Archive for the ‘Hare Krishna’ Category

A Hindus Vision from Jesus

Friday, October 16th, 2015


Normally I edit and summarize a persons testimony before posting it on my blog site however in this case they so beautifully articulated their point that I am leaving it in the form that it was sent. Anyway I received this email from an Indian lady who comes from a Hindu background and her message can stand by itself as it summarizes the importance of spoken Truth as found in the Biblical text. As you read her letter I hope you find it inspirational and I encourage you likewise to read the Bible beginning with the New Testament. Moreover I have written a couple of articles in dealing with the credibility of the Scripture from the standpoints of literature and archaeology which I believe offers ample evidence to its historicity.

Is the Bible Reliable?
Does Archaeology disprove the bible?


Jesus paid me a visit when I was sixteen or seventeen. It was before
my world started to fall apart. And I wasn’t dreaming. I wasn’t even
sleepy. It was mid day and holidays and I was studying. It was almost
a decade ago so the details are fuzzy but I remember the odd light in
the room. You see my room faces a high rise and as such I do not get
much light through the window. It is a custom in these parts to not
turn on the lights during day time. As a result we have to do with
what little light that remains.

If I were sleepy or asleep I could have accredited the vision to the
Bible that was gifted in our school about a year ago and about which I
had completely forgot. But I wasn’t afforded the luxury. I didn’t see
Jesus. I saw the light and I saw the shadow of the cross in the light
and I heard a clear voice telling me to open the Bible. It was spooky.
I spent the next six hours searching for the paperback New Testament.

You may ask how could things plummet after that. I was a Hindu then,
heart and soul. Hindus have a strange way of assimilating all
religious deities into their faith. At that point of time I took the
Bible and the teaching in that light. It was just one other God. I
read the gospels then I went back to my old life. I had my Gods. They
were the Gods I had grown up knowing and they were the Gods who were easier to please, a gift, a flower offering and they would fulfill a
wish. They didn’t require me to submit my entire soul and it was
easier that way.

I loved a boy then. Not really a boy, a man. I wanted to be his wife
and I prayed to my Gods. I bargained with everything I had till I had
nothing left. I lost my virginity to the man. I thought that was a big
deal. Guess what. That was the beginning. When the man asked me to
have group sex with his friends I knew that was wrong. I couldn’t
stoop that low. I started hating my Gods for not making me stop to get
so low. I couldn’t face my Gods anymore.

Then I met a guy online who was a follower of ISKCON movement. You may or may not have heard of it. It is an offshoot of Hinduism that
believes in cleansing of the self through constant penance. I
submerged myself in it trying to clean my heart, my body and my soul.
They had a different interpretation of Bhagvad Gita. I read it. I read
it twice. In every line I read I found the Bible. The words I had read
so long ago came back to me again and again till I knew what path I
had to take. I left my Gita and picked up a Bible. I am trying to find
my way back to Jesus ever since.

Perhaps He orchestrated the entire thing, cleansing me of the
dependence I had on my Gods and replacing them with my dependence on Him. I know my story is crazy. I told this to one other person and he stopped talking to me after that. You don’t have to believe me. Just believe in Him. And yes He has a strange way to firm your faith.

Yours truthfully,

How to know God
Hindu Resources
English Articles on Hinduism
Hare Krishna
Hare Krishna Resources

Photo provided by:
“Andi Berger/”

हरे कृष्ण संसाधन 

Saturday, December 31st, 2011

हरे कृष्ण मसीह में आने की गवाही


ऑडियो संसाधन


लिखित बाइबल


“यीशु की फिल्म”


देवताओं मुक्ति डाटा की “चार आध्यात्मिक कानून” योजना

हरे कृष्ण

Sunday, December 25th, 2011

हरे कृष्ण या ‘कृष्ण चेतना के लिए अंतरास्ट्रीय समाज’ कहा जाने वाला धर्म या संप्रदाय एक आंदोलन है जो हिंदू सोच पर आधारित है. यह अपने विचारों के सभी पहलु में मौलिक नहीं है क्योंकि यह अपनि प्रभाव अपनी माँ धर्म से उधार लेती है. बेशक, अगर विशवास की बात करें तो दोनो में फरक है पर हरे कृष्ण का चेहरा स्पष्ट रूप से वैष्णव के संतान के रूप में पहचाना जा सकता है. इस उपासना का जन्म ईश्वरके अवधारणाको निजीकृत और लोकप्रिय बनाने के लिए हुआ जो इसके हिंदू समकक्ष से फरक है जहां देवी – देवताओं को अलग – थलग किया जाता है.

जब मैं डलास टेक्सास में रहता था तो हम सेहर के उस हिस्से में जाते थे जिसको डीप एल्लुम बुलाते थे और इस्कॉन के साथ ये मेरा पहला अनुभव था. मैं ग्रामीण कान्सास से होने के कारण इन गंजे, रंगीन और खुलेआम भावप्रदर्शक लोग जो ड्रम बजाकर जप और नृत्य कर रहे थे ये देख कर मुझे झटका लगा. उस समय मैं नहीं समझा था के इस सब का मतलब क्या है पर अब मुझे पता है कि यह उनके धार्मिक विचारधाराओं के लिए बहुत जरूरी है.

पूजा की यह लयबद्ध शैलीको धार्मिक गान के मंत्र जप की वजह से एक मुक्ति के रूपमें समझना चाहिए क्योंकी ये भगवान के नामको जादुई चीज से जोड़ती है और किसी तरह रहस्यमय और बुद्धिहीन तरीके से परमेश्वर के छुपे हुए ज्ञान देती है. इसका मतलब अकेले शब्दों में उस व्यक्ति की अज्ञानता को बदलने का जादू है जो उसे बोल रहे हैं. बेशक इस समीकरण में और अधिक चीजें हैं, लेकिन फिर भी यह एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है और उनके धार्मिक प्रथाओं के लिए एक आवश्यक घटक ये है के आदर्श के लिए इस मंत्र का जाप दिन में १०८ बार करते हैं और पूरा ध्यान केंद्रित करके अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए एक साधन के रूप में माला जप (माला) का प्रयोग करते हैं. यहां तक कि सड़क पर एक अजनबी कृष्ण के किसी भी ज्ञान के बिना इस मंत्र में शामिल होकर समझ से बाहरके शब्दों के जीवन को बदलने की शक्ति से लाभ ले सकता है.

यह सब लेकिन बहुत ही जादुई प्रकृतिका लगता है जिसके द्वारा एक व्यक्ति धार्मिक अभिव्यक्ति को संतुष्ट करने के लिए शब्द को नियंत्रण और प्रयोग करता है जैसे की बोल, शब्दों और वाक्यांशों को जोड़ना. ऐसा प्रतीत होता है कि अनंत बार दोहोराने के माध्यम से यह लगभग एक लय बन जाता है जैसे के एक कृत्रिम निद्रावस्था और कुछ समय बाद मुंह की बोली पूजा करने वाले की दिल की ईमानदारी के साथ संयुक्त नहीं रहती. हालांकि यह दावा किया जाता है कि इस प्रतिक्रिया को मन पर कृत्रिम रूप से लादा नहीं जाता पर मैं उलझन में हूँ क्योंकी जो मैं देखता हूँ वो सिर्फ एक थकाऊ और अंतहीन सम्बोधन प्रक्रिया है. तो उन व्यक्ति का क्या जिसके पास उनके सभी मानसिक या शारीरिक संकाय नहीं है और कृष्ण के इस भक्ति अनुष्ठान में शामिल नहीं होसकते और उनके बारे में क्या जो विकलांग हैं और ताली और नृत्य के द्वारा अपने पापों को दूर करने में सक्षम नहीं हैं? क्या इन असक्षम व्यक्तियों को उनके ही बुरा कर्म के उत्पाद के रूप में लिया जाता है और ये माना जाता है के उनको अपने ही भाग्य पर छोड़ देना चाहिए और अपने अगले सांसारिक कर्म या पुनर्जन्म के साथ उनको विशवास के इन धार्मिक अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण भागोंमें हिस्सा लेने का मौका मिलेगा?

यह मुझे एक और विवादास्पद स्थिति की तरफ लाता है की पूर्वी धर्मों के बीच सबसे आम कौनसा है और समसारा या पुनर्जन्म के विश्वास में कौन केंद्रीय सिद्धांत है जब की इसकी पुष्टि करने के लिए कोई वास्तविक सबूत नहीं है सिवाए व्यक्तिगत धोखा के या फिर ऐसे विचार रखने वालों के दिमाग पर राक्षसी प्रेरणा का प्रभाव भी हो सकता है.

विज्ञान ने दूसरों की गवाही के माध्यम से मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में अनुसंधान की शुरुआत की है उन अनुभवों को साबित करने के लिए और मृत्यु की वातावरण को नियंत्रण करना जो किसी अंतिम अवस्था के बीमार इंसान के क्षमता से बाहर की चीज है. मैंने मृत्यु के बाद के जीवन पर  ब्लॉग में लिखा है जो मौतके नजदिक और नैदानिक मौत के अनुभव पर आधारित है और कुछ लोगों ने वापस आकर उनकी कहानियां सुनाई और इसको दुनिया भर में से रिपोर्ट किया गया जो बाइबलके मृत्युके बाद के जीवनके अवधारणा से मिलती है नाकि वापस घूमने के लिए दूसरे शरीर में पुनर्जन्म से.

क्या नर्क वास्तव में है?

मुझे लगता है कि इस स्थिति के खिलाफ प्रमुख दार्शनिक तर्क ये है की कैसे एक व्यक्ति को  परिवर्तन किया जा सकता है जब के पिछले जीवन के पापों से वो अनभिज्ञ है? इसके अलावा आपको कैसे पता चलेगा के आपने उस चक्र से निकलने के लिए पर्याप्त कर लिया है और क्योंकि आप के पास इस बात का आत्मविश्वास नहीं होगा के इस आध्यात्मिक विमान पर आप कहाँ से आए और कहाँ जा रहे हैं ये बस आपको जीवन में डर और धोखा या फिर जीने के नाश्वाद सोच के पास लेजाएगा.

इसके अलावा अगर आत्मा के अनन्तता में विशवास की बात करें जो कारण के अनुभवजन्य साक्ष्य विचार के साथ संघर्ष करता है, इस प्रक्रिया को कैसे शुरू किया जा सकता है क्योंकी इसे समय की सुरुवात की आवश्यकता होगी बनाम कालातीत समारोह की और उसे सुरुवात कैसे करेंगे क्योंकि ब्रह्मांड के मूल के लौकिक अस्तित्व तो है जैसेकी दूरबीनों और हिसाब के यंत्रों  के माध्यम से देखा गया है?

वैसे भी आगे बढ़ने पर मैं उनके ईश्वरके विषय में विरोधाभासी धारणा पर चर्चा करना चाहूँगा जो एकतरफ एकेश्वरवाद होने का दावा करते हैं और दूसरी और अद्वैतवाद के विचारों को बनाए रखते हैं. संक्षेप में वो खुदको या फिर मुक्ति पाने वाले को अपने मुख्य देवता से अलग एक अलग इकाई के रूपमें नहीं देखते और एक बार कोई व्यक्ति अगर इस आध्यात्मिक स्थिति में पहुँच जाए तो वो फिर से देवत्व की एकता में वापस अवशोषित हो जाते या मिलजाते हैं. फिर भी मैं इस बात का यकीन नहीं लगा पा रहा हूँ कि शुरूमें कैसे इश्वरको सबसे पहले विभाज्य किया गया?

विडंबना यह है के पवित्र अनुग्रही भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद का कहना है कि अगर कोई भगवान होने का दावा करता है तो वो व्यक्ति एक कुत्ता है और अनिवार्य रूप से इस बात की पुष्टि यही सिद्धांत करता है. यदि यह मामला है तो देवता के उन अवतारों का क्या जो श्री चैतन्य महाप्रभु के व्यक्ति में प्रतिनिधित्व करते हैं?

इस आंदोलन के लिए एक और संघर्ष की बात उनके नैतिक विशेषताएँ हैं जो उनके और खुद के सराहनीय घटक हैं फिर भी उनके अपने नेताओं और लगावकर्ताओं में कमी है और ये उनके बचावके संदेश के आवश्यक प्रकृति के विपरीत है.

ये आंदोलन विवाद में डूबा हुआ है और ६० और ७० की उमंग का समय के विपरीत वहाँ कम दृश्यता है जो किसी समय अपनी प्रसिद्धि के लिए दावा कर रहा था. इन अपवित्र खुलासों में से कुछ तो तब हुआ जब उनके प्रतिष्ठित गुरु प्रभुपाद की मृत्यु हुई. बिलकुल इसी समय पर नेतृत्व के घोटालों की बात बाहर आई क्योंकि वहाँ आंतरिक शक्तिके लिए कई नेताओं के इस्तीफे की वजह से बहुत से नेताओं पर कर की चोरी, अफीम का व्यापार और हत्या जैसे अभियोग लगाए गए. विडंबना यह है कि इन लोगों को सांसारिक संलग्नक ना बनके पवित्रता की अग्रणी जीवन जिनी थी पर ये मुख्य फसल ही सडे हुए सेब से भरे हुए निकले.

इसके अलावा इस पूरे दौर के लिए सबसे अधिक आश्चर्य की बात और परेशान पहलू यह है कि उनके मुख्य देवता कृष्ण नशा और व्यभिचार जैसे पाप का आनंद में भाग ले सकते हैं पर उनके भक्तों को इन सब में सामिल होने से बचना है जो उनके भविष्य के विपरीत बात है. में जैसा कहूँ वैसा करो पर मैं जैसा करूं वैसा मत करो ऐसा कहना तो बिलकुल गलत बात हुआ. भक्तों को इन चीजों से (भक्ति) के माध्यम से अलग रहना है और एक बार मुक्ति प्राप्त होने के बाद ये सब करना जरूरी नहीं है क्योंकि आप ईश्वरत्व की तरफ लौट गए फिर भी ये सब  कुछ अजीब मोड़ की तरह लगता है जो तर्क बेतुका है जो सबसे अच्छे रूप में विरोधाभासी और बेतुके लगते हैं और सब से बुरे रूप में यह एक झूठ है जो कई कीमती लोगों की आत्माओं को नाश कर चुका है जो लोग अपने नाम और परिवारको समेत त्याग कर धोखे के जाल में पद गए.

अंत में हरे कृष्ण आंदोलन अन्य विभिन्न भारतीय धार्मिक समूहों की तरह धार्मिक अभिव्यक्ति के लिए एकल भावनाको निर्वासित करते हैं . फिर भी व्यावहारिक बात करें तो उन्होंने विभिन्न धार्मिक विचारों के समूह की तुलना में अपने विश्वासों में एक अद्वितीय अभिव्यक्ति के रूप में विशिष्टता बनाए रखा है. फिर भी ईश्वरको अल्लाह, जेहोवा, बुद्ध आदि के रूप में चित्रण करना उनके लिए विरोधात्मक प्रकृति है और अगर आप दुनिया के अन्य विविध धर्मों का अध्ययन करेंगे तो आप को पता चलेगा के उनके धर्मशास्त्रके अपने  ही सिद्धांत एक दूसरे से असंगत हैं.

अन्त में हरे कृष्ण आंदोलन के भक्तों द्वारा यीशुको कृष्ण के बेटे के रूप में माना जाता है और मैं आप के साथ यीशु के कहे शब्दोंको उनके चेलों से जैसे लिया गया वैसे ही कहता हूँ.

शुरू करने के लिए यीशुने कभी नहीं देखा कि मानव जाति इश्वर के हस्तक्षेप बिना केवल खुद के लिए नैतिक पूर्णताको प्राप्त करने में सक्षम और आत्मनिर्भर था. हम मैथ्यू १९ में अमीर जवान आदमी की बाइबलिय गवाह में इसका एक उदहारण देखते हैं जो सारांश में अपने व्यवहार में किसी औसत पवित्र आदमी से ज्यादा नैतिक था जिसने यीशु को भी भावुक कर दिया फिर भी अपने धन की वजह से वो परीक्षण में विफल रहा जिसके वजह से उनके चेलों ने ये सवाल किया के कैसे किसी को बचाया जाना संभव है और यीशु का उत्तर था के इंसान के लिए ये असंभव है पर परमेश्वर के लिए तो सब कुछ संभव है.

वो अमीर जवान आदमी शायद आत्मविश्वास की भावना के साथ यीशुके निकट गया होगा बिलकुल उसी तरह जैसे हम दूसरों के साथ हमारे कार्यों की तुलना करने पर महसूस करते हैं और शायद हम यीशु के दिन की धार्मिक कट्टरपंथियों की तरह बन जाते हैं जो इश्वर के सामने प्रार्थना में अपने धर्म के कामों के सभी पूर्वाभ्यास करते थे पर कभी अपनी नाकामी और पापों का एहसास नहीं करते थे और फिर भी एक तुच्छ और समाजसे निर्वासित कर उठानेवाला जो अपनी विनम्रता में दया के लिए रोया और इश्वर से उसे बचाने के लिए चिल्लाया और उस दिन वही था जिसे उचित ठहराया गया,लुका १८.

यीशु हमें आजाद कराने और हमें हमारे पापों की क्षमा देने और इश्वर के साथ हमारा एक उचित रिश्ता बनाने के लिए आए (मती ०१:२१) और उन्होंने हमें फिर से पैदा किया है जो पुनर्जन्म के साथ भ्रमित होनेकी वजह नहीं है पर ये हमारी आंतरिक प्रकृतिको बदलने की बात करता है नाकि शारीरिक एवं बाहरी आणविक संरचना के पुनर्गठन जो पुनर्जन्म से सम्बंधित है. एक दिल का बदलाव है और दूसरा केवल शरीर के भागों को बदलने के लिए है, ३ जॉन.

वो प्रार्थना जो यीशुने मैथ्यू ६:५-८ में कहते हैं 5 “जब तुम प्रार्थना करो तो कपटियों की तरह मत करो. क्योंकि वो यहूदी प्रार्थना-सभाओं और गली के नुक्कडों पर खड़े होकर प्रार्थना करना चाहते हैं ताकि लोग उन्हें देख सकें. मैं तुमसे सत्य कहता हूँ के उन्हें तो उसका फल पहले ही मिल चूका है. किन्तु जब तू प्रार्थना करे, अपनी कोठरी में चला जा और द्वार बंद करके गुप्त रूप से अपने परम-पिता से प्रार्थना कर. फिर तेरा परम-पिता जो तेरे छिपकर किए गए कर्मों को देखता है, तुझे उनका प्रतिफल देगा. जब तुम प्रार्थना करते हो वो तो विधर्मियों की तरह यूँ ही निरार्थक बातों को बार – बार मत दुहराते रहो. वे तो यह सोचते हैं की उनके बहुत बोलने से उनकी सुनले जाएगी. इसलिए उनके जैसे मत बनो क्योंकि तुम्हारा परम पिता तुम्हारे मांगने से पहले ही जानता है के तुम्हारी आवश्यकता क्या है.”

मैथ्यू ११:२८-३० में यीशु कहते हैं “अरे ओ थके-मांदे, बोझ से दबे लोगों! मेरे पास आओ , मैं तुम्हे सुख चैन दूँगा. मेरा जुवा लो और उसे अपने ऊपर संभालो. फिर मुझसे सीखो क्योंकि मैं सरल हूँ और मेरा मन कोमल है. तुम्हे भी अपने लिए सुख-चैन मिलेगा. क्योंकि वह जुवा जो मैं तुम्हे देरहा हूँ बहुत सरल है. और वह बोझ जो मैं तुम पर डाल रहा हूँ, हल्का है. ”

उन्होंने यूहन्ना ८:३६ में यह भी बताया है “जो इसने कहा है उसका अर्थ क्या है? की तुम मुझे ढूंढोगे पर मुझे पाओगे नहीं. और जहां मैं होऊंगा वहाँ तुम नहीं आ सकते. ”

मुझे पता है कि मैंने अपनी लेख में कई चुनौतीपूर्ण और कठोर बातें कहा है और मेरी इच्छा किसी को जानबूझकर अपमान करने का नहीं है. फिर भी मेरी प्राथमिक विवाद संस्था के साथ है हालांकि मैं जानता हूँ कि संस्था व्यक्तिगत है और यह लोगों द्वारा प्रबंधित किया जाता है. मुझे लगता है इस नजरिए से कह सकते हैं कि मेरी बातों को अवैयक्तिक शून्य के रूप में लिया नहीं जा सकता है और ये बस प्रबंधकीय स्थिति से ही नहीं बल्की हरेक उन अभ्यासकर्ताओं जो इन सब को पवित्र मानते हैं उनके नजर से महत्वपूर्ण और शत्रुतापूर्ण लगता है. मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ के मेरा इरादा परोपकारी है और मैं सिर्फ ये पूछ रहा हूँ के आप शायद अपनी स्थिति का समीक्षा या पुनर्विचार करें वो भी व्यक्तिपरक अनुभव बनाम एक उद्देश्य दृष्टि से. अपने धार्मिक संस्कृति से परे होकर देखें और सच का पीछा करें और वो आपको जहां लेजाए वहाँ जाइए. यदि आप खुले विचार के हैं तो मैं मेरी धार्मिक नजरिया आपके साथ बांटना चाहूँगा और मैंने अपने विचार को आपके सामने पहुंचाने के लिए ब्लॉग में अन्य संबंधित लिंक भी शामिल किया है. इश्वर आपको आपके इस प्रयास में आशीर्वाद दें.



कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ?

कैसे भगवान के साथ एक रिश्ता बनाएँ?


अन्य संबंधित लिंक

हरे कृष्ण संसाधन



“From the Handbook of World Religions,published by  Barbour Publishing, Inc. Used by permission.”

Hare Krishna Resources

Wednesday, October 20th, 2010

Testimony of Hare Krishna coming to Christ


Audio Resources


Written Bible


Watch the “Jesus Film”


Gods Plan of Salvation “The Four Spiritual Laws”

Hare Krishna

Sunday, August 8th, 2010

The religion or sect that is called Hare Krishna or International Society for Krishna Consciousness is a movement that is steeped in Hindusitic thought. It is not original in all of its views as it borrows its influence and origins from its mother religion. Of course, there are differences in regards to what is believed but the face of the Hare Krishna can be clearly identified as the offspring of its mother religion of Vishnuism. This cultus was birthed as a way to personalize and popularize  the concept of god unlike its Hindu counterpart which depicts their deities as being aloof.

When I lived in Dallas Texas we would go to the portion of the city which was called Deep Ellum and this was my first experience with ISKCON. Me being from rural Kansas this was quite a shock to see these bald, colorful and openly demonstrative people who were playing drums, chanting and dancing. At the time I did not not understand what all of this meant but now I realize that it has real significance to their religious ideologies.

This rhythmic style of worship is to be realized as a form of liberation due to chanting the mantra of its religious anthem in conveying the name of God as a magical component to somehow mysteriously and mindlessly release the inner knowledge of God. Its as if the words alone contain the magic to transform the ignorance of the person who is uttering them. Of course there is more to the equation than this but nevertheless this is a vital expression and a necessary component to their religious practices so much so that ideally they are to chant this mantra 108 times a day by using a type of rosary(japa mala) as a means of focusing in order to accomplish their goal. Even a stranger on the street could join in this mantra without any knowledge of Krishna and benefit from the life transforming power of these incomprehensible words.

All this however is very occultic in nature by which a person controls and manipulates words to satisfy the religious expression based on the joining of sounds, syllables, and phrases. It appears that through the endless repetitions that it could become almost trance like and monotone obtaining a hypnotic state that after a while the mouth is no longer conjoined with the sincerity of the heart of the worshipper . Although it is claimed that this response is not some form of artificial imposition on the mind I am skeptical as seeing it as just a tedious and endless vocative procedure. So what about a person who doesn’t have all of their mental or physical faculties and can not join into this devotional ritual to Krishna or how about someone who is handicapped and are not able to dance and clap their sins away? Does some one deem these incapacitated individuals as the product of bad karma and that they should just be given over to fate and hopefully with their next earthly assignment or rebirth they will be able to participate and benefit from this essential part of these religious expressions of faith?

This brings me to another controversial position which is common among the Eastern religions and that is the belief of samsara or reincarnation which is a central tenet to their religious views even though their seems to be no real evidence verifying this phenomena other than either personal deception or perhaps the influence of demonic inspiration upon the minds of those who hold to this concept.

Science is beginning to research this phenomena of life after death by means of gathering data through the testimonies of others to verify experiences that are beyond their ability as a terminal patient to control the death environment. I have blogged on life after death as based on near death and clinical death experiences and some have come back to tell their stories and much of what is being reported globally have concepts that relate more to a biblical view of life after death versus being reborn into another body only to go around again.

I think one of the major philosophical arguments against this position is how can a person be reformed when they would be ignorant of the sins committed in the previous life? Also how do you know if you have done enough to be released from the cycle and therefore since you don’t have the confidence of knowing  where you came from or where you are going on this spiritual plane it would just lead to the fearful expectation of life and subsequent death or perhaps to a nihilistic view of living.

Also regarding the belief in the eternality of the soul, which conflicts with the notions of the empirical evidence of causality, how could this process be initiated since it would require a beginning point in time versus a timeless function and how would it be facilitated due to the temporal existence of the origins of the universe as seen through the telescopes and calculators of modern science?

Anyway in moving on I would like to discuss the contradictory nature of their views of God which on one hand are said to be monotheistic and yet on the other they uphold to the views of monism. They in essence do not see the idealized self or the one who attains Mukhti as a separate entity apart from their chief deity and once an individual reaches this elated spiritual state they are somehow reunited or absorbed back into the unity of the godhead. Yet I’m not for sure how god was originally divisible to begin with?

Paradoxically His Divine Grace A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada says that if anyone claims to be god then that person is a dog and yet essentially that is what this doctrine upholds. If this is the case then what of the supposed incarnation of god that was manifestly represented in the person of  Sri Caitanya Mahaprabhu?

Another conflict to this movement is their supposed upholding of moral attributes which are commendable constituents in and of themselves yet they have been demonstrably lacking by its leaders and adherents as contrary to the essential nature of their salvific message of good works.

This movement has been shrouded in controversy and unlike the heyday of the 60‘s and 70‘s there seems to be less visibility to the spotlight that was once placed on its claim to fame. Some of this unholy exposure occurred after the death of their prestigious guru Prabhupada. It was at this point that the scandals of its leadership where brought into the light due to the inner power struggles culminating in the resignation of numerous leaders which led to the indictment and conviction of various leaders from such things as tax evasion, drug dealing and even murder. Ironically these men were to be committed to leading exemplar lives of holiness in the avoidance of wordily attachments and yet this cream of the crop was full of rotten apples.

Also the most surprising and disturbing aspect to this whole ordeal is that the chief diety Krishna is said to be able to participate in the pleasures of sin such as intoxication and fornication and yet the devotees are to restrain their indulgences which are consequential to their future state of being . This is untenable to have this kind of philosophy of do what I say and not as I do. The worshipper is to abstain from these things through devotion(Bhakti) in order to obtain liberation and then if they obtain the liberation or Mukhti then essentially they no longer need to abstain having been returned to the godhood and yet this all seems like some weird twist to logic which is incoherent and contradictory at best and at worst it is a lie which has cost the souls of many precious people who are caught up in the web of deception even at the price of renouncing their name and family affliation.

Finally Hare Krishna movement like other Indian religious groups relegate a sense of oneness to varied religious expressions. Yet practically speaking they have maintained exclusivity in their beliefs as a unique expression of faith versus a conglomeration of various religious views. Yet their portrayal of God as being represented as Allah, Jehovah, Buddha, etc. is antithetical in nature and if you were to study these other varied world religions you would see that their doctrine of theology is incompatible to one another.

Lastly Jesus is regarded by the observants of the Hare Krishna movement as the Son of Krishna and I would like to share with you Jesus’ words as taken from his disciples.

To begin with Jesus never saw that mankind was solely self sufficient in being able to achieve for himself the dimension of moral perfection outside of the intervention of God. We see an example of this from the biblical witness of the rich young man in Matthew 19 who in summary was moralistic in his behavior more so than your average Holy Joe which left even Jesus touched and yet he failed the test because of his riches which led his disciples to question then how is it possible for someone to be saved and Jesus replied with man this is impossible but with God all things are possible.

The rich young man perhaps approached Jesus with a sense of self confidence much like sometimes we do when we compare our actions with others and perhaps we become like the religious zealots of Jesus day who would rehearse in prayer all of their righteous deeds before God and never realize their failures and sins and yet it was the despised and socially outcast tax collector who in his humility cried out in mercy to God to save him and therefore it was him who walked away justified that day, Luke 18.

Jesus came to liberate and save us by forgiving us of our sins and restoring us into a proper relationship with God(Matthew 1:21) and He also has caused us to be born again which is not to be confused with rebirth the former has to do with changing and transforming our internal nature while the latter has to do with reconstructing the molecular structure of the outwardly physical exterior. One was a change of hearts and the other is only a change of parts, John 3.

Regarding prayer Jesus says in Matthew 6:5-8 5 “And when you pray, do not be like the hypocrites, for they love to pray standing in the synagogues and on the street corners to be seen by men. I tell you the truth, they have received their reward in full. 6 But when you pray, go into your room, close the door and pray to your Father, who is unseen. Then your Father, who sees what is done in secret, will reward you. 7 And when you pray, do not keep on babbling like pagans, for they think they will be heard because of their many words. 8 Do not be like them, for your Father knows what you need before you ask him.

In Matthew 11:28-30 Jesus says 28 “Come to me, all you who are weary and burdened, and I will give you rest. 29 Take my yoke upon you and learn from me, for I am gentle and humble in heart, and you will find rest for your souls. 30 For my yoke is easy and my burden is light.”

He also declares John 8:36 36 So if the Son sets you free, you will be free indeed.

I know that I have said many challenging and hard things in my post and my desire is to never intentionally offend anyone. Yet my primary contention is with the institution even though I know the institution is personal as it is managed by people. I suppose from this perspective the points that I made can not be handled in some kind of impersonal vacuum and therefore it appears hostile and critical not just from a managerial position but from the heart of every practitioner to whom these concerns are regarded as sacred. I want to reassure you that my intention is altruistic and all I ask is for you to perhaps rethink or review your position from a objective view versus a subjective experience. To look beyond your religious culture and to pursue truth wherever it may lead you. If you are open I would like to share with you from my religious perspective as I have included other related links in communicating to you my thoughts. May God bless you in this endeavor.



How to know God

Hare Krishna Resources



“From the Handbook of World Religions,published by  Barbour Publishing, Inc. Used by permission.”