने से उनकी सुनले जाएगी. इसलिए उनके जैसे मत बनो क्योंकि तुम्हारा परम पिता तुम्हारे मांगने से पहले ही जानता है के तुम्हारी आवश्यकता क्या है.”
मैथ्यू ११:२८-३० में यीशु कहते हैं “अरे ओ थके-मांदे, बोझ से दबे लोगों! मेरे पास आओ , मैं तुम्हे सुख चैन दूँगा. मेरा जुवा लो और उसे अपने ऊपर संभालो. फिर मुझसे सीखो क्योंकि मैं सरल हूँ और मेरा मन कोमल है. तुम्हे भी अपने लिए सुख-चैन मिलेगा. क्योंकि वह जुवा जो मैं तुम्हे देरहा हूँ बहुत सरल है. और वह बोझ जो मैं तुम पर डाल रहा हूँ, हल्का है. ”
उन्होंने यूहन्ना ८:३६ में यह भी बताया है “जो इसने कहा है उसका अर्थ क्या है? की तुम मुझे ढूंढोगे पर मुझे पाओगे नहीं. और जहां मैं होऊंगा वहाँ तुम नहीं आ सकते. ”
मुझे पता है कि मैंने अपनी लेख में कई चुनौतीपूर्ण और कठोर बातें कहा है और मेरी इच्छा किसी को जानबूझकर अपमान करने का नहीं है. फिर भी मेरी प्राथमिक विवाद संस्था के साथ है हालांकि मैं जानता हूँ कि संस्था व्यक्तिगत है और यह लोगों द्वारा प्रबंधित किया जाता है. मुझे लगता है इस नजरिए से कह सकते हैं कि मेरी बातों को अवैयक्तिक शून्य के रूप में लिया नहीं जा सकता है और ये बस प्रबंधकीय स्थिति से ही नहीं बल्की हरेक उन अभ्यासकर्ताओं जो इन सब को पवित्र मानते हैं उनके नजर से महत्वपूर्ण और शत्रुतापूर्ण लगता है. मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ के मेरा इरादा परोपकारी है और मैं सिर्फ ये पूछ रहा हूँ के आप शायद अपनी स्थिति का समीक्षा या पुनर्विचार करें वो भी व्यक्तिपरक अनुभव बनाम एक उद्देश्य दृष्टि से. अपने धार्मिक संस्कृति से परे होकर देखें और सच का पीछा करें और वो आपको जहां लेजाए वहाँ जाइए. यदि आप खुले विचार के हैं तो मैं मेरी धार्मिक नजरिया आपके साथ बांटना चाहूँगा और मैंने अपने विचार को आपके सामने पहुंचाने के लिए ब्लॉग में अन्य संबंधित लिंक भी शामिल किया है. इश्वर आपको आपके इस प्रयास में आशीर्वाद दें.
कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ?
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