तिब्बती बौद्ध धर्म

तिब्बती बौद्ध धर्म जिसको लामावाद भी कहा जाता है, ये महायाना बौद्ध धर्म, हिन्दुई वज्रयान जैसे कई सारे परम्पराओं के मिलने के वजह से बना है जिसमें आध्यात्मिक शक्ति हासिल करने के लिए तंत्र-मंत्र का प्रयोग जैसे गूढ़ प्रथाओं का प्रयोग भी किया गया है और इसमें शमनी बॉन धर्म भी सामिल है जिसका प्रभाव ईरान जैसे संस्कृति से लेकर भारत तक बौद्ध सोच के एक अद्वितीय अभिव्यक्ति के रूप में है जो थेरवाद नामक ज्यादातर सबसे प्रामाणिक और रूढ़िवादी बौद्ध सोच से बिलकुल अलग है | बौद्ध धर्म का ये रूप दार्शनिक अटकलों से ज्यादा अभ्यास और साकार करने पर ध्यान देता है और इसका प्रमुख उद्देश्य और लक्ष्य आत्मज्ञान के लिए एक फ़ास्ट ट्रैक देना है जिससे एक ही जीवन काल में निर्वाना प्राप्त किया जा सके |

इसके सच्चाई के दावों को समर्थन करने में एक कठिनाई ये है के एक संस्कृति के रूप में ये शिक्षा का मौखिक संचरण का समर्थन करता है, जिसमें जाहिर रूप से बहुत सारी कमियाँ हैं जैसे की समय के अंतराल में सूचना बदलने लगता है और खो जाता है या फिर इसको गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है जिसके वजह से मैं तो ये सोच रहा हूँ के इन वंश धारकों द्वारा पारित किए गए सूचना में से कितना प्रमाणिक या मूल है | इसके अलावा संचार का ये अभ्यास उनके अपने विश्वासों को सुशोभित और फिर से विकसित करने का कारण भी है जिसके वजह से एक नया धर्म भी जनम ले सकता है जो इसके वास्तविक रूप से अलग है | तो अगर प्राप्ति और साकार करने के लिए ये अभ्यास एक परम आवश्यकता है तो उनके विश्वासों को पहला श्रोत मानकर प्रबुद्ध प्राप्त करने का तो कोई निश्चितता ही नहीं है | अंतिम तौर से उनका भाव “टेलिफोन”के खेल से ज्यादा ज्ञानवर्धक नहीं है जिसमें सभी सदस्य अपनी कहानी एक दुसरे को सुनाते जाते हैं और अंतिम व्यक्ति तक बात जब पहुंचता है तो वो बिलकुल अलग हो जाता है |

एक और समस्या इस कारण से है के बहुत सारे लोगों ने गलत रूप से अपने आपको बहुत सारे धर्मों के गुरुओं को समर्पण कर दिया है जो इस आन्दोलन के साथ मिलता है क्योंकि वो कहते हैं के उनका दिया हुआ सन्देश पूरी तरह से सच है फिर भी जो बात सच है वो तो सिर्फ उनका छलपूर्ण व्यवहार है क्योंकि ऐसे बहुत सारे आध्यात्मिक गुरु बहाना बनाते हैं और झूठ बोलते हैं |

तो मैं इस प्रकार के भक्ति, सम्मान अथवा श्रद्धा की सीमा पर सवाल करता हूँ की आप कैसे अपने आपको दुसरे के लिए त्याग सकते हैं जहां पर कोई संरक्षण भी नहीं है और ये बात तो खतरनाक तरीके का भक्ति हुआ और ये सोचना के ये लोग आपको ईश्वर की तरह सुरक्षा या आशीर्वाद देने में सक्षम है ये तो उसके बराबर का ही धोका होगा |

 

मती १५:१४ : “उन्हें छोडो, वे तो अंधों के अंधे नेता हैं | यदि एक अंधा दुसरे अंधे को राह दिखाता है, तो वे दोनों ही गड्ढे में गिरते हैं |”

 

चोग्यम त्रुन्ग्पा रिन्पोचे जिनको आधुनिक समय का एक बहुत महत्वपूर्ण बौद्ध शिक्षक माना जाता है, उनके साथ जुड़े हुए शम्बाला नामक बौद्ध परम्परा में ऐसे कुछ पहले ही हो चुका है | इस शिक्षक की जगह बाद में उनके ही बड़े बेटे सक्योंग मिफाम रिन्पोचे ने लिया जिनका जन्म नाम ओसल रंग्द्रोल मुक्पो था और उनको सक्योंग और एक श्रद्धेय तिब्बती लामा मिफाम का पुनर्जन्म भी माना जाता है | इस आन्दोलन के पिछे का घोटाला रिन्पोचे और उसके धार्मिक वारिस (त्रुन्ग्पस वज्र रीजेंट) ओसल तेनजिन अथवा थॉमस रिच द्वारा दर्शाया गया अनैतिक व्यवहार है | ये सब कुकर्म पूरे अनैतिक रूप से और नियमनिष्ठा के विपरीत किया गया है जैसे की तेनजिन को एड्स हो गया था और उसने अपने यौन साथीओं को इसके बारे में नहीं बताया था | इसके अलावा उनके एक प्रसिद्ध शिष्य पेमा चोद्रों के मुताबिक़ वो शराब और सेक्स से जुड़े अपने जंगली ज्यादतियों के लिए भी जाना जाता था और उसने सारे नैतिक मापदंडों को भी खारिज कर दिया था और ये भी कहा गया है के उसको पागल आदमी भी माना जा सकता है, फिर भी वो अभी तक एक भक्त हैं और इस बात से ये मालुम होता है ये सिर्फ एक असंतुस्ट साझेदारका सिर्फ निराधार टिपण्णी नहीं है | विडम्बना ये है के कई लामाओं को घोटाले, भ्रष्टाचार और बुराई के विचार के साथ पहचाना गया है; ऐसे अपराध जिसमें इन व्यक्तियों को प्रकोपी बोधिसत्व के रूप में दर्शाया गया है और इन नैतिक खामिओं को गलत रूप से खारिज कर दिया गया है, हालांकि मेरा ये विश्वास है के इन कार्यों के असली रूप को बाइबल के सन्दर्भ में और बेहतर रूप से चित्रित किया जा सकता है | 

 

मती ७:१५-२०

झूठे भविष्यवक्ताओं से बचो ! वे तुम्हारे पास सरल भेड़ों के रूप में आते हैं किन्तु भीतर से वे खूंखार भेडिये होते हैं | तुम उन्हें उन के कर्मों के परिणामों से पहचानोगे | कोई कंटीली झाड़ी से न तो अंगूर इकट्ठे कर पाटा है और न ही गोखरू से अंजीर | ऐसे ही अच्छे पेड़ पर अच्छे फल लगते हैं किन्तु बुरे पेड़ पर तो बुरे फल ही लगते हैं | एक उत्तम वृक्ष बुरे फल नहीं उपजाता और न ही कोई बुरा पेड़ उत्तम फल पैदा कर सकता है | हर वह पेड़ जिस पर अच्छे फल नहीं लगते हैं, काट कर आग में झोंक दिया जाता है | इस्लिए मैं तुम लोगों से फिर दोहरा कर कहता हूँ की उन लोगों को तुम उनके कर्मों के परिणामों से पहचानोगे |

 

१ जॉन ४:०१

हे प्रिय मित्रों, हर आत्मा का विश्वास मत करो बल्कि सदा उन्हें परख कर देखो की वे, क्या परमात्मा के हैं? यह मैं तुमसे इसलिए कहा रहा हूँ क्योंकि बहुत से झूठे नबी संसार में फैले हुए हैं |

 

इसके अलावा जिसको दलाई लामा के रूप में माना जाता है और तथाकथित रूप से तिब्बती बौध परम्परा के मुताबिक़ तुल्कुस नामक एक वंशक्रम का पुनर्जन्म हैं, उनको करूणा का बोधिसत्व का प्रकटीकरण माना जाता है और जिसको राष्ट्रीय संरक्षक देवता अवलोकितेस्वर भी कहा जाता है | गेलुग या गेलुग-देहात जिसको पीले रंग के टोपी का सम्प्रदाय भी कहा जाता है, वहाँ पर दलाई लामा अभी भी एक महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक व्यक्ति हैं पर उन्होंने अब तो संन्यास ले लिया होगा पर इस बात को लेकर मैं निश्चित नहीं हूँ के कैसे एक महत्त्वपूर्ण और प्रसांगिक व्यक्ति अपने व्यक्तित्व और मिसन से दूर भाग सकता है | हालांकि उनको बहुत ज्यादा सम्मान किया जाता है पर एक व्यक्ति के रूप में उनकी सीमाएं हैं और मैंने पहले ही इस बारे में एक लेख लिखा है |

दलाई लामा

अब आगे बढ़ें तो कर्म के बारे में उनके विश्वासों में विसंगतियां हैं क्योंकि चीनी साम्यवाद के भ्रष्टाचार के तेहत तिब्बती भिक्षुओं और भिक्षुणीओं को उत्पीडन और साम्यवाद का सामना करना पडा जिससे दलाई लामा खुद भी प्रभावित थे | इसीलिए अगर आप इस तर्क पर विश्वास करते हैं तो फिर ये प्रश्न खडा होता है के वास्तव में इस जीवन में या फिर किसी और जीवन में ज्ञान प्राप्त करने का क्या कोई आशा है विशेष करके उन सारे धार्मिक रूप से समर्पित लोगों को देखने के बाद जिनका कर्म के नियम के तहत न्याय हुआ और ये बात तो उनको भी पता चल गया होगा के वो लोग पूरे समय एक टूटे हुए वाहन में सवार थे और उलटी दिशा में जा रहे थे | अगर निजी तौर पर मुझे कहना पड़े तो मैं ये कहूंगा के मेरे विचार में इस पूरे विचार को ही जारी नहीं रखा जा सकता है और भीतर की और विस्फोट होता है क्युंकी उनका खुद का सिस्टम अपने आप ही विनास हो गया है और इसके वजह से लोगों में सब कुछ भाग्य के ऊपर छोड़ देने का एक किसिम का विश्वास का जागरण हो गया और लोग अपने जीवन के सारे नतीजों को कारण और परिणाम या फिर जैसा बोया वैसा ही फल पाया कहके स्वीकार कर लेते हैं | दुसरे चेतनाशील प्राणीओं को मदत करना और दूसरों के दुःख में दया दिखाना भी तो दूसरों के ज्ञानोदय में अवरोध लाना हुआ क्योंकि कर्म के बल के नियम के हिसाब से तो उनको जीवन में दुःख और सजाय मिलना चाहिए पर उनको दया, करूणा और प्रेम से देखना तो इसके विपक्ष का बात है | अंतिम में कैसे एक इंसान उस बात के लिए जिम्मेदार हो सकता है जो उसने अनजाने में पिछले जनम या अस्तित्व में किया था? अंत में इस तरह के दर्शन के दुविधा के वजह से तिब्बती “लोकप्रिय धर्म” को प्रतिक्रियावादी प्रतिक्रिया के रूप में बताया गया है जो नैतिक करणीय या कर्म को हेरफेर या दरकिनार करता है और विभिन्न प्रकार के देवताओं को खुश करने के लिए विभिन्न प्रकार के कर्मकाण्ड करते हैं जो इस पद्धति के बाबजूद इस दार्शनिक विरोधाभास के लिए उपयुक्त साबित नहीं होता है |

वैसे भी इस प्रस्तुति में मैं मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में एक दूसरा विचार भी प्रस्तुत करना चाहता हूँ और ये मैं मौत के निकट के घटनाओं के जारी करना चाहता हूँ जो पुनर्जन्म के दर्शन को ही खंडन करता है क्योंकि बाइबल तो ये कहता है के मृत्यु के बाद एक इंसान को अनंत का न्याय मिलता है और वो कोई दुसरे जीवनकाल या फिर पापमोचन सम्बंधित अस्तित्व के किसी अस्थायी मध्यस्थ मंच में प्रवेश नहीं करते हैं | यहाँ पर मैं एक पूर्व नास्तिक का वीडियो सामेल कर रहा हूँ जिसका एक चिकित्सक के रूप में नैदानिक अनुभव ने संसार पर पुराने शास्त्रीय बौद्ध के स्थिति के अलावा एक दुसरे सच्चाई का भी सबूत दिया है |

क्या नर्क वास्तव में है?

इस आन्दोलन के साथ जुडी हुई अन्य कई विवाद ऐसे कई प्रथाओं और विश्वासों के आसपास घूमता है जो इस समूह के नेतृत्व से असंगत है और ये तो पारंपरिक बौद्ध सिद्धांत के विचारों के भी विपरीत है जिसका उदाहरण दलाई लामा का अपने अनुयायीयों को ज्योतिष और ब्रह्माण्ड विज्ञान के साथ जुड़े अंधविश्वास से बचने का सूचना है | यहाँ तक की स्वयं बुद्ध ने भी जादू से जुडी प्रथाओं को छोटी कला बताते हुए उनका निंदा कया था | इसके अलावा सिद्धार्थ गौतम ने कभी भी खुद को देवता या परमात्मा के रूप में नहीं माना और सबसे अच्छे रूप में वो भगवान् की अवधारणा से सम्बंधित अपने विचार में नास्तिक थे | इसके अलावा विचलन करने वाले तांत्रिक अनुष्ठानों के व्यवहार जैसे के प्रकोपी देवताओं को स्पस्ट यौन मुद्रा में कल्पना करने में बौद्ध धर्म के पौराणिक रूप के साथ सामंजस्य नहीं है |

जो बात इस धर्म को और ज्यादा पेंचीदा बनाती है वो है “लोकप्रिय धर्म” के साथ इसका एकीकरण और समन्वयता जो कभी कभी तो इसके साथ संगत रहता है पर ज्यादातर तो ये मान्यता विदेशी है | इस प्रकार से ये बात तो बिलकुल साफ़ है के तिब्बतिओं और शुद्ध बौद्ध सोच के बीच में कोई निरपेक्ष स्थिरता नहीं है क्योंकि इसमें बहुत सारी परिवर्तनीय चीजें हैं जो उनके विश्वास के साथ सामंजस्य तो रखता है पर इस सम्प्रदाय के सर्वोच्च नेतृत्व के साथ उसका संघर्ष है |

इन सभी बातों के साथ उनके कई सारे विश्वास क्षेत्रीय किंवदंतीओं, अंधविश्वासों और उनके तत्काल के संस्कृति के लोककथाओं के वजह से अँधेरे में है क्योंकि वो स्थानीय देवी देवताओं की पूजा करते हैं | उनके विभिन्न कहानिओं में उड़ने वाले भिक्षुओं और दंतकथाओं में शम्बाला का राज्य या फिर छुपे हुए घाटियाँ थे जिसको हिमालय के रहस्यमयी जगहों में सम्पर्कविहीन करके रखा गया था और इसमें ल्हासा के मन्दिरें भी सामेल थे जिसके बारेमें ये बताया गया था के वो जोवो शाक्यमुनी के छवि के सम्पर्क के द्वारा धन्य हो गए थे |

इस धार्मिक आन्दोलन का बुरा पक्ष ये है के वो विभिन्न तांत्रिक गतिविधिओं में सामिल थे जैसे के पेशनीगोई, अटकल और जादुई क्षमता पाने के लिए उर्जा का संकलन |

सारांश में ये सभी बातें शायद आपके आत्माको सता रहा होगा और हो सकता है के आपके मनमें विभिन्न प्रथाओं या अनुष्ठानों के वास्तविकता को लेकर संदेह भी हो के क्या ये सच में ये सब करके सच में ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं जिसमें निम्नलिखित विभिन्न मुश्किल कार्य सामिल हैं:

दीक्षा, श्रद्धा या पसर जाना, प्रसाद और दान, प्रार्थना, तंत्र या मंत्र, गायन, गूढ़ कल्पनाएँ, एकाग्रता और साँस लेने के व्यायाम, समारोहों, उत्सवों, वस्तुओं और अवशेष, मुद्राएं या हाथ इशारों का उपयोग, उनके देवताओं के चित्र और लौकिक के साथ मंडला, सूत्र पढ़ना, प्रार्थना के पहियों को घुमाना, प्रार्थना के झंडे, कैलाश पर्वत या फिर तसा री जैसे पवित्र स्थानों या फिर वस्तुओं और व्यक्तिओं की परिक्रमा करना, दीपक और धूप की पेशकश,  पशुओं की बलि, भारत और नेपाल में विभिन्न पवित्र स्थलों का भ्रमण करना और विभिन्न पवित्र शहरों, तीर्थ, मंदिरों, मठों, गुफाओं और पहाड़ों का दौरा करना आदि |, आदि |, आदि |

और ये कर्म और अर्जित योग्यता का सतत चक्र के प्राप्ति का कोई मानक नहीं है और ये तो इस बात पर सिमित है के एक इंसान को कभी ये पता नहीं रहता के निर्वाण प्राप्त करने के लिए उसने पर्याप्त किया है या फिर क्या इसे वो कभी पर्याप्त कर पाएगा | इस सब के बाद कैसा होगा अगर आप अपने जीवन के अंत तक पहुँचते हैं और प्रबुद्धता की प्राप्ति आपको टलते हुए दिखे और उसे पाने की सभी संभावनाएं अगर आपके पहुँच से दूर दिखाई दे? ऐसे अवस्था में क्या होगा अगर एक इंसान को लगे के उन्हें प्रबुद्धता हासिल हो गया है पर वास्तव में उनके साथ केवल धोका हुआ है या फिर उस इंसान का क्या होगा जिसको ये लगा था के वो अपने अंतिम गणतव्य पर पहुँच गया है लेकिन वास्तव में उसके आध्यात्मिक लक्ष्य तक पहुँचने में वो विफल हो गए हों? ये प्रणाली तो अंतिम में जाकर मृत्यु का आड़ लेकर लोगों को दबाता है क्योंकि ये इन्सानको कर्त्तव्य और भय के भावना के तहत अधिक भार देता है और ये दमनकारी व्यवस्था इन कीमती लोगों के जीवन पर निराधार दर्शन के साथ हावी है | पीछे मुड़कर देखें तो यह आध्यात्मिक वास्तविकता के जन्मजात या स्वयं स्पष्ट ज्ञान से निपटने का एक प्रणाली हो सकता है फिर भी सिर्फ लोगों के कल्पनाएँ और अटकलों के आधार पर खुद को अडकलबाजी का शिकार बन्ने देना सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य तो हो सकता है, लेकिन अंत में जाकर ये गलत और बेकार साबित हो सकता है | इसके अतिरिक्त आध्यात्मिक होना इस बात का गारंटी नहीं देता है के आप आत्मिक रूप से सक्षम हैं और इमानदार होने का ये मतलब नहीं है के आप इमानदारी से गलत नहीं हो सकते हैं और अनिवार्य रूप से कोई हमेशा सही भी तो नहीं हो सकता है |

समापन में मैं आपको चुनौती देना चाहता हूँ के आप विश्लेषात्मक ध्यान करते हुए अपना महत्त्वपूर्ण संदेह जारी रखें और तिब्बती बौद्ध शिक्षाओं के बारे में अपना पूछ ताछ जारी रखें और ये सब आपको अपने वर्तमान धार्मिक विश्वदृष्टी से अलग नए अवसरों और सम्भावनाओं के लिए खोलकर आपको पुरस्कृत कर सकता है | मैं आपको प्रोत्साहित करता हूँ के आप यहाँ तक खुला और तैयार रहिए के अपने अमान्य विश्वासों पर पुनर्विचार कीजिए और जान बूझकर हिम्मत करके गलत व्यवहार वाले किसी भी शंकालु आवेदन और अभिव्यक्ति को उनके व्यवस्थित शिक्षाओं और सिद्धांतों के साथ अस्वीकार कीजिए |

अंत में प्रतिक्रिया के रूप में मैं आशा की एक घोषणा करना चाहता हूँ और आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ के अध्यात्मिकता को बचाया जा सकता है क्योंकि येशु परम सत्य हैं और यदि आप उनमें आराम लेने के लिए तैयार हैं तो आपको अपने हृदय के खजाने के बारे में पता चलेगा जो पहले से छिपा हुआ था और आपको इसके बारे में पता नहीं था पर अब “रास्ता” के रूप में खुले तौर पर सबको इसके बारे में पता है |

 

मती: ११:२८-३० 

अरे, ओ थके-मांदे, बोझ से दबे लोगों! मेरे पास आओ, मैं तुम्हें सुख चैन दूंगा | मेरा जुवा लो और उसे अपने ऊपर संभालो | फिर मुझ से सीखो क्योंकि मैं सरल हूँ और मेरा मन कोमल है | तुम्हें भी अपने लिए सुख-चैन मिलेगा | क्योंकि वह जुआ जो मैं तुम्हें दे रहा हूँ बहुत सरल है | और वह बोझ जो मैं तुम पर डाल रहा हूँ, हल्का है |

 

ये सब इस कारण से भी मुमकिन हुआ है क्योंकि इसमें कोई सेंसरशिप नहीं है और परमेश्वर ने अपना सन्देश किसी स्थानीय हाशिये धर्म या कोई गुप्त समाज तक सीमित नहीं रखा, बल्की वो इन अद्भूत जातीय तिब्बतिओं सहित सभी जनजाति, जीभ और देश को प्यार करते हैं और गले लगाते हैं |

 

युहन्ना ३:१६

“परमेश्वर को जगत से इतना प्रेम था की उसने अपने एकमात्र पुत्र को दे दिया, ताकि हर वह आदमी जो उसमें विश्वास रखता है, नस्ट न हो जाए बल्कि उसे अनंत जीवन मिल जाये |”

 

अंत में येशु अंत तक पहुँचने के साधन हैं क्योंकि वो सभी लोगों को पाप और बुराई से मुक्त करते हैं और ये उनके प्रभावशाली काम के द्वारा पूरा होता है नाकि दूसरों के जैसा जिनका अपूर्ण प्रयास तो अपने खुद के ही प्रभावशाली काम के द्वारा ये सब हासिल करना होता है | यही अनंत काल से येशु का मंत्रालय था जैसा के उनका नाम बताता है के उनके जीवन का बोलावट ही दूसरों को परमात्मा के फैसले से बचाना था और इसके लिए उन्होंने अपने अवतार के माध्यम से बलि के बकरे की भूमिका निभाई और उन्होंने हमारे लिए मरके बलि मोचन के अंतिम कीमत का भुक्तान दे दिया जो एक आदर्श फिरौती था और उनके योग्यता के वजह से हमें अनंत जीवन मिल गया |

ये लेन – देन का अभ्यास प्रामाणिक पश्चाताप के माध्यम से होता है जिसके लिए हजारों अभ्यासित शब्दों की आवश्यकता नहीं है पर सच्चे दिल से किया हुआ सोच ही काफी है क्योंकि ऐसा कहा गया है के ‘जो कोई भी परमेश्वर के नाम को पुकारेगा उसे बचाया जाएगा |’

इसलिए मैं आशा करता हूँ के आप मेरे इस प्रस्ताव पर ध्यान देंगे की आप दीक्षा और अनुभव के सुरुवात के तेहत प्रार्थना के माध्यम से परमेश्वर से बात करेंगे और उन्हें कहेंगे के वो येशु को परम वास्तविकता और ज्ञान के पथ के रूप में आप के सामने प्रकट कर दें | आखिर में इस प्रकार के संवाद या विचार से दूर रहना उस गंभीर सोच से भी दूर रहना होगा जिससे आपने परोपकारी रूप से खुद को तर्क से निर्देशित होने के लिए समर्पित कर दिया है चाहे वो एक पूरा नया दिशा ही क्यों ना हो जिसमें आप गुरुओं, संस्कृति और समाजको अपने विश्वास और प्रथाओं को चलाने ना देकर ये काम सत्य को करने देते हैं |

इसके अलावा मैं ये प्रार्थना करता हूँ के इस नए प्रकाश को देखने और समझने के लिए आपका ध्यान केन्द्रित रहे और आप येशु को अपना प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में मानने के शान्ति में स्थायी रूप से रहें |

तो अगर संक्षिप्त में बताएं तो येशु ने ब्रह्माण्ड के निर्माता के रुप में सारी श्रिष्टी और सारे जीवन का उत्पत्ति किआ और सच्चाई के अवतार के रूप में वही सही पथ हैं और बल्कि एकमात्र “रास्ता” हैं | येशु ही “विश्व के प्रकाश” के रूप में रौशन और उज्जवल स्तम्भ हैं जो लोगों के दिल और मस्तिस्क में चमक रहे हैं जिनको वो मुक्त करते हैं और बदलते हैं | ये तो येशु के सम्पूर्ण पवित्रता के वजह से हुआ है जो उनके अनुयायीओं को हस्तांतरित किया गया है जो उनके लिए संपूर्ण तरिका से समर्पित हैं और उनके उद्धार कार्य पर विश्वास करते हैं और वो उनको उनके पापी प्रवृती के खामीओं से स्वतंत्रता देते हैं जिस पापके वजह से सभी लोगों ने पवित्र परमेश्वर का उल्लंघन किया है | अनिवार्य रूप से व्यक्तिगत योग्यता के आधार पर ये सब पूरा नहीं किया जा सकता है क्योंकि कोई भी कभी भी एकदम सही या बहुत अच्छा नहीं हो सकता है इसलिए अच्छा समाचार तो ये है के कानूनी रूप से उचित ये लेनदेन प्राप्तकर्ता को विशेष अनुग्रह के रूप में दिया गया है क्योंकि येशु पूरे दया और करूणा के साथ अपने भक्त को ये मुफ्त का उपहार देते हैं |

अब परमेश्वर के साथ इस रिश्ते के साथ साथ इंसान के जिंदगी में जीवन परिवर्तन करने वाला घटना भी आता है जिसमें अनुयायी को एक नया प्रकृति मिलता है जिसके वजह से वो अच्छा और पुण्य कर्म करने के लिए सक्षम होते हैं जो उनके विश्वास का प्रकटीकरण भी है | यह ज्ञान, हालांकि इसके बौद्ध धर्म के परिभाषा के साथ मेल नहीं खाता, विश्वास के साथ तुरंत आता है और पूरा होने के लिए पूरे या आंशिक जीवन का समय भी नहीं लेता है पर विश्वासी को तुरंत मिल सकता है | इसके अलावा इस वास्तविकता को परमेश्वर के आत्मा द्वारा सत्यापित किया जा सकता है जो हरेक इंसान के लिए व्यक्तिगत रूप से गवाह बनते हैं जिसको ये सन्देश मिलता है के वो वास्तव में सच्चे और जीवित परमेश्वर के संतान हैं |और परमेश्वर का ये संघ किसी प्रकार के ध्यान या फिर योग के वजह से नहीं मिलता है, बल्की मसीह के मध्यस्थता के वजह से मिलता है जिस्से हमें अनन्त जीवन का वादा भी मिलता है जिसके वजह से इंसान के मरने के बाद भी वो कब्र के बाद भी जीता है क्योंकि हमको किसी दुसरे आयाम में स्थानांतरित किया जाता है जो वर्तमान अंतरिक्ष के प्रतिबंधों से घिरा हुआ नहीं है, और ये वास्तविक है जिसको स्वर्गीय निवास भी कहा जाता है |

अंत में मेरे दोस्तों आप लोग भी मेरे साथ हो सकते हैं जहां आपको अपने आत्मा के धार्मिक तड़प को पूरा करने के लिए पूर्ण शान्ति, खुशी और प्यार का परिपूर्णता मिलेगा |

 

भजन ३४:८

चखो और समझो की यहोवा कितना भला है |

वह व्यक्ति जो यहोवा के भरोसे है

सचमुच प्रसन्न है | 

 

 

कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएं

jesusandjews.com/wordpress/2012/01/10/कैसे-भगवान-के-साथ-एक-रिश्त/

 

अन्य संबंधित लिंक

तिब्बती बौद्ध संसाधनें

हिंदी

Tibetan Buddhism

 

 

Encyclopedia of Religion Second Edition, copyright 2005 Thomson Gale a part of The Thomson Corporation, Lindsay Jones Editor in Chief, Vol.2, pgs.1150-1159, Matthew T. Kapstein

Encyclopedia of Religion Second Edition, copyright 2005 Thomson Gale a part of The Thomson Corporation, Lindsay Jones Editor in Chief, Vol.13, pgs.9181-9187, Per Kvaerne

Encyclopaedia Britannica,Inc., copyright 1993, Vol.11, pg.756-757, Tibetan Buddhism

AMG’s World Religions and Cults, AMG Publishers, Chattanooga, Tennessee

“Reprinted by permission.  “(Nelson’s Illustrated Guide to Religions), James A. Beverley, 2009,Thomas Nelson Inc. Nashville, Tennessee.  All rights reserved.”

One Response to “तिब्बती बौद्ध धर्म”

  1. bapu says:

    nice

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